Wednesday, August 14, 2013

औरत की आज़ादी के अलसुलझे सवाल




* नूर ज़हीर के उपन्‍यास 'अपना खुदा एक औरत' की समीक्षा - 

औरत की आजादी के अलसुलझे सवाल 

* नन्‍द भारद्वाज

        औरत की आजादी और उसके साथ समानता का बरताव मानव सभ्‍यता के इतिहास और उसकी विकास-प्रक्रिया का एक अहम मसला रहा है। यूरोप और मध्‍य एशिया में औद्योगिक क्रान्ति के बाद बदलती आर्थिक प्रक्रियाओं के साथ जारी बहस का सार निकालते हुए मार्क्‍स के अनन्‍य सहयोगी फ्रेडरिक एंगेल्‍स ने बहुत साफ तौर पर लिखा था कि “औरतों की आजादी और पुरुषों के साथ उसकी समानता उस वक्‍त तक नामुमकिन रहेगी, जब तक औरतों को सामाजिक उत्‍पादन प्रक्रिया से अलग रखकर उन्‍हें, घरेलू काम तक, जो निजी काम है, सीमित रखा जाएगा।" इसी समझ के साथ विकसित हुए मजदूर आन्‍दोलन ने बेशक औरत को अपने संघर्ष में बराबरी का हिस्‍सेदार बनाया हो, लेकिन सामाजिक संबंधों और धार्मिक प्रक्रियाओं पर इसका असर प्राय कम ही देखा गया। भारत की आजादी के संघर्ष में भी उसकी भूमिका सीमित ही बन पाई, लेकिन आजादी के बाद संविधान और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था कायम हो जाने के बावजूद औरत की आजादी तब भी अपना सही स्‍वरूप ग्रहण नहीं कर पाई है। 
      यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि औरत की आजादी और स्‍त्री-प्रश्‍नों पर चल रही विश्‍व-व्‍यापी बहस तकरीबन इकतरफा-सी होती रही है। कुछ धार्मिक जमातें आज भी आश्‍वस्‍त हैं कि उनके मजहब में औरत सब से अधिक महफूज है, उसे वे सारे हक और सहूलियतें हासिल हैं, जो उनके मुल्‍क या मजहब के सभी लोग अपने जीवन-व्‍यवहार में बरत रहे हैं, पर उस पर बहस या ऐतराज उठाने की इजाजत किसी को नहीं है। कुछ धर्मावलंबियों ने महिमा-मंडन का ऐसा मिथ्‍या आडंबर गढ़ लिया कि उसमें सचाई पर बात करना और मुश्किल हो गया। ऐसे दौर में औरत की आजादी की एक मुखर पैरोकार और हिन्‍दी-उर्दू की जानी-मानी लेखिका नूर ज़हीर का नया उपन्‍यास ‘अपना खुदा एक औरत’ इस ज्‍वलंत मसले पर नये सिरे से हमारा ध्‍यान आकर्षित करता है। अपनी इस बेबाक दास्‍तान में वे बेलिहाज कहती हैं – “औरत की आजादी की गुत्‍थी इतनी उलझी हुई इसीलिए है कि मर्दो ने इसको देने या न देने की जिम्‍मेदारी अपने ऊपर ले ली है और औरतों ने मर्दों को, सबसे बुनियादी चीज अगवा करने दिया है – आजादी की परिभाषा और कैसे उसे हासिल किया जाये, क्‍यों कर उसे जिया जाये।" (पृष्‍ठ 279) स्‍त्री–प्रश्‍नों पर ऐसी बेबाक राय रखने वाली कथाकार नूर ज़हीर के इस उपन्‍यास को पढ़ना निश्‍चय ही ज़िन्‍दगी के एक रोमांचकारी अनुभव के बीच से गुजरना है। यह उपन्‍यास मूल रूप से ‘माई गॉड इज ए वूमन’ शीर्षक से अंग्रेजी में लिखा था, जिसे स्‍वयं लेखिका ने हिन्‍दी में अनुदित किया है।
       कथा का आरंभ ही इतना दिलचस्‍प और दो-टूक है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद उससे अलग हटना आसान तो कतई नहीं – वह लोकेल, समय और किरदार सब एक साथ सजीव हो उठते हैं और कथा के प्रवाह में पाठक को बहा ले जाते हैं। मसलन, यह शुरुआत कुछ इस तरह सामने आती है - “वह लंबी और दुष्कर यात्रा थी। झुलसते थार रेगिस्‍तान से गंगा के मैदानों की सघन सरस घनी हरियाली तक। सफिया पूरी रात सो नहीं पाई थी। --- उसकी शादी ऐसे खानदान में तय हुई, जिसमें दो अदद ‘सर’ की उपाधियां, पांच खानबहादुर और नौ बैरिस्‍टर मौजूद थे। उसका शौहर (अब्‍बास जाफरी) भी बैरिस्‍टर था और उसके ससुर अवध हाई कोर्ट के जज। --- इस रिश्‍ते पर बहुतों को हैरानी हुई थी, क्‍योंकि उसके पिता (सैयद मुर्तजा मेंहदी) तो एक मामूली-से स्‍कूल इंस्‍पैक्‍टर थे। अमीरों की दुनिया। उसने नजर चुराकर अपने शौहर को देखा। उसकी एक किताब छप चुकी थी, जो काफी विवादास्‍पद हुई थी। शरीफ़ मुसलमान घरानों में उसका जिक्र तक मना था।" (पृष्‍ठ 7) और इस तरह अपने आप में मुकम्‍मल इस सार-संक्षिप्‍त जानकारी के साथ सफिया के संघर्षपूर्ण जीवन जो कथा आरंभ होती है, वह आगे के सफों में पर्त-दर-पर्त और गहरी, गुरूतर और व्‍यापक होती जाती है। 
    एक मध्‍यवर्गीय शिक्षक परिवार में जन्‍मी और इंटरमीडिएट तक शिक्षित सत्रह वर्षीय सफिया जब बैरिस्‍टर अब्‍बास जाफरी से शादी कर ज़िन्‍दगी के नये सफ़र पर निकली, तो वह कई तरह की आशंकाओं से घिरी थी। ग्‍यारह सेर जेवर और जरी की भारी-भरकम पोशाक में दुबकी उस नयी-नवेली दुल्‍हन के सामने ज़िन्‍दगी जिस तरह के सवाल और शंकाएं लिये खड़ी थी, वह नहीं जानती थी कि आने वाला कठिन समय उसे किस मुकाम पर ले-जाकर छोड़ेगा। तसल्‍ली थी तो बस इतनी कि उसका शौहर एक पढ़ा-लिखा ज़हीन इन्‍सान है, जो अपनी शरीके़-हयात को ज़िन्‍दगी में बराबरी का हिस्‍सेदार मानता है – वह न केवल उसे घर-परिवार की चहारदीवारी तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे तर्क की बिनह पर अपने से असहमत होने की पूरी आज़ादी देता है। इस अर्थ में अब्‍बास वाकई अपवाद रहे कि वे न केवल उस ज़माने की मजहबी पाबंदियों के खिलाफ चुनौती बन गये थे, बल्कि सामाजिक बदलाव की हिमायत करने वाली क्रान्तिकारी पार्टी के लिए भी उसका समर्थन करना आसान नहीं रह गया था। वह पार्टी जिसके लिए उन्‍होंने ज़िन्‍दगी की सारी सुख-सुविधाएं ठुकरा दीं। अपने क्रान्तिकारी विचारों और उन पर लगे मजहबी फतवों की वजह से न केवल उन्‍हें अंग्रेजी हुकूमत के दौर में जेल जाना पड़ा, आज़ाद मुल्‍क  की धर्मनिरपेक्ष सत्‍ता के लिए भी वे उलझन का कारण ही बने रहे। बेशक प्रदेश और देश के सिरमौर सियासतदां निजी तौर पर उनके विचारों की कद्र करते रहे हों, लेकिन जहां भी मजहबी दबाव आया, उन्‍होंने सचाई और न्‍याय का पक्ष लेने की बजाय अपने सियासी हितों को ही अहमियत दी। अब्‍बास के चरित्र की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि वे न केवल सार्वजनिक जीवन में सचाई और न्‍याय के पक्ष में लड़ते रहे, बल्कि अपने घर में, वाल्‍दा जीनत बेगम की उन बातों के भी सख्‍त खिलाफ रहे, जो गरीब लड़कियों को गुलाम बनाकर रखने या मजहबी पाबंदियों को अपनी बहू और परिवार के लोगों पर लागू करने की आकांक्षा रखती थी। जब उन्‍हें यह जानकारी मिली कि उनकी अम्‍मी किसी मजहबी दलाल के जरिये सस्‍ते दामों पर नयी गरीब लड़कियां बतौर गुलाम खरीदना चाहती हैं, तो वे उनके सख्‍त खिलाफ हो गये और जब मां अपनी ज़िद पर अड़ी रहीं तो वे और सफिया अपने घर सफ़दर मंज़िल से अलग हो गये और उसी हवेली के अहाते में नौकरों के लिए बने रिहायशी हिस्‍से सागर पेशे की कोठरियों में रहने को चले गये।  
     सफ़दर मंज़िल से अलग होते ही अंग्रेज हुकूमत के लिए अब्‍बास को गिरफ्‍तार करना आसान हो गया और उन्‍हें जेल भेज दिया गया। ऐसे में अब्‍बास को यह जरूरी लगा कि इस दौरान सफिया अपनी ग्रेजुएशन की तालीम पूरी कर जल्‍द-से-जल्‍द अपने पांवों पर खड़ी हो जाए। उन दिनों अब्‍बास के वालिद जज सफ़दर अली जाफरी हाई कोर्ट से अपने रिटायरमेंट के बाद वकालत करने इलाहाबाद चले गये थे, इसलिए सफिया भी अपने हमदर्द ससुर की सेवा के बहाने इलाहाबाद पहुंच गई और दो साल में अपनी ग्रेजुएशन की तालीम पूरी कर ली। इन्‍हीं दो सालों में मुल्‍क भी आज़ाद हो गया, अब्‍बास जेल से छूटकर सफिया के पास आ गया और वे वापस लखनऊ लौट आये। आज़ाद हिन्‍दुस्तान मे देश की नयी पौध को ज़रूरी तालीम मुहैया करवाने के लिए हर शहर-कस्‍बे और समुदाय मे लड़के-लड़कियों के लिए नये नये स्‍कूल खुल रहे थे, इसी प्रक्रिया में लखनऊ में भी मुस्लिम लड़किेयों के लिए बेहतर तालीम के इरादे से एक नेक मुसलमान बुजुर्ग मुज्‍तबा हुसैन ने अपनी बड़ी-सी कोठी को ‘साजिदा हुसैन मुस्लिम गर्ल्‍स  स्‍कूल’ में तब्‍दील कर दिया और उन्‍होंने सफिया के सामने यह प्रस्‍ताव रखा कि वे एक बतौर शिक्षिका के उनकी स्‍कूल से जुड़ जाएं। सफिया को काम की जरूरत भी थी और वह इस स्‍कूल से जुड़ गई। इन लड़कियों को पढ़ाने के दौरान ही उसने यह जाना कि मुसलमान घरों में आमतौर पर लड़कियां कमजोर रह जाती हैं, इसलिए इनके शारीरिक विकास के लिए उन्‍हें व्‍यायाम की शिक्षा देना उसे जरूरी लगा। जब मजहबी लोगों तक यह बात पहुंची तो उन्‍हें यह बहुत नागवार लगी। इसी बात को लेकर एक मौलवी और सफिया में तीखी तककरार भी हो गई और इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया कि शहर के पेशे-इमाम और मौलवी सफिया-अब्‍बास से जवाब-तलबी करने सफ़दर-मंजिल तक आ पहुंचे। इधर स्‍कूल संचालक मुज्‍तबा हुसैन पर भी कई तरह के दबाव आने लगे और इस तरह सफिया-अब्‍बास और मजहबी लोगों के बीच एक खुली जंग-सी शुरू हो गई।
      उनके बीच बढ़ते विवाद का एक कारण यह भी रहा कि सफिया उन स्‍कूली लड़कियों में आत्‍म-सजग बनने का नया हौसला पैदा कर रही थी, ताकि वे अपने साथ होने वाले अन्‍याय को चुपचाप बर्दाश्‍त न करें। ऐसी ही एक लड़की निगार एक दिन सफिया के पास अपनी तकलीफ लेकर आई कि उसके वालिद उसकी शादी एक ऐसे उम्रदराज अमीर से करने पर तुले हैं जो उसके अपने ही आशिक का बाप है। सफिया और अब्‍बास ने मामले की नजाकत को समझकर उसे यह सलाह दी कि वह अभी उसका सीधे विरोध न करे, बल्कि ऐन  निकाह के मौके पर जब उसकी रजामंदी पूछी जाए तो वह कबूल करने से इन्‍कार कर दे, क्‍योंकि शरीअत औरत को यह हक़ देता है कि अगर उसे कोई इन्‍सान कबूल न हो तो वह निकाह के वक्‍त इन्‍कार कर सकती है। सफिया और अब्‍बास उस वक्‍त बतौर गवाह मौके पर मौजूद रहे, ताकि बेवजह उसे दबाया न जा सके। और इस तरह उन्‍होंने एक मासूम के साथ हो रही नाइन्‍साफी से उसे बचा लिया। इसी प्रसंग ने पहली बार सफिया को यह सोचने पर विवश कर दिया कि “कुछ अलग क्‍यों नहीं सोचती औरतें? सारे पैगंबर पुरुष हुए हैं, क्‍यों हमेशा खुदा मर्द माना जाता है? दूर, अछूता, अदृश्‍य बने रहने के‍ लिए? क्‍यों ज्ञान की खोज में मैत्रेयी और गार्गी तक को भी अपने पतियों के पीछे चलना पड़ा, क्‍योंकि वे दूसरी दिशा में नहीं गर्इं?” (पृ 66)  
     सफिया का संघर्ष उसके लिए इस अर्थ में और कठिन हो गया कि उसे समाज या मजहबी लोगों से ही नहीं, अपनी सास ज़ीनत बेगम से लड़ना पड़ा और यह परिस्थिति तब और विकट हो गई जब अब्‍बास मजहबी फतवे के कारण पहले तो गिरफ्‍तार कर लिये गये और बाद को कट्टरपंथी हमले में अपनी जान गंवा बैठे, ऐसे कठिन समय में घर के लोगों से हमदर्दी पाने की बजाय सफिया और उसकी नवजात बच्‍ची को जीनत बेगम ने यह कहकर बेघर कर दिया कि जब उसका बेटा ही नहीं रहा तो इस औरत से उनका कोई रिश्‍ता नहीं बचा और उससे वह रिहाइश भी छीन ली, जिसमें वह किसी तरह अपना गुजारा कर रही थी। सफिया ने इस अन्‍याय के‍ खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ी, लेकिन शरीअत के कमजोर कायदों की वजह से उसे न्‍याय नहीं मिल पाया। आखिरकार उसे अपना ठिकाना बदलकर दिल्‍ली आना पड़ा, जहां उसे अपने हमदर्द साथी की मदद से एक संगीत संस्‍थान गंधर्व कला केन्‍द्र में नौकरी और सर छुपाने को जगह मिली। राजनैतिक हलकों में अब्‍बास की बेहतर साख और एक पढ़ी-लिखी सजग स्‍त्री के रूप में सफिया को दिल्‍ली में अपनी जगह बनाने में विशेष कठिनाई नहीं हुई। उसे संगीत नाटक अकादमी में उसकी योग्‍यता के अनुरूप अच्‍छा काम और रहने का ठिकाना भी मिल गया, लेकिन गंधर्व केन्‍द्र की मालकिन अमृता की त्रासद जिन्‍दगी के प्रति भी उसके मन में गहरी हमदर्दी बनी रही। सफिया जानती थी कि अमृता का पति गोविन्‍दराम एक ऐय्‍याश किस्‍म का व्‍यक्ति है और वह अपनी बीबी और अपाहिज बच्‍ची के साथ अच्‍छा सुलूक नहीं करता, उन्‍हें शारीरिक प्रताड़नाएं देता है, तो उसके संघर्ष का दायरा और बड़ा हो गया। उसे लगा कि स्‍त्री किसी भी धर्म या मजहब के दायरे में बेहतर हालत में नहीं है, वह हर जगह दोयम दर्जे की ज़िन्‍दगी जीती है। सफिया इससे पहले अपने ससुराल में सिल्विया जैसी ईसाई स्‍त्री को उसके ससुर सफ़दर अली द्वारा रखैल बनाकर रखने और बंगाल से लाई उन लड़कियों की गुलामी भी देख चुकी थी। यही नहीं, उसकी पीड़ा तब और बढ़ गई जब उसकी अपनी ही जवान बेटी सितारा ने उसके उसूलों के खिलाफ एक ऐसे मुस्लिम नौजवान को पसंद किया जो बुनियादी रूप से न केवल एक कट्टर मजहबी सोच वाला व्‍यक्ति था, बल्कि विदेश में गरीब बच्‍चों को बेचने का गैर-कानूनी कारोबार भी करता था और जब वहां उसके गिरफ्‍तार होने की आशंका बनी तो वह भागकर हिन्‍दुस्‍तान आ गया। संयोग से उन्‍हीं दिनों सफिया दिल की मरीज के रूप में अस्‍पताल में भर्ती थी, सितारा के पति वसीम ने सफिया के इस तरह बीमार होने को भी अपने बचाव में इस्‍तेमाल किया और धोखे से अपनी बीबी की आड़ में सफिया के घर और उसकी संपत्ति पर कब्‍जा करके बैठ गया।
      सफिया की इस संघर्षगाथा को एक नाटकीय मोड़ देते हुए नूर ज़हीर ने इसे उस दौर के चर्चित प्रसंग शाहबानो केस से जोड़ दिया। यानी बरसों पहले सफिया ने अपने हक की जिस लड़ार्इ को लखनऊ हाई कोर्ट में अधूरा  छोड़ दिया था, उसे अंतिम परिणति मिली, शाहबानो केस में, जहां देश की सबसे बड़ी अदालत ने प्राकृतिक न्‍याय से वंचित मुस्लिम महिलाओं को उनका जायज हक़ देने के पक्ष में फैसला दिया था। न्‍यायालय के इस फैसले के खिलाफ यही कट्टरपंथी समुदाय सड़कों पर उतर आया और उस न्‍याय से वंचित औरत के मसले को ‘मुसलमान बनाम अन्‍य’ के विवाद मे तब्‍दील कर संसद में सरकार को विशेष विधेयक पास करने पर मजबूर कर दिया। और इस तरह बरसों बाद मिले उस सही फैसले का अमल रुकवा दिया। अपनी जिन्‍दगी की लड़ाई हार चुकी सफिया के सामने बस यही एक सार्थक विकल्‍प बच गया था कि वह इन्‍दौर पहुंचकर शाहबानो के साथ खड़ी हो और इस न्‍यायिक संघर्ष को अन्तिम परिणति तक पहुंचाने में भागीदार बने। सफिया ने अपने शौहर से धोखा खा चुकी बेटी सितारा और पति गोविन्‍दराम से प्रताड़ित अमृता से भी उसके साथ चलने का आग्रह किया, लेकिन वे अंतिम क्षणों तक यह नहीं तय कर पाई कि उन्‍हें किसका साथ देना चाहिये। ऐसी हालत में बीमार सफिया ने अकेले ही इन्‍दौर जाने का फैसला किया और वहां पहुंचते पहुंचते उसकी सांसों ने उसका साथ छोड़ दिया। इन्‍दौर स्‍टेशन पर वहां के बुजुर्ग और नेक मुस्लिम स्‍टेशन मास्‍टर इम्तियाज ने अंतिम क्षणों में उसकी देखरेख की और जब उसने वहीं प्राण त्‍याग दिये तो उसका अंतिम संस्‍कार सम्‍पन्‍न करवाया। सफिया की बेटी सितारा और अमृता को उसके जाने के बाद जब अपनी गलती का अहसास हुआ तो वे उसकी खोज में इन्‍दौर पहुंची और उन्‍हें सफिया के ऐसे दुखद अंत की जानकारी मिली। स्‍टेशन मास्‍टर इम्तिायाज ने उन्‍हें सफिया का बचा-हुआ सामान और एक डायरी सुपुर्द कर दी, जिसमें उसने अपनी लड़ाई को जारी रखने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी। सितारा और अमृता को सफिया की विरासत सुपुर्द करते हुए उस नेक मुसलमान की पीड़ा कुछ इस तरह व्‍यक्‍त हुई है – “मैं कौन होता हूं तुमसे सवाल करने वाला? सवाल तो तुमसे तुम्‍हारा ज़मीर करेगा और तुम्‍हें उसका जवाब देना पडे़गा। --- तुम चाहती थोड़े ही थी कि वे मर जाएं, लेकिन तुमने उन्‍हें जीने का मौका भी तो नहीं दिया। वे ज़िन्‍दा रहतीं अगर उनके मकसद को सहारा मिलता। आप लोगों के स्‍टेटस की एक भी औरत अगर उनका साथ देतीं, तो वे जरूर ज़िन्‍दा रहतीं। शायद शारीरिक तौर पर नहीं, पर उस अकेली पढ़ी-लिखी, बाशऊर मुसलमान औरत की तरह, जिसमें हिम्‍मत थी कि ग़लत को ग़लत कह सके।" (पृष्‍ठ 276)   
     निश्‍चय ही नूर ज़हीर का यह उपन्‍यास औरत की आजादी और उसकी अपनी खुदाई के जरूरी मसले पर फिर से विचार करने की जरूरत का गहरा अहसास कराता है।
***
-         नन्‍द भारद्वाज
71/247, मध्‍यम मार्ग, मानसरोवर, जयपुर – 302020
nandbhardwaj@gmail.com , मोबा – 09829103455

अपना खुदा एक औरत (उपन्‍यास) – नूर ज़हीर, प्रकाशक – हार्परकालिन्‍स पब्लिशर्स इंडिया, नई दिल्‍ली।
                          संस्‍करण 2011, पृष्‍ठ 286, मूल्‍य - 199 /-


Friday, July 5, 2013

कथा-संकलन 'आपसदारी' की समीक्षा -



तेरी, मेरी, सब की – आपसदारी
·        डॉ लक्ष्‍मी शर्मा

   ‘आपसदारी’ संग्रह वरिष्‍ठ कथाकार नंद भारद्वाज का सद्य-प्रकाशित कथा- संग्रह है। ये संग्रह लेखक की कुछ मौलिक हिन्‍दी कहानियों और कुछ चुनिन्‍दा राजस्‍थानी कहानियों के हिन्‍दी अनुवाद का अनूठा संकलन है। इस अर्थ में ये कथाएं संगम हैं राजस्‍थानी और हिन्‍दी दो भाषाओं का, और धुर पश्चिमी मरु-प्रदेश के ग्राम्‍य-जीवन के स्‍पंदन और तेजी से परिवर्तित होते इक्‍कीसवीं सदी के चतुर नागरिक परिवेश का। यहां प्रत्‍येक संगम आवेश के नीचे दीपती झिलमिलाती है लेखक की संवेदनशील सरस्‍वती रूपी चेतना, जो कभी परिवेशगत-प्रतिबद्धता के रूप में झलकती है तो कभी अतिक्रमण करते नगरीय जीवन-मूल्‍यों के प्रति चिन्‍ता के रूप में थरथराती है।
     सहज मानवीय संवेदनशीलता की यह सरस्‍वती उस विलुप्‍त सरस्‍वती की तरह है, जो आज भी पश्चिमी राजस्‍थान के सीने तले दबी धारा-सी अजस्र उद्दाम बह रही है, लेकिन जिसकी त्रासदी यह है कि वह अब किसी को दीख नहीं पड़ती, जो इन धोरों के बीच अपने अस्तित्‍व के लिए जूझते पीलू, कैर, कीकर, खेजड़ियों को सींचती तो है, पर कभी भूलकर भी सतह पर नहीं दिखती। कथाकार नंद भारद्वाज का संवेदनशील चित्‍त और उनकी चेतना अपने इसी परिवेश को पूरे मनोयोग से रचती, उकेरती और चित्रित करती आई है – भरपूर रंग-रूप-बिम्‍ब–चित्र संवेदना के साथ।
     संग्रह की कहानियों में हम जीते हैं तपती रेत के धोरों की सघनता और गहराई, आंधियों के रूप में उमड़ता आवेग और वहां की अनुदार प्रकृति की मार से आहत होकर पलायन करते बसेरे, पशु-पक्षी और उनमें जूझता- छीजता अकेला-दुकेला-सा जीवन। इसी उलझन, असमंजस और अन्‍यमनस्‍क एकाकी जीवन तथा उजाड़ परिवेश के बीच फूटती शाश्‍वत मानव-जीवन की वह अखूट, अटूट धारा जो एक फांक, दो फांक में बांटते-बदलते परिवेश में भी अथक बनी रहती है। अपने बेलौस यथार्थ में खटते-जूझते जीवन-आदर्श को कसकर थामे कि आपदाओं में नि:शेष न हो जाए जीवन-प्रवाह।
     ‘आपसदारी’ संग्रह की लगभग सभी कहानियों के मूल स्‍वर में यही रेशम के तार-सा क्षीण किन्‍तु सुदृढ़ आदर्श भाव, जीवन के प्रति जिजीविषा, तेजी से बदलते जीवन को भोगते स्‍वीकारते हुए भी सनातन मानवीय मूल्‍यों को बचाए रखने की आकुलता और आस हमें भीतर से बचाए रखती है। विशेषकर दुनिया की आधी से भी कम बच रही आबादी ‘स्‍त्री’ के लिए गहरी चिन्‍ता के साथ आत्मिक विश्‍वास भी उपजाती है, जिसके लिए लेखक को अपने स्‍त्री चरित्रों के जीवन-अनुभव और चेतना पर कहीं अधिक भरोसा करते हैं। वे अपने संघर्षशील स्‍त्री-चरित्र के माध्‍यम से यह बात कहते भी हैं – “एक बात आप निश्चित जान लीजिये कि मुझे एक सहज इन्‍सान के रूप में जो कुछ करना जरूरी लगता है, वह तो मैं करती आई हूं और आगे भी करती रहूंगी, बिना किसी से कोई उम्‍मीद रखे, लेकिन किसने मुझसे कब-क्‍या उम्‍मीद बांध ली और मैं उस पर खरी उतरी या नहीं, उस बात का प्रमाण आप मुझसे ही क्‍यों चाहते हैं?” (बदलती सरगम, पृ 18)       
     वर्तमान का संक्रमणशील जीवन, जिस विकल्‍पहीनता और संकट के दौर से गुजर रहा है, उसके बीच तत: किम् की मन:स्थिति में छटपटाता जीवन और प्रश्‍नाकुल समस्‍याओं के सामने मुंह बाए खड़े जत्‍थे के बीच ऊहापोह में फंसे मनुष्‍य और कथा-पात्र अपनी इस निरुपाय अवस्‍था के कारण पाठक के साथ एक विश्‍वसनीय सहवेदना का संबंध अवश्‍य स्‍थापित कर लेते हैं – वह चाहे ‘उलझन में अकेले’ का नरपत हो या ‘तुम क्‍यों उदास होती हो मूरहेन’ की मनस्‍वी। जब ‘उलझन में अकेले’ का नरपत कहानी के अंत में इस नतीजे पर पहुंचता है कि “जीसा, भाभू और भाभीसा की अपनी उलझनें थीं, खुद मुझे भी उन सारी बातों पर विचार करना था और वह भी किसी के मन को बिना ठेस पहुंचाए। घर-परिवार का अहित किये बिना एक ऐसा निराकरण खोजना था जो उस पुश्‍तैनी घर का और मेरी अपनी ज़िन्‍दगी दोनों का मान रख सके।" तो यही बात पाठक के मन में उसके प्रति गहरी सहानुभूति का संचार करती है।
     इन कहानियों से यह बात स्‍पष्‍ट होती है कि लेखक का प्रारंभिक जीवन मारवाड़ के मरु-अंचल में गुजरा है और अब भी उस जीवन से उसका गहरा आत्मिक जुड़ाव बना हुआ है। वहां के भौगोलिक परिवेश और सामाजिक-सांस्‍कृतिक जीवन से उनकी प्रतिबद्धता ‘आपसदारी’ की इन कहानियों में खुलकर व्‍यक्‍त हुई है। ‘बदलती सरगम’ कहानी की वाधू (फालतू) की दास्‍तान अपनी उस विकल्‍पहीन अवस्‍था से निकलकर वसुधा पंवार बनने की सामान्‍य कथा भर नहीं है, बल्कि ये कहानी है पिछड़ी और वंचित जाति की स्‍त्री होने और उस पारम्‍परिक विषम जीवन को जीती औरत के दुख-दर्द और यंत्रणा की, जिसे वह सदियों से बेबसी में सहन करती आई है। लेकिन यहां कथाकार का संवेदनशील, प्रगतिकामी मन इस ग्रामीण बालिका वाधू के सफल सम्‍मानित कलाकार वसुधा बनने के जुझारू संघर्ष को जिस मनोयोग से चित्रित करता है, तो यही कथा परिवर्तनशील युग में रूढ़ सामाजिक मानसिकता और सचेत रहकर उस रूढ़िगत हदबंदी को तोड़कर खड़ी होती स्‍त्री के चैतन्‍य की विश्‍वसनीय गाथा बन जाती है।
     स्‍त्री सरोकार इस संग्रह की अधिकांश कहानियों का मूल स्‍वर है। कहीं उसका संघर्ष उसे खास बना रहा है, तो कहीं उसकी विवशता का अनकहा आख्‍यान। इन कहानियों के चरित्रों में जहां एक ओर अपने हालात से खुद लड़ती वसुधा पंवार है (बदलती सरगम), तो कहीं ‘आसान नहीं है रास्‍ता’ की पार्वती, जो अन्‍याय के विरुद्ध खड़े होने की अपनी सहज प्रकृति और अटल हौसले के साथ समाज और परिवार के बीच अपने लक्ष्‍य चयन को लेकर उलझी दिखाई देती है, किन्‍तु इस विषम स्थितियों के बावजूद वह अपनी जिजीविषा और आशावादी दृष्टि से स्‍वयं अपनी राह बनाने-चुनने का हौसला भी रखती-जुटाती है। ‘आपसदारी’ की प्रिया और ‘तुम क्‍यों उदास होती हो मूरहेन’ की मनस्‍वी का संघर्ष भी यही कुछ कहता है। यद्यपि कहीं-कहीं वह उस भारतीय मध्‍यम वर्गीय समाज की पितृसत्‍तात्‍मक विवशताओं के समक्ष टूटती-बिखरती स्‍त्री के यथार्थ रूप में भी नजर आती है,  यथा ‘आत्‍मनिर्वासित’ की कुमुद और ‘वापसी’ की सुखदा, लेकिन इन कहानियों का मूल स्‍वर स्‍त्री-संघर्ष को ही वरीयता देता है।  
     ‘अपने-अपने अरण्‍य’ स्‍त्री-चैतन्‍य की दृष्टि से ही नहीं, कथ्‍य और शिल्‍प की दृष्टि से भी इस संग्रह की विशिष्‍ट और उल्‍लेखनीय कहानी है। कथा-नायक रोहित  एक शिक्षित उच्‍च अधिकारी है, जो विवाहित होते हुए भी प्रेम के मामले में असंयमित और दिशाहीन मानसिकता वाला व्‍यक्ति है, जबकि उसकी पत्‍नी मानसी और रोहित की महिला मित्र शालिनी दोनों सही अर्थों में शिक्षित, आधुनिक और सुदृढ़ स्त्रियां हैं, जो न केवल स्‍त्री-मुक्ति के सही मायने जानती हैं, अपितु परिवार, समाज और विवाह-संस्‍था के अंतर्संबंधों को प्राथमिकता देती हैं। यद्यपि इनके ही बीच ‘दूसरी औरत’ की गीता भी है, जो अपने बंधे-बंधाए, तयशुदा आदर्शवादी फ्रेम  में रची-बसी देवदासीय पारो जैसा चरित्र है। एक किशोरी, जो अधेड़ दुहाजू की विवाहिता बनते ही समवयस्‍क लड़की की मां बन जाने की उदार भूमिका में आ जाती है, किन्‍तु इस सामान्‍य चरित्र और संवेदना वाली कहानी को दुहाजू नायक का आत्‍म-द्वन्‍द्व और अपराधबोध सामान्‍य होने से बचा ले जाता है।
     यद्यपि इस संग्रह में भूमंडलीकरण, नगरीकरण, पितृसत्‍ता के विकेन्‍द्रीकरण, स्‍त्री सशक्तिकरण, आधुनिक मुक्‍त यौनिकता जैसे ट्रैंडी शब्‍द सीधे-सीधे कहीं नहीं आते, लेकिन इन कहानियों के परिवेश की व्‍याप्ति में सुधि पाठक इन सम-सामयिक परिस्थितियों, परिघटनाओं को बखूबी देख-समझ सकते हैं, जो लेखक की परिवेशगत संबद्धता और प्रतिबद्धता को तो दर्शाता ही है, उन बदलती वैश्विक स्थितियों, दृश्‍यों और संघर्षों पर उसकी गहरी दृष्टि और सोच-सरोकारों को भी उजागर करता है।
    स्‍त्री-पुरुष के आपसी संबंधों में अकृत्रिम और निर्मल सरल भाव हो, वे बौद्धिकता का साझा करते हुए बगैर किसी अहं, भय एवं झिझक के अपने संबंधों को अहं-रहित मुक्‍त-भाव से जिएं, लेखक की यह सदाशय कामना लगभग सभी कहानियों में दृष्टिगत होती है, जो कहीं-कहीं पर दोहराव से ग्रसित लगती है तो कहीं कथावस्तु के चयन में उनकी सीमा बनती नजर आती है। 
     कथा-भाषा लेखक की निजी भाषा समृद्धता का परिचायक होती है, इस दृष्टि से यह कहानी संग्रह श्‍लाघनीय है। नंद भारद्वाज की कथा-भाषा सरल और सहज संप्रेषणीय विश्‍वसनयता से अपनी बात कहती है। मारवाड़ अंचल की ठेट भाषा का ठाट और वर्तमान के शिक्षित आधुनिक वैश्‍वीकृत मानव की परिष्‍कृत भाषा का प्रयोग इन कहानियों को अपने परिवेश से गहरी संपृक्ति दर्शाते भाषा वैभव से सजाता है।
     ‘दूसरी औरत’ कहानी में बेटी की विदाई के समय गाये जाने वाले गीत का दृष्‍टान्‍त इस कथा-प्रसंग को सीधे पाठकों के हृदय से जोड़कर उस मार्मिक वेला में ला खड़ा करता है, जो राजस्‍थानी लोक-जीवन की अपनी अन्‍यतम विशेषता है –
“आंबा पाका ए आंबली
ए, इतरो बाबल कैरो लाड, छोड़’र बाई सिध चाली।           
ए, आयो सगां रौ सूवटो, वौ तौ लेग्‍यौ टोळी मांय सूं टाळ,
कोयल बाई सिध चाली।"
       पूरे संग्रह में जहां-जहां भी यह आंचलिक परिवेश, जिस किसी भी कहानी में चित्रित हुआ है, वहीं यह भाषा अपने बिम्‍ब और मुहावरे के वैभव से अनायास ही पाठक का ध्‍यान आकर्षित करती है, बगैर किसी भारी भरकम सायास तामझाम के, जैसे मरुधरा के धोरों में बिखरा सुनहरा बालू-कोष। कह सकते हैं कि नंद भारद्वाज की यह ‘आपसदारी’ पाठकों के हाथों में पहुंचकर उन्‍हीं की नहीं, अपितु हम सब की आपस की बात बन जाती है। इस दृष्टि से यह एक पठनीय संग्रह है कि यहां मानवीय रिशतों की अंतरंग दुनिया सघन होकर गहरी आपसदारी में बंध जाती है।
·         
·         आपसदारी (कथा-संकलन) : लेखक – नंद भारद्वाज, प्रकाशक : यश पब्लिकेशन, नई दिल्‍ली। पृष्‍ठ : 132, मूल्‍य : 295 रुपये।                        


·         साहित्यिक पत्रिका ‘अक्‍सर-24’ (अप्रेल-जून 2013) से साभार।   

Sunday, June 9, 2013

एक कहानी - उलझन में अकेले


उलझन में अकेले

काफी गहरा गई थी रात और बाहर बढ़ती सर्दी के तेवर उत्तरोत्तर तीखे होते जा रहे थे। तिबारी के बीचो-बीच जलते अलाव की लपटें फिर मंद पड़ने लगी थीं। कुछ पल पहले जलावन की जिन लकड़ियों को अंगारों पर रखा था, वे अब जलकर खुद अंगारे बन गई थीं और अंगारे फिर नयी आहुति मांग रहे थे। कुछ छोटे कुन्‍दों को मैंने अंगारों पर रखा और एक लंबी फूंक दी – फूंक के उकसावे से आग फिर सचेतन हो गईं। उन सचेतन अग्नि-शिखाओं में अपने ठंडे पड़ते सवालों को मन ही मन सहलाते फिर मैंने एक बार जीसा की ओर उम्‍मीद भरी नजर से देखा, जो अलाव के उस पार अब भी किसी उलझन में डूबे, अपने ही भीतर कुछ खोज रहे थे।
     मैं तय नहीं कर पा रहा था कि जीसा से कैसे बात शुरू की जाए, क्योंकि बात जो करनी थी वह तो पहले ही उन तक पहुंच चुकी थी और अब जो कहना था, उन्हीं को कहना था, मुझे तो फकत् इतना ही बताना था कि मेरे सामने फिलहाल दूसरा कोई रास्ता खुला नहीं है। यह एक अच्छा अवसर हाथ आया है और मैं एक बार इस जमींन पर पांव टिकाना चाहता हूं, लेकिन वे समझने को तैयार हों तब न!
      एक सहमी-सी नजर से मैंने उनके चेहरे की ओर देखा - वे अभी तक वैसे ही गुमसुम बैठे आग की लपटों को अपलक ताक रहे थे। मैं फिर कुछ क्षण जलती लकड़ियों को आगे-पीछे करने में बिलम गया। प्रतीक्षा कर रहा था कि वे ही कुछ बात शुरू करें – कुछ पूछें।
        मन में कई तरह की शंकाएं उठ रही थी कि जीसा शायद नाराज हों और यही उलाहना दे बैठें कि “जब मां-बाप की दी हुई कोई सीख माननी ही नहीं, तो अकारथ यह पूछताछ की रीत क्यों रखनी... मनमानी ही करनी है तो करो फिर..., कौन-कहां बाधा देने आता है...?”  लेकिन वे कुछ बोलें तब न, एक ठहरी हुई दीठ जलते अलाव पर टिकाए वे तो फकत् बैठे थे...गहरे सोच में डूबे...अबोले और उदास!     
      भाभू (मां) बता रही थी, ‘‘पिछले डेढ़-दो महीने से तुम्हारे जीसा की तबियत कुछ ठीक नहीं है। यों आठ-पहर खाट तो नहीं पकड़ी, लेकिन बुखार, खांसी और दमे के कारण जीव में आराम कम ही रहता है। कितनी ही झाड़-फूंक करवा ली, दवाई-फाकी भी देकर देख ली, लेकिन जीव में आराम तो आता ही नहीं। रोटी जीमने के नाम पर फकत् टंक टालते हैं, मुश्किल से एकाध रोटी या थोड़ा-बहुत खीच-दलिया ले लेते हैं। चिकनाई के लिए वैद्यजी ने यों भी मनाही करवा दी। अफीम, चाय और तंबाखू की मात्रा जरूर बढ़ गई है। कोई आया-गया भी आजकल कम ही सुहाता है। किसी को बरजने-डांटने का स्वभाव तो जाने कहां चला गया?’’ एक ही सांस में इतना कुछ बताकर भाभू चुप-सी हो गई। मुझे जाने क्यों लगता रहा कि उन्‍होंने कुछ बातें मुझसे छुपा कर अपने पास रख ली हैं, शायद असली वजह जीसा से बात करने के बाद ही पता लग पाए!
     ‘‘आपने कभी इस बारे में कुछ पूछा नहीं?’’ मैंने भाभू से पूछा।
    ‘‘बताते कहां है? ज्यादा जोर देते हैं, तो खारी मींट से देखते रहते हैं, या फिर बोलेंगे तो फकत् इत्ती-सी बात कि ‘तुम्हें क्या करना है – कोई दूसरा काम नहीं है घर में?’ और हमें चुप रह जाना पड़ता है।’’
    क्या कारण हो सकता है, मेरा पूरा दिन इसी उधेड़बुन में बीत गया। दिन में तिबारी सूनी पड़ी थी। जीसा घर में नहीं थे,  ‘शायद अपनी अफीम की खुराक के लिए किसी ठेकेदार की ओर गये होंगे!’ पूछने पर, भाभू ने यही बताया था।
     “तो किसी को साथ ले जाते, या किसी को भेजकर मंगवा लेते। तबियत ठीक न हो तो यों अकेले जाना तो ठीक नहीं है न।“
     “किसी को बताएं तब न। यह तो मुकना रबारी ने अभी थोड़ी देर पहले खबर दी कि बाबोसा सवेरे मूंडसर के मार्ग जा रहे थे। मूंडसर में जगमाल और दो-एक जने अफीम का धंधा चोरी-छिपे करते हैं। यों हरेक पर विश्‍वास भी तो नहीं कर सकते। लोग बताते हैं कि आजकल अफीम पर सरकार की ओर से पाबंदी लगी है। मैं तो तुम्‍हारे जीसा को बहुत समझाती हूं, एक बार हिम्‍मत करके इससे पिंड छुड़ाओ न, इतने-से कतरे के लिए कितने लोगों की ग़रज करनी पड़ती है?”
       ‘‘यह व्यसन ऐसा ही होता है, भाभू! और वह इस अवस्था में छूटना तो और भी मुश्किल है। एकबार शुरू हो जाने के बाद तो अच्छे-भले जवानों के होश जवाब दे जाते हैं,  इन्होंने तो सत्तर पार कर लिये हैं!’’
      ‘‘अरे बेटा, ये तो मुंह ही नहीं लगाते थे,  ये तो शिवदान के दुख में टूट गये! ऐसे जवान बेटे का यों अकस्मात् उठ जाना, क्या कोई सही जा सकने वाली बात है.. औलाद बूढ़े मां-बाप के जीने का सहारा होती है....और जब वह सहारा ही हाथ से छिन जाए...तो जीना बोझ हो जाता है !’’  कहते हुए भाभू का गला भर आया और आंखों से टलक-टलक आंसुओं की धारा-सी फूट पड़ी।
      शिवदानसिंह मेरे बड़े भाई थे। वे बी.एस.एफ. में सूबेदार-मेजर थे। तीन बरस पहले पड़ौसी मुल्क से झगड़ा हुआ तब वे अखनूर के हल्के में कहीं मोर्चे पर थे। युद्ध शुरू होता है तो फौज तो बाद में मोर्चा सम्हालती है, पहला मुकाबला तो अमूमन इन अर्ध-सैनिक बलों को ही सम्हालना होता है। शिवदान तो मोर्चा लेने में वैसे ही उस्ताद गिने जाते थे। उनकी टुकड़ी ने मोर्चा जीत भी लिया था, पर कौन जाने ईश्वर की क्या मर्जी थी, जब गोली-बारी एकदम बंद हो गई, तब वे बंकर से बाहर फकत् यह देखने आए थे कि कोई दुश्मन नजदीक-दूर तो नहीं है, और उसी वक्त किसी घायल दुश्मन ने तक कर ऐसा  निशाना साधा कि उसकी गोली शिवदान की छाती को आर-पार बींध गई। फिर तो उसके साथियों ने उस अधमरे दुश्मन को गोलियों से छलनी कर दिया, लेकिन उससे शिवदान तो वापस सीधे नहीं हो पाए। दो दिन बाद काठ में बंधी उनकी मिट्टी ही घरवालों के पास पहुंची और तब से जीसा तो जैसे जीते-जी मरे-समान हो गये। उनके सीने में ऐसी बूज आई कि गले से चीख भी नहीं निकल पाई। भाभू और भाभीसा तो बेहाल थे ही, उन्हें संभालने में हम सभी का जैसे धैर्य ही जवाब दे गया था। भाभी को तो तीन दिन बाद जाते होश आया, लेकिन एक बार होश आने के बाद उन्होंने जल्दी ही अपने को संभाल लिया और खुद को इस असह्य वेदना का मुकाबला करने के लिए तैयार भी कर लिया। धन्य है उनकी हिम्मत को! उन्होंने अपनी चिन्ता छोड़, मुझे बुलाकर यह हिदायत दी कि ‘‘नरपत बना, आप मेरी चिन्ता छोड़ें, आप जीसा का ध्यान रक्खें, उनका आपके भाई पर बहुत जीव था! वे अपनी तकलीफ किसी को नहीं बताएंगे!’’ उस दिन से मेरी नज़र में भाभी की इज्जत बहुत बढ़ गई थी।      
*   
         बाहर की आग को भले कितना ही सचेतन रक्खें, वह ज्यादा देर तक अंधेरे का सामना नहीं कर पाती, लेकिन यह भी कहावत है कि अंधेरा भले कितना ही घना क्यों न हो, सजग और सचेत आदमी आसानी से हार नहीं मानता। तो कौन है हमारे भीतर सही अर्थों में सजग और सचेतन - जीसा, भाभू, भाभी या मैं? शायद पूरे अर्थों में कोई नहीं या थोड़े-बहुत सभी।
     जीसा ने अपनी इकहत्तर वर्षों की उम्र में कठिन समय देखा है। खुद बदलते समय और दुनियादारी की अच्छी सूझ-समझ रखते हैं। हो सकता है कि उनका वक्त थोड़ा दूसरा रहा हो, लेकिन चारण के घर में जन्म लेने भर से उन्हें अपने हलके या समाज में ज्यादा मान-सम्मान मिल जाएगा, इसकी तो उन्होंने कभी आस भी नहीं रखी। लोकहित और न्याय की बात करनेवाले एक नेक इंसान के रूप में आस-पास के गांवों में पाबूदानसिंह का नाम किसी से अनजाना नहीं था। अपने जमाने की पोसाल में पढ़ाई भी कर रखी थी। घर में कथा-भागवत, माताजी की स्‍तुतियां, तुलसीदासजी की रामायण और कितनी ही पौराणिक गाथाएं उनसे सुनने के लिए दूर-दराज के गांवों के लोग उनके पास आते थे। कभी कोई तिलकधारी पंडित विवाद में झिल जाता तो अगले को कान पकड़वा कर ही पीछा छोड़ते। भर जवानी से लेकर साठ साल की अवस्था पार करने तक, अपना हर काम हाथ से करने में ही विश्वास रक्खा। खेत और जीव-जानवर अपनी मेहनत से ही सहेजे। क्‍या हो, किसी ने लिहाज में या बाबोसा पर अपनी डाई चढ़ाने के निमित्‍त किसी काम में हाथ बंटा दिया हो, उससे चौमासे की पूरी खेती थोड़े पार पड़ती? उनके पुरखों ने न किसी दरबार में हाजरी भरी और न किसी जागीरी में कोई ओहदा संभाला। उल्टे जागीरी जुल्म के विरोध में अपने भाई-संबंधियों से लड़ते ही रहे। मेरे दादाजी कभी गंगा रिसाले में अपनी टुकड़ी के मुखिया हुआ करते थे, उन्हीं के नाम आई यह सौ बीघा जमीन है, जो पिछले बरसों में परिवार की जीवारी का आधार रही है।
     हाथ के काम के लेखे तो मेरी भाभू भी कम नहीं थीं। वे तो जीसा से भी दो कदम आगे रहतीं। घर में चार-चार दूध देनेवाली गायें थीं। उन गाय-बछड़ों और ढोर-डांगरों की पूरी सार-संभाळ उनके ही जिम्मे रहती थी। फकत् एक गोरधन राईका और उसकी घरवाली उनके घर-बाहर के काम में थोड़ा हाथ बंटा देते, जो गरीब थे और उनकी ही शरण-सहारे से अपना पेट पालते थे, लेकिन यह धीणा और धान किस तरह अंवेरना है, यह देखने का काम तो भाभू का ही होता था। आगे चलकर भाभी ने भी कुछ अपना आपा और मन मिला दिया था। इस बार भाभू से बात करते हुए मुझे इस बात का अचंभा हुआ कि उन्होंने एक बार भी किसी बात में भाभी का जिक्र नहीं किया। यह बात मुझे पूछने पर ही पता लगी कि वे अपने पीहर जयपुर गई हुई हैं, उन्हें सरकार की तरफ से शहीद की विधवा के नाम पर कोई बडी इमदाद मिलने वाली है।
     फौज में एक सिपाही या हवलदार की कितनी-सी वक़त होती है, यह बात खुद घर के बड़े बेटे शिवदान ने अपनी उन्नीस बरस की नौकरी में अच्छी तरह जान ली थी। बारहवीं पास करने के बाद वे एक हवलदार के रूप में भर्ती हुए थे और इतने बरसों की नौकरी में फकत् सूबेदार-मेजर के ओहदे तक पहुंच सके। सो तो नौकरी में रहते हुए उन्‍होंने प्राइवेट बी.ए. कर ली थी। खुद भाभी दसवीं पास थी, लेकिन दोनों घर के किसी काम में पीछे नहीं रहे। वे कहतीं, अपने घर और खेत में काम करते किस बात की शर्म! उनकी दो बेटियां हैं और दोनों अच्छी पढ़ाई कर रही हैं। बड़ी बेटी सुगन पिछले साल पी.एम.टी देकर मेडिकल में दाखिला लेने में कामयाब रही। उससे छोटी मेघा भी कम नहीं। आठवीं बोर्ड में वह भी अपनी स्कूल में सबसे से अव्वल रही। शिवदान का बारहवां दिन बीतने के बाद भाभी के पिता और भाइयों ने उनके बहुत निहौरे किये कि वे उनके साथ पीहर में रहें और दोनों बेटियों को शहर में रखकर पढ़ाएं, लेकिन उस वक्‍त भाभी ने साफ मनाही कर दी। कहा, “भाभोसा, यह मेरा अपना घर है और ये सास-ससुर ही अब मेरे मां-बाप हैं, मैं इन्‍हें छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी।“ जीसा ने जब यह बात सुनी तो उन्‍हें अपनी बहू पर बहुत गुमान हुआ और पहली बार उनकी आंखें खुशी से नम थीं।     
     असल में शिवदान पर जीसा की बढ़ती उम्मीदों की एक बड़ी वजह खुद शिवदान की अपनी नयी सोच और घर को उस पुराने ढर्रे से बाहर निकाल लाने की उनकी जिजीविषा थी। गांव में बिजली आते ही उन्होंने सबसे पहले कोशिश करके घर में बिजली लगवाई। खेत की जमीन के नीचे गहराई में अथाह पानी था, उन्होंने सरकार और बैंक से मदद लेकर गांव में सबसे पहले अपने खेत में ट्यूब-वैल खुदवाया और खेती के लिए नये साधन-तरीके अपनाए। ट्रैक्टर का भी बंदोबस्त करवा लिया। उन्हें छुट्टी भले ही कम मिलती हो, लेकिन दूर बैठे ही वे घर की व्यवस्था सुधारने में पूरी रुचि लेते थे। उनकी देखा-देखी गांव के और लोगों की भी हिम्मत बंधी। सिंचाई की सुविधा होने से इस रेतीले हलके में खेती की पूरी तस्वीर ही बदल गई। एक ही बरस में वही जमीन तीन-तीन फसल देने लग गई। नये साधनों और तकनीक के कारण खेती की उपज भी चौगुनी हो गई। खुद शिवदान नौकरी से रिटायरमेंट लेकर घर की व्यवस्था संभालने के लिए आने के बारे में सोच रहे थे और इसी की खातिर उन्होंने अपने परिवार को गांव में ही बनाए रखा। खुद भाभी ने अपने इस योजना को खूब बढ़ावा दिया और पति की गैर-मौजूदगी में वे सारी जिम्मेदारियां निभाने को तैयार रहतीं, जो इस बदलाव के लिए जरूरी थीं।
    इस घर की माली हालत में रातों-रात तब्दीली आ गई और खुद मुझे भी बड़े शहर में रहकर अपनी सी.ए. की पढ़ाई करते हुए कभी तंगी महसूस नहीं हुई। वे कोई मैनेजमेंट का कोर्स किये हुए आदमी नहीं थे, लेकिन उनकी व्यावहारिक बुद्धि अच्छे-अच्छे मैनेजमेंट किये हुओं को पीछे छोड़ देती। खुद मेरी पढ़ाई के खर्चे पर भी उनकी पूरी नज़र रहती। उन्हें भरम में रखकर कोई फिजूल-खर्ची कर लेना असंभव था। उनकी इच्छा थी कि मैं किसी बड़ी कंपनी में चार्टेड अकाउण्टेंट बनूं और वे इसके लिए मुझे ऐसी कई बड़ी कंपनियों की बातें बताते। इस मामले में जीसा की राय शुरू से ही अलग थी। वे कहते थे कि मैं भले सी.ए. करूं या एम.बी.ए., कोई सरकारी या प्राइवेट नौकरी की तजवीज करने की बजाय यदि अपनी खेती या घर के धंधे में रुचि लूं, तो वह किसी भी नौकरी से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। लेकिन मुझे भाई की राय ही ठीक लगती थी। भाभी की भी यही इच्छा थी कि मुझे किसी बड़े शहर में काम की तजवीज करनी चाहिए। जिस वक्त भाई के साथ युद्ध में यह हादसा हुआ, मैं बीकानेर में सी.ए. के दूसरे वर्ष में पढ़ रहा था। वह दिसंबर का महीना था और अप्रेल-मई में मेरी परीक्षा होनी थी। भाई के साथ हुई इस दुर्घटना से मेरी सारी दिनचर्या और घर का ढंग-ढाला बिखर गया। खुद मेरा भी पढ़ाई से जीव उचट गया। नतीजा यही हुआ कि परीक्षा सिर पर आ गई और मेरी तैयारी कुछ भी नहीं थी। भाभू के जोर देने पर मैं परीक्षा देने शहर आ तो गया, पर किसी पेपर में मेरा मन नहीं लगा। बस गनीमत समझो कि परीक्षा में पास हो गया।
      पिछले दो वर्षों में मैंने भी खूब मेहनत की और उसी का नतीजा था कि बगैर एक भी साल गंवाए, मैंने सी.ए. की डिग्री हासिल कर ली। कुछ कंपनियों को अपना बायोडेटा भेजकर इंतजार करता रहा कि कहीं से कोई बुलावा आयेगा। पहली कोशिश यही थी कि अपने प्रदेश में ही मन-रुचि का काम मिल जाए, तो घर से ज्यादा दूर जाने की नौबत न आए। लेकिन अच्छे काम के लिए मैं कहीं भी जाने को तैयार था। सी.ए. करने के दौरान  मैं उसी कंपनी में बराबर काम करता रहा, जहां काम करते हुए मैंने अपनी पढ़ाई पूरी की थी। कंपनी की साख अच्छी थी और देश के दूसरे शहरों में भी इसकी अपनी शाखाएं थी। उसके मालिक तो यहीं के निवासी थे, लेकिन उसका हैड ऑफिस मुंबई में था, जहां मैं पहले भी कई बार जा चुका हूं। मैं कंपनी के नये प्रोजेक्ट पर काम कर ही रहा था कि  एक दिन मुझे मुंबई से इंटरव्यू के लिए बुलावा आ गया। कंपनी से तीन-चार दिन का अवकाश लेकर मैं मुंबई निकल गया।
*   
        महीना पूरा होने से पहले ही उस कंपनी के हैड-क्‍वार्टर से बुलावा आ गया। अब इस नये काम पर जाने से पहले जीसा और भाभू से इजाजत लेना तो जरूरी थरा, क्योंकि भाई की अकाल मौत के बाद जीसा ने अपनी सारी उम्मीदें मुझ पर टिका रखी थीं और उनसे बगैर पूछे कोई कदम उठाना तो और बड़ी गलती होती। मैं उन्हें समझाना चाहता था कि जीवन में आगे बढ़ने का यह एक अच्छा मौका है, खुद भाई की भी यही राय थी कि मैं किसी बडी कंपनी से जुड़कर काम करूं।
      “जीसा, हमारे लिए यह खुशी की बात है कि मुझे मुंबई से एक बड़ी कंपनी में नौकरी के लिए बुलावा आया है, मैं उसी के लिए आपकी इजाजत लेने आया हूं। इस तरह का अच्‍छा अवसर सौभाग्‍य से ही हाथ आता है, आप कहें तो मैं कल ही उन्‍हें अपनी स्‍वीकृति भेज दूं।“ मैंने हिम्‍मत कर आखिर जीसा के सामने अपनी इच्‍छा व्‍यक्‍त कर दी। वे मेरी बात का बिना कोई उत्‍तर दिये अलाव की ओर ताकते रहे, वे यह बात पहले ही जान चुके थे, मेरा कहना तो औपचारिकता भर था, उन्‍होंने एक-बारगी मेरी ओर सूनी आंखों से देखा और फिर अपने आप में जैसे खो गये। 
         उन्हें यों चुप और गुमसुम बैठे देखकर मुझे चिन्ता भी हो रही थी। फिर यह भी लगा कि नौकरी के लिए इजाजत मांगना तो कोई दुविधा का कारण नहीं होना चाहिए, मैं खुद एकबारगी चिन्ता में पड़ गया और विचार करने लगा कि ऐसा क्या कारण हो सकता है? अगर बिना पूछे चला जाता तो जीसा और घरवालों का उम्र भर का उलाहना रह जाता और पूछ रहा हूं तो यह हाल है! मैं समझता हूं जीवन में इस तरह के अवसर कभी-कभार ही मिलते हैं, संयोग से इसबार मुंबई जाने का बहाना निकल आया और काम बन गया... अन्यथा मुझ जैसे सी.ए. किये हुओं की आज क्या कमी है... सी.ए.-एम.बी.ए. किये हुए आज अनेकों बेरोजगार घूमते हैं, कोई पूछता ही नहीं। मुझे अपनी ओर एक-टक निहारते देखकर वे बोले, ‘‘बुलावा आ गया, वह तो बड़ी बात है, लेकिन यहां के घर-परिवार के बारे में क्या सोचा है? इसे किसके भरोसे छोड़ने का इरादा है... मेरी उम्र इकहत्तर पार कर गई है...इसी के आस-पास अपनी मां की जान लो...अब कोई दुबारा जवान तो होने से रहे...पीछे रही तुम्हारी भाभी और उनकी दोनों बेटियां, तो उनकी रखवाली और संरक्षण मुझे तो तुम्हारे ही जिम्मे दीखती है, अब विचार कर लो कि तुम्हें क्या करना चाहिए...’’ जीसा ने संजीदा स्वर में अपनी समझ से पूरी बात बता दी थी।  
       अपने पक्ष को और ठोस बनाते हुए उन्होंने फिर आगे बात बढ़ाई, ‘‘मुझे तो यही समझा दो कि इस घर में क्या आज तुम्हें अपने जिम्मे कोई काम नहीं दीखता, जो सैकड़ों कोस दूर जाने को तैयार हो गये... अगर नौकरी का मकसद ऊंची कमाई करना है, तो हिसाब लगाकर देख लो कि क्या कोई नौकरी इस घर के काम से बढ़कर कमाई दे सकती है?  हो सकता है, बडे़ शहर में रहने से कुछ सुख-सुविधाएं मिल जाएं... लेकिन अपने पुरखों की कमाई और साख से बना यह घर, क्या इतना सुकून नहीं देता कि उसकी अनदेखी करके उन सुख-सुविधाओं की ओर भागो... थोड़ा सोचकर फैसला करें नरपत बना, अब आप बालिग हो गये हैं और आनेवाले दिनों में इस घर के मुखिया भी होंगे... मैं तो आज ही यह जिम्मेदारी सौंपने को तैयार बैठा हूं...’’ इतना कहकर वे चुप हो गये, जैसे और कुछ कहने को बाकी न रहा हो।
    थोड़ा अचरज हुआ मुझे कि जीसा बदले हुए हालात से परिचित होते हुए भी जाने क्‍यों अनजान से बन रहे हैं। भाई के जाने के बाद इन तीन सालों में भाभी की सोच में काफी फर्क आ गया था और मुझे तो वह स्वाभाविक ही लगा। आने वाले दिनों में उनकी दोनों बेटियां अपना भविष्य किसी बड़े शहर के आश्रय में ही खोजने में लगी हुई हैं... खुद भाभी को जयपुर में शहीद विधवा के नाम पर एक पेट्राल पंप चलाने की सुविधा मिलने वाली है...। अचंभे की बात यह कि मुझे यह खबर भी भाभी के बड़े भाई साहब के मुंह से मिली। कौन जाने उन्होंने यह बात मेरा मान रखने के लिए कही या अपना प्रभाव  दिखाने के लिए कि उनकी बहन अब किसी और पर निर्भर नहीं है। जबकि हमारे घर में तो भाभी को लेकर कभी ऐसी सोच रही ही नहीं कि वे किसी पर निर्भर हैं। मैंने तो हमेशा उन्हें जीसा, भाभू और बड़े भाई जितना ही आदर-मान दिया है। मैं बहुत देर तक उनकी इस बात का अपने मन-बोध में अर्थ खोजता रहा कि ‘‘नरपत बना! अब इस काम-धंधे को असल में तो आपको ही संभालना है, हम तो फकत् कागजी कारवाई तक के सहयोगी थे... धंधा जमाने और संभालने के लिए तो आप सरीखे होशियार आदमी को ही वक्त निकालना पड़ेगा!’’ यह सही है कि वे जयपुर में रहते हैं और उन्होंने कागजी-कार्यवाही में भाभी की मदद की ही होगी, भाभी खुद भी पढ़ी-लिखी हैं और घर में किसी को कोई काम सौंपती है तो सभी सहर्ष उनकी मदद के लिए हरवक्त तैयार रहते हैं, ऐसे में उनके भाई साहब को यह सब कहने-बताने की कहां गुंजाइश थी?
    मैंने भाभू से यह बात कही तो उन्‍होंने हंसकर टाल दी। खुद भाभू, जो कई दुधारू गायों की मालकिन हुआ करती थीं, अब एक गाय से ही संतुष्ट हैं और इतनी ही घर की जरूरत मानती हैं। पिछले तीन वर्षों से खेती हिस्सेदारी पर हो रही है... खुद जीसा का यही सोच है कि अब इतनी ही पार पड़ जाए तो बहुत है! इससे अधिक न घर की जरूरत है और न सम्हालनी ही संभव। खुद लोगों को कहते हैं कि ‘यदि नरपत को इतनी ऊंची पढ़ाई करवाई है, तो कोई एक जगह बांधकर बिठाने के लिए थोड़े ही करवाई है?’ मैं यह बात अच्छी तरह समझता हूं कि आज सभी अपनी उलझन में निपट अकेले हैं, अपने सवालों के उत्तर से वे अनजान नहीं हैं, लेकिन आश्चर्य की बात है कि वे मुझसे ही इसका उत्तर और निराकरण मांग रहे हैं। 
     अपनी बात पर और बल देते हुए वे बोले, ‘‘मुझे तो यह बताओ नरपत बना कि कल को तुम्हारी शादी होगी, दुल्हन आएगी... दीखती बात है कि उसे तुम अपने साथ ही रखना पसंद करोगे... यह भी हो सकता है कि जहां काम लगो, वहीं किसी के साथ घर बसाने का संयोग बना लो....इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस घर में या इस हलके में खुद के टिकाव की कोई गुंजाइश दीखती हो?’’   
      मैं अपनी जुबान पर आती यह बात कहना चाहता था कि ‘जीसा, पंछी अपनी उड़ान के जिस मुकाम पर किसी डाल पर अपना रातवासा लेता है, वह एक तरह से उसका घर ही हुआ करता है। इतनी छूट तो उसे देनी ही होगी कि निर्णायक मोड़ पर वह अपना फैसला खुद कर सके। इनसान की यह फितरत मानी जाती है कि वह भले ही दुनिया में कहीं किसी कोने में रहे-जीए, वक्त आने पर वह अपनी जड़-ज़मीन ढूंढ़ ही लेता है।....” लेकिन उन्हें ऐसा उत्तर देना छोटे-मुंह बड़ी बात होती, इसलिए प्रत्यक्ष में कुछ भी कहना ठीक नहीं लगा।  
    मैं जानता था कि उनके सवालों के उत्तर उन्हीं के धरातल पर खड़े होकर देना आसान नहीं था और अगर कोई निरपेक्ष उत्‍तर था भी तो उन्‍हें मानसिक क्‍लेश देकर देना कतई वाजिब नहीं होता। इसी उलझन में एक-बारगी मैं खुद अपने में अकेला-सा हो गया। जीसा, भाभू, भाभीसा - सब की अपनी उलझनें थीं। खुद मुझे भी इन पर नये सिरे से सोचना था और किसी के मन को ठेस पहुंचाए बगैर एक ऐसा हल खोजना था, जो उस पुश्तैनी घर की और मेरी अपनी जिन्दगी की, ...दोनों की मान-मर्यादा रख सके... ।

 (स्‍वयं द्वारा राजस्‍थानी से अनूदित ) 

                                             ***
- नंद भारद्वाज
71/247, मध्‍यम मार्ग,

मानसरोवर, जयपुर – 302020 

Tuesday, October 2, 2012



जनकवी हरीश भादानी के प्रतिनिधि गीत और कविताएं














कोलाहल के आंगन

कोलाहल के आंगन
सन्नाटा रख गई हवा
    दिन ढलते-ढलते...
    कोलाहल के आंगन!

दो छते कंगूरे पर, दूध का कटोरा था
धुंधवाती चिमनी में, उलटा गई हवा
   दिन ढलते-ढलते...
   कोलाहल के आंगन!

घर लौटे लोहे से बतियाते, प्रश्‍नों के कारीगर
आतुरती ड्योढ़ी पर, सांकल जड़ गई हवा
     दिन ढलते-ढलते...
     कोलाहल के आंगन!
कुंदनिया दुनिया से, झीलती हकीकत की
बड़ी-बड़ी आंखों को, अंसुवा गई हवा
     दिन ढलते-ढलते...
     कोलाहल के आंगन!

हरफ सब रसोई में, भीड़ किये ताप रहे
क्षण के क्षण चूल्हे में, अगिया गई हवा
     दिन ढलते-ढलते...
     कोलाहल के आंगन!

रचना है

जिन्हें अपने समय का आज रचना है
अकेली फैलती
आंखें दुखाती चाह को
सूने दुमाले से
सुबह आंजे उतरना है
     जिन्हें अपने समय का आज रचना है

आंगने हंसती हकीकत से
तकाजों का टिफिन लेकर
सवालों को मशीनों के
बियाबां से गुजरना है
     जिन्हें अपने समय का आज रचना है

तगारी भर जमीं
आकाश रखते हाथ को
होकर कलमची
गणित के उपनिषद् की
हर लिखावट को बदलना है
     जिन्हें अपने समय का आज रचना है।


जंगल सुलगाए हैं

आए जब चैराहे आग़ाज कहाए हैं
लम्हात चले जितने परवाज कहाए हैं

हद तोड़ अंधेरे जब, आंखों तक धंस आए
जीने के इरादों ने जंगल सुलगाए हैं

जिनको दी अगुवाई, चढ़ गये कलेजे पर
लोगों ने गरेबां से वे लोग उठाए हैं

बंदूक ने बंद किया, जब जब भी जुबानों को
जज़्बात ने हरफ़ों के सरबाज उठाए हैं

गुम्बद की खिड़की से, आदमी नहीं दिखता
पाताल उलीचे हैं ये शहर बनाए हैं

जब राज चला केवल कुछ खास घरानों का
काग़ज़ के इशारों पर दरबार ढहाए हैं

मेहनत खा, सपने खा, चिमनियां धुआं थूकें
तन पर बीमारी के पैबंद लगाए हैं

दानिशमंदों बोलो, ये दौर अभी कितना
अपने ही धीरज से हर सांय अघाए है

न हरीश करे लेकिन, अब ये तो करेंगे ही
झुलसे हुए लोगों ने अंदाज दिखाए हैं

आए जब चैराहे आगाज कहाए हैं
लम्हात चले जितने परवाज कहाए हैं।




मौसम ने रचते रहने की
      
मौसम ने रचते रहने की
    ऐसी हमें पढ़ाई पाटी

रखी मिली पथरीले आंगन
माटी भरी तगारी
उजली-उजली धूप रसमसा
आंखें सींच मठारी
एक सिरे से एक छोर तक
पोरें लीक बनाई घाटी,
   मौसम ने रचते रहने की
   ऐसी हमें पढ़ाई पाटी।

आस-पास के गीले बूझे
बीचो-बीच बिछाये
सूखी हुई अरणियां उपले
जंगल से चुग लाए
सांसों के चकमक रगड़ाकर
खुले अलाव पकाई घाटी,
    मौसम ने रचते रहने की
    ऐसी हमें पढ़ाई पाटी।

मोड़ ढलानों चैके जाए
आखर मन का चलवा
अपने हाथों से थकने की
कभी न मांडे पड़वा
कोलाहल में इकतारे पर
एक धुन गुंजवाई घाटी
    मौसम ने रचते रहने की
    ऐसी हमें पढ़ाई पाटी।


कल ने बुलाया है

   मैंने नहीं कल ने बुलाया है!

खामोशियों की छतें,
आबनूसी किवाड़े घरों पर
आदमी आदमी में दीवार है -
   तुम्हें छैनियां लेकर बुलाया है
   मैंने नहीं कल ने बुलाया है!

सीटियों से सांस भर कर भागते,
बाज़ार - मिलों दफ्तरों को
रात के मुर्दे,
देखती ठंडी पुतलियां -
आदमी अजनबी आदमी के लिए
   तुम्हें मन खोलकर मिलने बुलाया है,
   मैंने नहीं कल ने बुलाया है!

बल्ब की रोशनी शेड में बंद है
सिर्फ परछाई उतरती है
बड़े फुटपाथ पर,
जि़न्दगी की जि़ल्द के ऐसे
ऐसे सफ़े तो पढ़ लिये,
    तुम्हें अगला सफ़ा पढ़ने बुलाया है,
    मैंने नहीं कल ने बुलाया है!


क्षण-क्षण की छैनी से

क्षण-क्षण की छैनी से
    काटो तो जानूं !

पसर गया है घेर शहर को
भरमों का संगमूसा,
तीखे-तीखे शब्द सम्हाले
जड़ें सुराखो तो जानूं !
   क्षण-क्षण की छैनी से...

फेंक गया है बरफ छतों से
कोई मूरख मौसम
पहले अपने ही आंगन से
आग उठाओ तो जानूं !
   क्षण-क्षण की छैनी से...
चैराहे पर प्रश्‍नचिन्ह-सी
खड़ी भीड़ को
अर्थ भरी आवाज लगाकर
दिशा दिखाओ तो जानूं !
   क्षण-क्षण की छैनी से
   काटो तो जानूं !


ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए

     ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए...

कुनमुनते तांबे की सुइयां
खुभ-खुभ आंख उघाड़े
रात ठरी मटकी उलटाकर
ठठरी देह पखारे,
बिना नाप के सिये तकाजे
    सारा घर पहनाए
    ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए...

सांसों की पंखी झलवाए
रूठी हुई अंगीठी,
मनवा पिघल झरे आटे में
पतली कर दे पीठी
सिसकी सीटी भरे टिफिन में
    बैरागी-सी जाए
    ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए...

पहिये पांव उठाए सड़कें
होड़ लगाती भागें
ठंडे दो मालों चढ़ जाने
रखे नसैनी आगे,
दो-राहों चौराहों मिलना
    टकरा कर अलगाए
    ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए...

सूरज रख जाए पिंजरे में
जीवट के कारीगर,
रचा घड़ा सब बांध धूप में
ले जाए बाजीगर,
तन के ठेले पर राशन की
    थकन उठाकर लाए -
    ड्योढ़ी रोज शहर फिर आए !


रेत में नहाया है मन!

     रेत में नहाया है मन!

आग ऊपर से, आंच नीचे से
वो धुंआए कभी, झलमलाती जगे
वो पिघलती रहे, बुदबुदाती बहे
इन तटों पर कभी, धार के बीच में
     डूब-डूब तिर आया है मन -
     रेत में नहाया है मन!

घास सपनों की, बेल अपनों की
सांस के सूत में सात सुर गूंथकर
भैरवी में कभी, साध केदारा
गूंगी घाटी में, सूने धोरों पर
    एक आसन बिछाया है मन -
    रेत में नहाया है मन!

आंधियां कॉंख में, आसमां आंख में
धूप की पगरखी, तॉंबई अंगरखी
होठ आखर रचे, शोर जैसा मचे
देख हिरनी लजी, साथ चलने सजी
    इस दूर तक निभाया है मन -
    रेत में नहाया है मन!