Tuesday, May 11, 2021

 


मुक्तिबोध का काव्य-नायक

·        नंद भारद्वाज

जानन माधव मुक्तिबोध के संपूर्ण काव्‍य-लेखन में एक अनवरत क्रियाशील व्यक्तित्व की उपस्थिति साफ दिखाई देती है - एक ऐसा व्यक्तित्व जो अपने दीखत आकार, प्रकृति और क्रियाशीलता में नितान्त सामान्य और सहज होते हुए भी अपने रचनात्मक प्रभाव में असाधारण और विशिष्‍ट है। वह किसी श्रम को छोटा और हेठा नहीं मानता। उसकी तुलना आप राह चलते किसी भी पढ़े-लिखे जागरूक व्यक्ति या उस श्रमिक से कर सकते हैं, जो अपनी निजी प्रकृति में परिश्रमी, सहज और ईमानदार है। अपने अस्तित्व और ईमान को बनाए रखने के लिए वह कोई भी कार्य करने को प्रस्तुत रहता है, जो अपने प्रति किसी और के अन्याय को सह बेशक लेता हो, अपने संज्ञान में खुद किसी के साथ अन्याय नहीं करता और न किसी अन्य के साथ होते अन्याय पर मूक दर्शक बना रहना पसंद करता है। यही वह नायक है जो मुक्तिबोध की सभी कविताओं के केन्द्र में सक्रिय और बेचैन दिखाई देता है और जो अपने समय और आत्म से संघर्ष करता हुआ इन कविताओं को नयी अर्थ-गरिमा प्रदान करता है।

 

     इस सामान्य परिचय के अतिरिक्त मुक्तिबोध के इस काव्य-नायक की कोई शास्त्रीय व्याख्या यहां अनावश्‍यक है - यहां नायक की वह बुनियादी अवधारणा ही उन शास्त्रीय अपेक्षाओं से रहित है, जो नायक को कविता या जीवन में कोई विशिष्टता प्रदान करती हो, और फिर इस काव्य-नायक के पास तो उसकी समाज-सापेक्ष जीवनचर्या में ऐसा कुछ भी विशिष्ट या विलक्षण नहीं है, जिसे शास्त्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण या उदात्त कहा जा सके। जो अपने को विशिष्ट और विलक्षण कहते हैं - अपनी ही दृष्टि में महत्वपूर्ण, उनसे मुक्तिबोध का यह नायक दो-टूक शब्दों में साफ कहता है - 

           मैं तुम लोगों से इतना दूर हूं

           तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न हैं

           कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।

                                        (चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 104) 

बल्कि जब ये विशिष्टउसे छोटा और हेठा समझकर उसकी उपेक्षा करते हैं तो वह अपने पूरे आत्म-सम्मान के साथ उन्हें यह बता देना भी ज़रूरी समझता है कि - 

           मैं अपनी सार्थकता में खिन्न हूं

           निज से अप्रसन्न हूं

           इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए

           पूरी दुनिया साफ करने के लिए मेहतर चाहिए

           वह मेहतर मैं हो नहीं पाता

           पर, रोज कोई भीतर चिल्लाता है

           कि कोई काम बुरा नहीं

           बशर्ते कि आदमी खरा हो

           फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता।

                                                                 ( वही, पृ. 104-105)      

और निश्‍चय मानिये, उसका यह आत्म-स्वीकार उन विशिष्टों के मन-मस्तिष्क में एक शर्म और दहशत भी पैदा करता है, जो जानते हैं कि वे उसी के श्रम पर जिन्दा हैं और उसकी इस दुर्दशा के लिए वही जिम्मेदार भी। 

    मुक्तिबोध का यह काव्य-नायक एक खास तरह की समाज-व्यवस्था में जीता हुआ - उसका समग्र विश्‍लेषण करते हुए इस नतीजे पर पहुंचता है कि यह शोषण की सभ्यताहै और वह उस व्यवस्था के विरुद्ध वृहत्तर वर्ग के हित में लड़े जाने वाले क्रान्तिकारी संघर्ष में अपनी कारगर भूमिका तय करता है। कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने इस व्यक्तित्व के बारे लिखा है - ‘‘कविता के केन्द्र में एक दृढ़ व्यक्तित्व है, लेकिन वह अपने आपको मानवीय सम्पर्क से बचाता, अपनी अद्वितीयता और परमता को सुरक्षित करने में आत्म-तुष्ट व्यक्तित्व नहीं है। वह ऐसा व्यक्तित्व है जो ललकार और उत्साह में तादात्म होता है, बल्कि वह अपनी परिभाषा के लिए मनुष्य के नितान्त अकेलेपन को नहीं, उसके साहचर्य और बिरादरीपन को आधार बनाता है।’’ मुक्तिबोध का यह व्यक्तित्व चूंकि ऐसे खुले, ईमानदार और आत्म-सजग कवि का काव्य-नायक है, जिसके बारे में कवि ने कोई भी बात, कोई खासियत या खामी छुपा-बचा कर नहीं रखी है। 

    अमूमन ऐसा देखा गया है कि सभी रचनाकारों का काव्य-नायक या कथा-नायक प्रकारान्तर से उस लेखक-विशेष के जीवन-व्यवहार, उसके विश्‍वासों, सिद्धान्तों और क्रिया- कलापों का ही प्रतिरूप हुआ करता है, लेकिन यह कतई जरूरी नहीं कि उसी लेखक का यह पात्र हर बार वही एक-सरीखा हो, बल्कि कई बार लेखक की एक ही रचना में उसके सिद्धान्तों, जीवन-व्यवहार और उसकी मूल-प्रकृति से मेल खाते ऐसे अनेक पात्र भी हो सकते हैं, जो उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हों। इस बात को कथा-शिल्पी शरतचन्द्र चटर्जी के पात्रों की परिकल्पना से बखूबी समझा जा सकता है। किन्हीं अर्थों में यह बात मुक्तिबोध पर भी उसी रूप में लागू होती है। उनकी सभी रचनाओं में उनका काव्य-नायक अपनी तमाम खूबियों या खामियों के साथ कम ही प्रकट हुआ है, बल्कि अलग-अलग रचनाओं में रूपायित उस व्यक्तित्व के अंशों को जोड़कर ही उनके इस नायक की ठीक-सी प्रतिमा खड़ी की जा सकती है। 

      मुक्तिबोध की कविता की मूल प्रकृति आत्मसंघर्षपरक है, इसलिए उन्होंने अपनी कविताओं में इसी काव्य-नायक के आत्म-संघर्ष को उभार कर सामने रखा है। साथ ही उनकी कविताओं में जहां व्यापक जन-संघर्ष और वह भी निर्णायक दौर का संघर्ष नाटकीय धरातल पर अभिव्यक्त हुआ है, वहां उन्हें फैंटेसी या स्वप्न-कथा का सहारा लेना पड़ा है और वहां यह काव्‍य-नायक एक मुक्तिकामी स्‍वप्‍नद्रष्‍टा के रूप में सामने आता है। कोई आश्‍चर्य नहीं कि समाजवादी यथार्थवाद के कुछ अतिरिक्त आग्रही आलोचक इसी बात को लेकर उन पर अयथार्थवादी शिल्प अपनाने का आरोप लगाएं। इस तरह के आरोपों का उत्तर डॉ. नामवर सिंह उन्हें मुक्तिबोध के ही शब्दों में बखूबी दे चुके हैं कि ‘‘यथार्थवादी शिल्प और यथार्थवादी दृष्टिकोण में बुनियादी अन्तर है। यह बहुत सम्भव है कि यथार्थवादी शिल्प के विपरीत जो भाववादी शिल्प है - उस शिल्‍प के अन्तर्गत जीवन को समझने की दृष्टि यथार्थवादी रही हो।’’ प्रकारान्तर से स्वयं मुक्तिबोध भी कला के शिल्प और उसकी आत्मा में अन्तर करने पर विशेष बल देते हैं। 

     बहरहाल, ‘चांद का मुंह टेढ़ा हैऔर अंधेरे मेंजैसी लंबी कविताओं में मुक्तिबोध ने जिस व्यापक नाटकीय धरातल पर निर्णायक दौर के जन-संघर्ष को अभिव्यक्ति दी है, वह उनके काव्य-नायक की गहरी सामाजिक आस्था और उसकी वृहत्तर आकांक्षाओं की चरम परिणति का पूर्वाभास देती है। लेकिन इस परिणति तक पहुंचते हुए काव्य-नायक को एक बहुत बड़े ऊजड़ भटकाव और उलझावभरी यात्रा तय करनी पड़ती है। कई बार संघर्ष के दौरान वह थककर पस्त होने की हालत तक जा पहुंचता है - वह यह तय नहीं कर पाता कि इस अनिश्चितता और इस अनिर्णय की स्थिति से कैसे उबरा जाय। उनकी कविताओं की बजाय संकल्प-विकल्प का यह रूप मुक्तिबोध की कहानियों में अधिक मुखर होकर सामने आया है। काव्य-नायक और कथा-नायक के जीवन-संघर्ष के समानान्तर ऐसे अनेक पात्र हैं, जो न केवल टूट-बिखर जाते हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो वे परिस्थितियों के सम्मुख हार खाते भी दीखते हैं, उनके यही पात्र समाज में विद्रूप बनकर रह जाते हैं - विद्रूपकहानी का सर्वटे और क्लॉड ईथरलीका प्रतीक पात्र ऐसे ही उदाहरण हैं, याकि कुछ भिन्न अर्थ में ब्रह्मराक्षसकविता का प्रतीक-पात्र ब्रह्मराक्षस भी! लेकिन ब्रह्मराक्षस और काव्य-नायक मैंके ऑर्गेनिक चरित्र में एक बुनियादी अन्तर है, और वह अन्तर है उनका भिन्न वर्ग-चरित्र। 

     प्रत्येक समाज-व्यवस्था में दो तरह के वर्ग होते हैं - एक बुनियादी वर्ग और दूसरा गैर-बुनियादी वर्ग। मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में इन्हीं दो वर्गों की स्थिति को रेखांकित किया जा सकता है - इन बुनियादी वर्गों में पूंजीपति और सर्वहारा हैं, जबकि गैर-बुनियादी वर्गों में मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग, जिन्हें दूसरे शब्दों में दरम्यानी तबके भी कहा जाता है। इन दरम्यानी तबकों में पूंजीवादी विकास के साथ-साथ अन्दरूनी तौर पर कई और भिन्न स्तर उत्पन्न होते जाते हैं और उनके बीच तेजी से फैलती एक ऐसी संक्रामक स्पर्धा, जो अन्दर ही अन्दर उन्हें खोखला किये देती है। कालान्तर में वर्ग-संघर्ष की ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान इस दरम्यानी तबके का अधिकांश इसी अन्दरूनी स्पर्धा में नष्ट हो जाता है और वही व्‍यापक स्‍तर पर सर्वहारा वर्ग में रूपान्‍तरित होता है। इसके विपरीत एक नगण्य-सी संख्या ही पूंजीपति वर्ग में प्रवेश कर पाती है। ब्रह्मराक्षसइसी मध्यम वर्ग का एक टिपिकल चरित्र है, जो अपने मुखर सामन्ती संस्कारों के कारण अपनी ही सीमाओं, अपने ही सीमित दायरों, आकांक्षाओं और अपने ही अन्तर्विरोधों की त्रासदी बनकर रह जाता है, जबकि अपनी निम्न-मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, प्रवृत्तियों, लघु लालसाओं और अपने अन्तर्विरोधों से लड़ता हुआ मुक्तिकामी काव्य-नायक अपने को निरन्तर डी-क्लास करता हुआ, खुद को सर्वहारा के व्यापक संघर्ष के साथ मिलाने में कामयाब रहता है। इस काव्य-नायक और ब्रह्मराक्षस के बीच यही एक बुनियादी अन्तर्विरोध है, लेकिन यह वैमनस्यरहित अन्तर्विरोध है, जो भिन्न स्तर पर एक-दूसरे को जोड़े भी रखता है। यही वजह है कि मुक्तिबोध का यह काव्य-नायक इतिहास के प्रति सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ब्रह्मराक्षस के महत्व और उसके साथ अपनी आन्तरिकता को तो स्वीकार करता ही है, भविष्य में इस साहचर्य को और सार्थक बनाने की ओर भी संकल्‍पबद्ध होता दिखाई देता है - 

            आत्मचेतस् किन्तु इस

            व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन ....

            विश्वचेतस् बेबनाव !!

            महत्ता के चरण में था / विषादाकुल मन !

            मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि  

            तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर / बताता मैं

            उसे उसका स्वयं का मूल्य / उसकी महत्ता !

            वह उस महत्ता का / हम सरीखों के लिए उपयोग

            उस आन्तरिकता का बताता मैं महत्व !!

                             (ब्रह्मराक्षस: चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 16)

       मुक्तिबोध की अधिकांश कविताओं में काव्य-नायक के अतिरिक्त ब्रह्मराक्षस की आकृति सरीखे कुछ ऐसे प्रतीकात्मक आप्तवादी चरित्र और भी हैं, जो प्रकारान्तर से उसी के व्यक्तित्व का विस्तार दीखते हैं, यद्यपि अपनी प्रकृति और आचार-व्यवहार में वे उससे कुछ अलग भी हैं - ओरांगउटांग, काव्यात्मन् फणिधर, मसीहा, रक्तालोक स्नात्-पुरुष (कवि की परम अभिव्यक्ति) आदि इसी तरह के आप्तवादी चरित्र हैं। इनके अतिरिक्त गांधी, तिलक, तॉलस्तॉय आदि आधुनिक युग के ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का भी काव्य-नायक के आदर्श चरित्र की निर्मिति में सार्थक प्रयोग हुआ है। इन आदर्श चरित्रों और काव्य-नायक का आपसी संबंध अलग-अलग कविताओं में अलग तरह से व्यक्त हुआ है। कभी काव्य-नायक इन ऐतिहासिक चरित्रों को समझता-समझाता हुआ दिखाई देता है, तो कभी ये चरित्र काव्य-नायक का दरवाजा खटखटाते दिखाई देते हैं। कभी किसी अंधेरे कोने से काव्य-नायक जब यह फटकार सुनता है - 

             अंधेरे कोने में एकान्त

             न जाने किस मास्टर की डांट पड़ रही है -

                   जितना भी किया गया

             उससे ज्यादा कर सकते थे,

             ज्यादा मर सकते थे !

 तो वह उस डांट से कतराता नहीं, न ही कोई सफाई देता है, बल्कि उसे बेहिचक कुबूल करता है और कई बार तो अपनी आत्म-भर्त्सना पर उतर आता है। वह अपनी कमियों और खामियों के लिए खुद को माफ़ नहीं करता और न अपनी परिस्थितियों या सीमाओं की एवज में कोई सुविधा या रियायत मांगता है। अंधेरे मेंकविता में उस मुक्तिकामी कलाकार की हत्या को अपने सामने घटित होते देखकर उसका मन आत्म-ग्लानि से सिहर उठता है -

            सवाल है - मैं क्या करता था अब तक,

            भागता फिरता था सब ओर ! 

और यहीं से उसे सही दिशा का बोध भी होता है -

             फिजूल है इस वक्त कोसना खुद को,

            एकदम ज़रूरी दोस्तों को खोजूं

            पाऊं मैं नये नये सहचर

            सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर !! 

     मुक्तिबोध के इस काव्य-नायक के लिए आलोचकों ने कुछ अतिरिक्त विशेषण भी जुटाए हैं। अंधेरे मेंकविता का विश्‍लेषण करते हुए डॉ. नामवरसिंह ने लिखा है - ‘‘नाटकीय कौशल के लिए कविता का मैंदो व्यक्ति चरित्रों में विभक्त कर दिया गया है: एक है काव्य-नायक मैंऔर दूसरा उसी का प्रतिरूप वह। यह विभाजन वस्तुतः एक नाटकीय कौशल मात्र नहीं, बल्कि इसका आधार आत्म-निर्वासन’ (सैल्फ एलिएनेशन) है। अंधेरे मेंकविता का काव्य-नायक एक आत्म-निर्वासित व्यक्ति है और जिसके आत्म- निर्वासन का प्रतीक है गुहावास।’’ (कविता के नये प्रतिमान) इस बात से कोई इनकार नहीं कि मुक्तिबोध ने अपनी अनेक कविताओं की भांति इस कविता में भी नाटकीय कौशल का सहारा लिया है, तथापि कविता का वहकाव्य-नायक मैंका ही प्रतिरूप है लेकिन यहां ऐतराज काव्य-नायक के लिए लगाए जाने वाले अतिरिक्त विशेषण आत्म-निर्वासनपर खड़ा होता है, क्योंकि यह आत्म-निर्वासन काव्य-नायक ने खुद आगे बढ़कर कुबूल नहीं किया है, बल्कि इसके लिए उसे विवश किया गया है - 

              प्रश्‍न थे गंभीर, शायद खतरनाक भी,

              इसीलिए बाहर के गुंजान

              जंगलों से आती हुई हवा ने

              फूंक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी -

              कि मुझको यों अंधेरे में पकड़कर

              मौत की सजा दी !

              किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही

              आंखों में बंध गयी,

              किसी खड़ी पाई की सूली पर टांग दिया गया,

              किसी शून्य बिन्दु के अंधियारे खड्डे में

              गिरा दिया गया मैं / अचेतन स्थिति में।

                           (अंधेरे में: चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 247) 

इस सूरत में यह कहना कम सही प्रतीत होता है कि उस ‘‘प्रतिरूप से काव्य-नायक डरता है, कतराता रहता है और इसीलिए उसे टालता भी है कि स्वयं उसे अपनी कमजोरियों से लगाव है’’, और फिर ‘‘दोस्तॉएव्सकी के अण्डर-ग्राउंड मैनके समान ही यह व्यक्ति भी बाह्य परिस्थितियों से भय खाकर एक लंबी तिलस्मी खोह में निवास करता है।’’ जबकि वास्तविकता यह है कि अंधेरे मेंका काव्य-नायक किसी बाह्य भय से गुहावास या तिलस्मी खोह की शरण नहीं लेता, बल्कि उसे बाह्य शक्ति ने पकड़कर मौत की सजा दीहै। यह निर्वासन उसका अपना वरण नहीं और इसीलिए यह उसके लिए मौत की यंत्रणा से कम नहीं है। 

      कविताओं की शुरुआत में मुक्तिबोध अमूमन वस्तु-जगत की पेचीदा स्थितियों का भयावह खाका खींचते हैं - गहन सन्देह और अनिश्‍चय के लंबे गहराते काले डैश, चिरथिर अंधेरा, काली जिह्वानुमा सड़कें, कुहरे में उभरती हुई पहाड़ों की आकृतियां और अक्सर इन्हीं के बीच क्रियाशील या प्रश्‍नाकुल काव्य-नायक की उपस्थिति का अहसास - मुझे याद आते हैंकविता में काव्य-नायक कुछ इसी तरह की मनःस्थिति से गुजरता है - 

           अपने मस्तिष्क के पीछे अकेले में

           गहरे अकेले में

           जिन्दगी के गन्दे न-कहे-जानेवाले

           अनुभवों के ढेर का

           भयंकर विशालाकार प्रतिरूप !!

           स्याह !

           देखकर चिहुंकते हैं प्राण

           डर जाते है ं:

                                    (चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 75) 

लेकिन यह डर तभी तक रहता है जब तक कि काव्य-नायक अपने ही परिवेश-दायरे में सीमित होता है, वह ज्यों ही घनी आबादी वाले भीतरी भागों - मजदूर बस्तियों या गांवों की गलियों की तरफ बढ़ता है, तो वहां जीवन के लिए संघर्ष में जुटे लोगों की कर्मठता और अपने वर्ग के प्रति गहरा लगाव देखकर एक नयी स्फूर्ति प्राप्त करता है - 

            कुछ पलों बाद -

            हिये में प्रकाश-सा होता है

            खुलती हैं दिशाएं, उजला आंचल पसारे हुए

            रास्ते पर रात होते हुए भी मन में प्रात

            नहा-सा मैं उठता किसी नव-स्फूर्ति से

            असह्य-सा स्वयं-बोध विश्‍व-चेतना-सा कुछ

                                           (चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 80) 

        इस काव्य-संरचना से कोई यह अर्थ निकाल बैठे कि मुक्तिबोध खींच-तानकर अपनी कविताओं और काव्य-नायक को अंततः इस उबरी हुई स्थिति में ले आते हैं, तो यह उनके सोच की सीमा है। मुक्तिबोध की कविताओं में रचाव की सम्पूर्ण प्रक्रिया काम करती है और वही कविता अपने रचनात्मक अनुभव और चरम परिणति में आश्‍वस्त भी करती है। इसके विपरीत जिन रचनाकारों के काव्य-नायकों की परिणति शून्य या हताशा में होती है, वे कविताएं या तो अपनी भाव-भूमि पर अधूरी होती हैं, अथवा भाववादी दृष्टि का शिकार होकर किसी अमूर्तन या निहायत शाब्दिक विलास बनकर रह जाती हैं।

           

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मोबा  9829103455

 

 

Wednesday, February 17, 2021

 


कृष्‍णा सोबती : एक विलक्षण व्‍यक्तित्‍व  

 विभाजन-पूर्व के पंजाब सूबे का पुराना शहर उदयगिरी गुजरात (जो अब पाकिस्‍तान में है) और उसके करीब स्थित चिल्लियांवाला मैदान, राजा रणजीतसिंह की सिक्‍ख सेना और फिरंगी फौज के बीच हुई तीन लड़ाइयों के कारण अपना ऐतिहासिक महत्‍व रखता है। इसी सिक्‍ख सेना ने जहां दो बार ब्रिटिश सेना को करारी मात दी, वहीं तीसरी मुठभेड़ में ब्रिटिश सेना ने उसी सिक्‍ख सेना को मात देकर 21 फरवरी, 1849 को पूरे पंजाब पर अपना कब्‍जा जमा लिया। इसी गुजरात शहर के मूल निवासी दीवान जे सी सोबती की सोबतिया हवेली में उनके पुत्र पृथ्‍वीराज और बहू दुर्गा की कोख से 18 फरवरी, 1925 को जिस सुकुमार कन्‍या का जन्‍म हुआ, तब किसी को यह कल्‍पना भी नहीं थी कि आनेवाले समय में यही कन्‍या सुविख्‍यात कथाकार कृष्‍णा सोबती के नाम से हिन्‍दी-जगत में अपनी विशिष्‍ट पहचान बनाएगी। इस पुश्‍तैनी विरासत और बचपन की स्‍मृतियों का हवाला देते हुए कृष्‍णा जी अक्‍सर उन स्‍मृतियों से अपने स्‍वाभाविक लगाव और स्‍वाभिमान से भर उठती थीं।

     पिता पृथ्‍वीराज सोबती तब भारत की ब्रिटिश सरकार में सीनियर सिविल सर्वेण्‍ट के रूप में कार्यरत थे, जो छह महीने शिमला और छह महीने दिल्‍ली रहा करते थे। बच्‍चे जब स्‍कूल जाने लायक हो गये, तब से वे परिवार को अपने साथ ही रखने लगे थे। कृष्‍णा जी बड़ी बहन राज दीदी और उनसे छोटे भाई थे जगदीश के कुछ अंतराल बाद सबसे छोटी बहन पैदा हुई थी सुषमा, इन सबको मिलाकर वे चार भाई बहन थे। कृष्‍णा सोबती ने अपने जन्‍म और बचपन और पारिवारिक पृष्‍ठभूमि को लेकर साहित्यिक पत्रिका ‘अन्‍यथा’ से एक विस्‍तृत बातचीत में बहुत दिलचस्‍प ब्‍यौरा दिया था। उन्‍होंने कहा था – “हर किसी की तरह जन्‍म लेने के लिए मुझे भी परिवार चुनने की छूट तो नहीं थी। आंख खोलते ही विविधताओं के तीन अकाउंट मेरे नाम के इम्‍पीरियल बैंक में खुल गए। पहला खाता खुला ननिहाल घर में। क्‍या नहीं था इसमें। चनाब का मनमौजी किनारा, लहराते खेत, लय में चलते रहट, अमृत भरे कुंए-कुंइयां, छांहदार पेड़, मुंडेरों पर खड़े मोटे गाढ़े में खुरदरे लोग, मजबूत कद-काठीवाली गरमीली मुटियारें। दूसरा खाता खुला ददियाल घर। उदयगिरी गुजरात। चिल्लियां वाले मैदानवाला ऐतिहासिक शहर। फिरंगी को हमारी सेनाओं ने दो बार मात दी और तीसरी बार हार कर रणजीतसिंह का पंजाब अंग्रेजों ने हथिया लिया। सर्रायों से लगी सोबतियों की हवेली छोटी ईंट में चुनी। तीन पाटों वाला लकड़ी का फाटक, पीतल के कीलों की जड़तवाला। खुला सहन। -- हवेली पर उतरती थी दोहरी सांझ। चढ़त का वक्‍त गुजर चुका था और धीरे-धीरे उतार पसर रहा था। लड़ाइयों की गवाह इमारत खुद हारी हुई लगती थी। अपने को विशेष का वंशज समझनेवाले खानदान का गुम्‍बद ढहने लगा तो दादा साहिब गुजरात से रावलपिंडी को निकल गए। छावनी में अच्‍छे अधिकारी की कुर्सी पा ली। पिंडी और मरी, फिर तबादला कलकत्‍ता। डिफैंस के मेडिकल में। मेरे पिताजी और उनके छोटे भाई सब वहीं बड़े हुए। राजधानी कलकत्‍ता से दिल्‍ली आ गई तो फिर परिवार छह महीने दिल्‍ली और छह महीने शिमला। छुट्टियों में हम कभी अपने वतन गुजरात जाते। कभी उसे अपनी और कभी पराई आंखों से देखते। वहां अब भी बहुत कुछ ऐसा था जो मूल्‍यवान था और ऐसा भी जो फीका, खस्‍ता हालत में था। वह उस पर से गुजर चुके गुलजार और वीरान मौसमों की याद दिलाता। अपनी हवेली का पता हम में खास तरह का स्‍वाभिमान जगाता। सोबती स्‍ट्रीट, डिस्टि्रक्‍ट गुजरात, पंजाब। फिर उमंग से लौटते अपनी दिल्‍ली, शिमला की सुहानी धूप में।" (वही, पृ 172)

     उस समय के घरेलू वातावरण और पारिवारिक अनुशासन को याद करते हुए वे कहती हैं, “हम बच्‍चों को अपनी बात कहने की खुली छूट थी। हमें इतना विश्‍वास था कि जो बात ठीक होगी, वह मान ली जाएगी। अनुशासन न तो इतना कड़ा था कि हम मन-ही-मन कुढ़ते रहें और न ही लाड़-प्‍यार से बिगड़ जाएं। बड़ों की ओर से एकल परिवार की चौखट में कुछ ऐसा सिखाया गया कि‍ हममें सही और गलत को जान लेने की तमीज हो। और इसकी तालीम भी कि हर बार सही वही नहीं होगा जो बड़े कहते हैं, सही वह भी होगा जो बच्‍चे कहते हैं। अपनी अपनी बात कहने की हमें पूरी आजादी थी।" (वही, पृ 103) अपने इस बाल्‍यकाल के कुछ वर्ष सोबतिया हवेली में बिताने के बाद कृष्‍णा सोबती अपनी स्‍कूली शिक्षा के लिए पिता के पास शिमला आ गईं और वहां की लेडी इ‍रविन स्‍कूल में उन्‍हें दाखिला दिलवा दिया गया। वहीं दूसरे स्‍कूल हारकोर्ट बटलर में उनका भाई जगदीश भी पढ़ता था, जहां हिन्‍दी के जाने-माने कथाकार निर्मल वर्मा उसके सहपाठी हुआ करते थे। कृष्‍णाजी उन्‍हें भाई के सहपाठी के रूप में जानती अवश्‍य थी, लेकिन तब उनसे कोई विशेष परिचय नहीं था और न उन्‍हें इस बात का कोई इल्‍म ही था कि आनेवाले समय में वे दोनों हिन्‍दी के महत्‍वपूर्ण कथाकारों में गिने जाएंगे। तब के शिमला के वातावरण और अंग्रेजी राज के असर का हवाला देते हुए वे कहती हैं : “यह ब्रिटिश राजधानी होने का असर था कि भारतीय लोग भी बहुत औपचारिक व्‍यवहार करने लगे थे। शहर भी दो हिस्‍सों में बंटा था – लोअर बाजार में भारती की खुशबू मिलती थी, तो मॉल का अपर बाजार अपनी अंग्रेजियत के लिए जाना जाता था। शिमला में उन दिनों ब्रह्म समाज और आर्य समाज दोनों सक्रिय थे। ब्रह्म समाज के सदस्‍य शिक्षित लोग थे, जो देखने में अंग्रेज लगते थे। आर्य समाज वहां का हिन्‍दी का वाहक बना।" अपनी स्‍कूली शिक्षा के दौरान शिमला में हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन के अधिवेशन और उसमें भाग लेने वाले लेखकों के एक जुलूस का स्‍मरण करते हुए कृष्‍णा सोबती ने उसे अपने जीवन-अनुभव के लिए निर्णायक मानते हुए उसमें महाकवि निराला की मौजूदगी को बहुत आत्‍मीयता से याद किया। वे कहती हैं, “सन् छत्‍तीस या सैंतीस में हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन का शिमला अधिवेशन हुआ। उस सम्‍मेलन का अनुभव मेरे लिए निर्णायक साबित हुआ। शिमला अधिवेशन में अध्‍यक्ष बनकर ‘आज’ के संपादक पंडित बाबूराव विष्‍णु पराड़कर आए थे। सम्‍मेलन में निराला, भगवतीचरण वर्मा, सुमन, विद्यावती कोकिला भी आईं थी। हमें पता चला कि‍ मालरोड पर इन लेखकों का जुलूस निकलेगा तो हम फूल लेकर सड़क किनारे खड़े हो गए। अनोखा जुलूस था। सरदारों ने हाथ में नंगी तलवारें ले रखी थीं। निराला जी लंबे थे, उन्‍होंने हम बच्‍चों को नहीं देखा। हमने भगवतीचरण वर्मा, सुमन, कोकिला को फूल भेंट किए। बाद में सम्‍मेलन में निराला जी ने जब कविता पढ़ी तो सारा हॉल उत्‍तेजित हो गया। निराला की कविता ने श्रोताओं को अजीब तरह से उत्‍साहित कर दिया था।" उसी अवसर पर भगवतीचरण वर्मा से हुई अपनी भेंट और अपने आरंभिक लेखन की शुरूआत का हवाला देते हुए कृष्‍णा जी ने बताया कि “मैंने भगवतीचरण वर्मा का ऑटोग्राफ लिया था। वहीं उन्‍होने बताया कि वे कलकत्‍ता से ‘विचार’ निकालने जा रहे हैं। मैंने ‘विचार’ का पता लिया और उसी में मेरी पहली कहानी ‘उसकी रोटी’ शायद सन् उन्‍तालीस में छपी थी। बाद में अज्ञेय जी ने ‘प्रतीक’ में मेरे उपन्‍यास का अंश ‘चन्‍ना’ और कहानी ‘सिक्‍का बदल गया’ को छापा। इस तरह लिखने की शुरुआत हुई तो फिर क्रम चलता रहा। (वही, पृ 151-152)

    कृष्‍णा जी के इस ब्‍यौरे से यह बात स्‍पष्‍ट हो जाती है कि उनके लेखन की शुरुआत शिमला में उनके स्‍कूली दिनों से ही हो गई थी। हालांकि शुरुआत उन्‍होने भी कविता से ही की थी, उस प्रसंग को याद करते हुए वे कहती हैं, “पहली कविता जब लिखी गई, मैं अपनी मां के साथ शिमला, इसे एक प्रतियोगिता में पढ़ने गई, और वहां मुझे इस पर पहला पुरस्‍कार मिला – एक रजत पदक। कॉलेज के दिनों तक मैं कविताएं लिखती रही और जल्‍दी ही मुझे मालूम हो गया कि‍ कविता मेरा क्षेत्र नहीं है, और मैं गंभीरता पूर्वक गद्य की तरफ मुड़ गई।" (वही, पृ 129)  अपनी हाई स्‍कूल तक की शिक्षा पूरी करने के बाद कृष्‍णा सोबती कॉलेज शिक्षा के लिए लाहौर आ गईं। लाहौर के फतेहचंद कॉलेज में जहां वे पढ़ती थीं, उसी कॉलेज में तेजी बच्‍चन अंग्रेजी की प्राध्‍यापक थीं और वे शेक्‍सपीयर के नाटकों में अपने जानदार अभिनय के कारण अच्‍छी प्रसिद्धि प्राप्‍त कर चुकी थीं। इसी कॉलेज में शिक्षा ग्रहण करते हुए कृष्‍णा सोबती अपने लेखन के प्रति और निरन्‍तर सक्रिय बनी रहीं। ‘लामा’ जैसी दिलचस्‍प कहानी उसी दौर की उपज के रूप में सामने आई। देश की आजादी के एक-दो साल पहले ही पंजाब और सीमान्‍त क्षेत्र का वातावरण लगातार तनावपूर्ण हो रहा था, ऐसे दौर में कृष्‍णा जी के पिता पहले ही दिल्‍ली आ गए थे और कृणा सोबती ने भी अपनी बची हुई कॉलेज शिक्षा दिल्‍ली में ही पूरी की और वे अपनी कहानियों और अपने पहले उपन्‍यास ‘चन्‍ना’ की तैयारी में जुट गईं। उनकी प्रमुख कहानियां ‘सिक्‍का बदल गया’, ‘मेरी मां  कहां है’, ‘डरो मत मैं तुम्‍हारी रक्षा करूंगा’, ‘खून, मिट्टी, सरसती’ जैसी कहानियां उसी विभाजन की पीड़ा से उपजी कहानियां हैं, जिसे कृष्‍णा सोबती जैसे रचनाकारों ने उस दौर को जी कर लिखा है। ‘चन्‍ना’ का पहला प्रारूप सन् 1952 में तैयार हो चुका था और उसे कृष्‍णा जी ने इलाहाबाद के प्रमुख प्रकाशन संस्‍थान भारती भंडार को प्रकाशित करने के लिए दे भी दिया, जो अगले दो साल तक उस पर कोई निर्णय नहीं कर सके। और जब छापने का मानस बनाया तो उसकी भाषा में इतने फेरबदल कर उसे छापना आरंभ किया कि‍ कृष्‍णा जी को तुरंत इसका मुद्रण रुकवाना पड़ा, क्‍योंकि प्रकाशक ने जो परिवर्तन किये थे, वे उन्‍हें स्‍वीकार्य नहीं थे। उन्‍होंने प्रकाशक को उसके छपे हुए तीन सौ पृष्‍ठों का भुगतान कर उपन्‍यास वापस अपने नियंत्रण में ले लिया और उसके प्रकाशन को लंबे समय के लिए स्‍थगित कर दिया। यही उपन्‍यास अपने लिखे जाने के अट्ठारह वर्ष बाद कुछ आवश्‍यक परिवर्तनों के साथ ‘जिन्‍दगीनामा’ शीर्षक से सन् 1979 प्रकाशित हुआ, जिस पर कृष्‍णा सोबती को सन् 1980 का साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्रदान किया गया और आज भी यह उपन्‍यास उनकी रचनाशीलता का महत्‍वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

     कृष्‍णा सोबती का पूरा जीवन यों तो एक स्‍वतंत्र पूर्णकालिक लेखक के रूप में व्‍यतीत हुआ, लेकिन आजादी के बाद अपनी कॉलेज शिक्षा पूरी होने तथा दिल्‍ली को ही स्‍थाई निवास बना लेने के बावजूद उन्‍होंने पारिवारिक जीवन की बजाय एक लेखक के रूप में एकाकी जीवन का विकल्‍प ही चुना। आजादी के तुरन्‍त बाद अपने जीवन की पहली नौकरी के रूप में दो वर्ष तक वे राजस्‍थान की पूर्व रियासत सिरोही के‍ राजघराने में रहीं, जहां उनमें एक स्‍वतंत्र देश के नागरिक होने का अहसास जगा। सिरोही राजघराने में शिक्षक और गवर्नेंस का काम करते हुए ज्‍यों ही राजघराने की अंदरूनी राजनीति और वहां के सामंती वातावरण से उनका मन ऊबने लगा, वे वापस दिल्‍ली लौट आईं और फिर एक स्‍वतंत्र लेखक के रूप में वहीं की होकर रह गईं। सन् 1980 से 1982 तक पटियाला में पंजाब विश्‍वविद्यालय की फैलो रहीं। उसके कुछ अरसे बाद वे दिल्‍ली लौट आईं और एक स्‍वतंत्र लेखक के रूप में अपने लेखनकर्म पर ही केन्द्रित हो गईं। उनके दो चर्चित उपन्‍यास ‘ऐ लड़की’ और ‘दिलो दानिश’ तथा संस्‍मरण सीरीज ‘हम हशमत’ का दूसरा भाग इन्‍हीं वर्षों में प्रकाशित होकर सामने आयीं। इसी दौर में वे साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कृत अपने उपन्‍यास ‘जिन्‍दगीनामा’ के शीर्षक संबंधी कॉपीराइट विवाद को लेकर अमृता प्रीतम से अदालती लड़ाई भी लड़ी और उसमें कामयाब भी हुईं। जिसकी वजह से अपने समय की इन दो बड़ी लेखिकाओं के आपसी रिश्‍ते थोड़े कटु भी रहे, लेकिन कृष्‍णा जी ने उस प्रसंग को लेकर अमृता प्रीतम पर सार्वजनिक रूप से कभी कोई टिप्‍प्‍णी नहीं की, जबकि अमृता प्रीतम ने कृष्‍णा जी के लेखन पर कई बार अनर्गल टिप्‍प्‍णियां भी की, जिनका कृष्‍णा जी ने कोई उत्‍तर देना मुनासिब नहीं समझा। इसी दौरान वे दूरदर्शन से विभाजन के दौर की कथा पर आधारित टीवी सीरियल ‘बुनियाद’ के निर्माण में सलाहकार के बतौर जुड़ी और मनोहरश्‍याम जोशी की पटकथा को उस समय के जीवन और परिवेश के अनुरूप जीवंत बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। सन् 1996 में वे तीन वर्ष के लिए भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान की राष्‍ट्रीय फैलो बनकर शिमला चली गईं, जहां उन्‍हें राष्‍ट्रपति निवास परिसर में पोस्‍टमास्‍टर्ज हाउस रहने के लिए अलॉट हुआ। कृष्‍णा जी के इस शिमला प्रवास के बारे में उनके उत्‍तर जीवन के साथी डोगरी के मशहूर लेखक शिवनाथ ने अपनी आत्‍मकथा ‘वे भी दिन थे’ में बहुत रोचक वर्णन किया है। संयोग से शिवनाथ जी भी राजकीय सेवा से मुक्‍त होने के बाद सन् 1989 में मयूर विहार, दिल्‍ली की हाउसिंग सोसाइटी ‘पूर्वाशा’ के अपने फ्‍लैट 505 में रहने के लिए आ गए थे, जहां उसी फ्‍लोर पर कृष्‍णा सोबती भी अपने फ्‍लैट 503 में रहा करती थीं, यों वे उनके लेखन से पहले से ही परिचित थे और पड़ौस में रहते हुए उन दोनों के बीच मैत्री का अच्‍छा रिश्‍ता भी बन गया। स्‍वयं कृष्‍णा जी ने भी शिवनाथ जी के साथ अपने संपर्क-सहयोग और रागात्‍मक संबंधों पर आधारित ‘समय सरगम’ जैसा महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास लिखा, जो सने 2000 में प्रकाशित हुआ था। दोनों के बीच के इसी आत्मिक लगाव का जिक्र करते हुए शिवनाथ‍ जी ने कृष्‍णा जी के शिमला प्रवास और उस दौरान वहां अपनी उपस्थिति का जिक्र करते हुए लिखा है – “एक दिन वे शिमला से दिल्‍ली आयीं तो मुझे अपने साथ शिमला चलने के लिए कहा। दिल्‍ली में उन दिनों डेंगू बुखार के बहुत केस हो रहे थे। डेंगू से बचने के लिए और राष्‍ट्रपति निवास में अपने पुराने महकमे के बंद डाकखाने के ऊपर बने डाकपाल के निवास के लिए बने फ्‍लैट के साथ अपना कुछ संबंध समझकर मैं उनके साथ चलने को राजी हो गया। तीन साल, मैं कुछ-कुछ दिनों के लिए उनका मेहमान बनकर पोस्‍टमास्‍टर्ज हाउस में ठहरता रहा। उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान में कृष्‍णा जी एक ही नेशनल फैलो थीं और संस्‍थान में उनका बहुत आदर-सम्‍मान और रुआब था।" (वे भी दिन थे, पृ 131) दरअसल कृष्‍णा जी के निजी जीवन और उनके जीवन-संघर्ष के बारे में उन्‍होंने अपनी कृतियों और साक्षात्‍कारों में बहुत सीमित शब्‍दों में बात की है, इसलिए उनके निजी जीवन के बारे में यह जिज्ञासा बनी ही रह जाती है कि एक व्‍यक्ति और लेखक के रूप में उन्‍होंने ऐसा एकाकी जीवन क्‍यों चुना? उनके उपन्‍यासों के केन्‍द्रीय स्‍त्री-चरित्र भी कभी चैन की पारिवारिक जिन्‍दगी ठीक से नहीं जी सके, वह चाहे ‘डार से बिछुड़ी’ की पाशो हो, ‘मित्रो मरजानी’ की मित्रो हो, ‘सूरजमुखी अंधेरे के’ की रत्‍ती हो, ‘तिन पहाड़’ की जया हो या ‘दिलो दानिश’ की महकबानो, ये सभी चरित्र अपने जीवन के अकेलेपन से संघर्ष करती रही हैं। बेशक उनके लेखन में और निजी जीवन में भी अकेलेपन का अभाव या अवसाद जैसा कुछ भी रेखांकित कर पाना कठिन है, बल्कि अपने इस अकेलेपन की वैयक्तिक स्‍वायत्‍ता को वे पूरी गरिमा के साथ जीती रही हैं। तभी तो वे अपने को ‘हशमत’ जैसे पौरुष किरदार में ढाल सकीं। और तो और उनके जीवन-सरोकार भी बहुत व्‍यापक थे। लेखकीय स्‍वतंत्रता, लोकतंत्र, सामाजिक न्‍याय और अपने मानवीय अधिकारों के प्रति वे किसी भी सत्‍ता या संस्‍थान के सामने झुकने को तैयार नहीं होती थीं, बल्कि उसे अपने लेखन और वैयक्तिक क्षमताओं में सीधी चुनौती देने को तैयार रहती थीं। कृष्‍णा जी के इस जुझारू व्‍यक्तित्‍व का जिक्र करते हुए अशोक वाजपेयी ने बहुत सटीक बात कही है – “कृष्‍णा जी उन मुद्दों और वृत्तियों के प्रति सजग थीं, जो हमारे सामाजिक जीवन में साहित्‍य से बाहर, उठते रहे हैं। स्‍वयं बंटवारे का शिकार होने के कारण भी उन्‍हें हमेशा पता था कि भारतीय समाज को लिंग, जाति, धर्म आदि आधारों पर बांटने की कोशिश करने वाली शक्तियां निरंतर सक्रिय हैं और इधर भयावह रूप से सशक्‍त और सत्‍तारूढ़ तक हो गयी हैं। इसलिए उनके विरुद्ध आवाज उठाना एक साहित्‍यकार के नाते उन्‍हें अपना नैतिक कर्तव्‍य लगता रहा। जब भारत के कुछ लेखकों ने देश में बढ़ती असहिष्‍णुता के विरोध में अपने पुरस्‍कार लौटाए तो न केवल 90 के ऊपर उम्र की कृष्‍णा जी ने अपनी साहित्‍य अकादमी फैलोशिप लौटा दी, बल्कि प्रतिरोध के लिए आयोजित एक सार्वजनिक सभा में व्‍हीलचेयर पर बैठकर बहुत जोरदार शब्‍दों में अपना विरोध व्‍यक्‍त किया।" (नया ज्ञानोदय, फरवरी 2019 पृ 7) 

   कृष्‍णा सोबती के साहित्यिक अवदान पर बात करने से पहले उनके कृतित्‍व को संक्षेप में जान लेना बेहतर होगा। यह बात सर्वविदित है कि कृष्‍णा सोबती सन् 1944-45 से कथा-लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुई और उनकी पहली कहानी ‘उसकी रोटी’ भगवतीचरण वर्मा की पत्रिका ‘विचार’ में सन् 1939 में प्रकाशित हुई तथा दूसरी कहानी ‘लामा’ 1950 में। उनकी सभी कहानियां उनके पहले कहानी संग्रह ‘बादलों के घेरे’ में संग्रहीत हैं। तब से अब तक सात दशकों की इस अथक साहित्‍य-यात्रा में उन्‍होंने ‘डार से बिछुड़ी’, ‘मित्रो मरजानी’, ‘सूरजमुखी अंधेरे के’, ‘यारों के यार’, ‘तिन पहाड़’, ‘जिन्‍दगीनामा’, ‘समय सरगम’, ‘दिलो दानिश’, ‘ऐ लड़की’ और ‘गुजरात पाकिस्‍तान से गुजरात हिन्‍दुस्‍तान’जैसी कथा-कृतियों तथा ‘जैनी मेहरबानसिंह’, ‘हम हशमत’, ‘लद्दाख : बुद्ध का कमंडल’, ‘मुक्तिबोध एक व्‍यक्तित्‍व की सही तलाश’ जैसी कथेतर कृतियों के माध्‍यम से हिन्‍दी और भारतीय साहित्‍य  जगत में अपनी विशिष्‍ट पहचान बनाई है। उनकी रचनाएं अनेक भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में अनुदित हैं।

     कृष्‍णा जी के साक्षात्‍कारों की नयी पुस्‍तक ‘लेखक का जनतंत्र’ के आवरण पर अंकित टिप्‍पणी में एक लेखक के रूप में कृष्‍णा सोबती की शख्सियत को रेखांकित सटीक वाकई गौरतलब है कि “लेखक की इस पहचान को स्‍वयं उन्‍होंने जिस अकुंठ निष्‍ठा और मौन संकल्‍प के साथ जिया, उसके आयाम ऐतिहासिक हैं। उनका लेखक सिर्फ लिखता ही नहीं रहा, उसने अपनी सामाजिक, राजनैतिक और नागरिक जिम्‍मेदारियों का आविष्‍कार भी किया और लेखकीय अस्तित्‍व के सहज विस्‍तार के रूप में उन्‍हें स्‍थापित भी किया।" कृष्‍णा जी ने इसी किताब की भूमिका में साहित्‍य कर्म की प्रकृति, स्‍वरूप और उसके संवेदन-संकल्‍प की अहमियत पर विशेष बल देते हुए यह बात कही है कि‍ “साहित्‍य अपनी गहराई, व्‍यापकता और संवेदन में सत्‍य, स्‍मृति, जिज्ञासा और उस उदात्‍त का वह शिखर है, जिस तक हम बराबर पहुंचना चाहते हैं। इसमें साहित्‍य की ऊर्जा और ऊष्‍मा रेखांकित है जिन्‍हें आप लिखी गई पंक्तियों के गुच्‍छे में महसूस करना चाहते हैं। शब्‍दों में से उभरती वैचारिक ऊष्‍मा, बौद्धिक ऊर्जा और भाषा के रूप में भाव का संवेदन। --- एक लेखक होने के नाते साहित्‍य और साहित्‍यकार की विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक पहचान और खुले उन्‍मुक्‍त संस्‍कार की सुरक्षा चाहती हूं। रचनात्‍मक प्रतिभा, मौलिकता, अस्मिता और गरिमा जैसे मूल्‍यवान शब्‍दों का अवमूल्‍यन नहीं होना चाहिए।" (वही, पृ 8) 

    हिन्‍दी उपन्‍यास में इसी लोकतांत्रिक चेतना के विकास की ओर संकेत करते हुए आलोचक डॉ मैनेजर पाण्‍डेय ने बहुत सही कहा है कि “हिन्‍दी उपन्‍यास की दुनिया में सचमुच लोकतंत्र तब आया, जब स्‍त्री लेखिकाओं ने अपने उपन्‍यासों में एक ओर पुरुष सत्‍ता का विश्‍लेषण और चित्रण आरंभ किया और दूसरी ओर स्‍त्री के संघर्ष की कथा को उपन्‍यास के केन्‍द्र में लाने का प्रयत्‍न किया। कृष्‍णा सोबती के उपन्‍यासों में स्‍त्री की दृष्टि से देखे गये भारतीय समाज और उसमें स्‍त्री-पुरुष के संबंधों के सच को अनेक रूपों में व्‍यक्‍त किया गया है। कृष्‍णा सोबती और मन्‍नू भंडारी यद्यपि स्‍त्रीवादी लेखिकाएं नहीं हैं, फिर भी इनके लेखन में पुरुष के छल-छद्म की शिकार स्‍त्री की विडम्‍बनापूर्ण स्थिति की अभिव्‍यक्ति है। मृदुला गर्ग ने कुछ अधिक साहस के साथ स्‍त्री-पुरुष संबंध के प्रसंग में स्‍त्री के अनुभव के ऐसे पक्षों को व्‍यक्‍त किया है, जो केवल एक स्‍त्री कर सकती है, कोई पुरुष नहीं। इस प्रक्रिया में उपन्‍यास के माध्‍यम से स्‍त्री ने अपनी स्‍वतंत्र पहचान बनाई है।" (उपन्‍यास और लोकतंत्र, पृष्‍ठ 30)

    कृष्‍णा सोबती के इस अपूर्व साहित्यिक अवदान के लिए अपने जीवनकाल में वे पद्मभूषण, ज्ञानपीठ पुरस्‍कार, साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, व्‍यास सम्‍मान, कथा चूड़ामणि पुरस्‍कार, साहित्‍य कला परिषद पुरस्‍कार, हिन्‍दी अकादमी के शलाका सम्‍मान, मैथिलीशरण गुप्‍त राष्‍ट्रीय सम्‍मान, पंजाब विश्‍वविद्यालय, पटियाला की फैलो और साहित्‍य अकादमी की महत्‍तर सदस्‍यता से सम्‍मानित हो चुकी हैं। इन तमाम राष्‍ट्रीय सम्‍मान-पुरस्‍कारों के बावजूद कृष्‍णा सोबती साहित्‍य की समग्रता में अपने को साधारण की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय मानते हुए  कहती हैं - “सच पूछिए तो लेखक की पहचान से हटकर मेरी दूसरी कोई पहचान नहीं है। अपने को खुशकिस्‍मत मानती हूं कि‍ साहित्‍यकारों, पाठकों, आलोचकों और सम्‍पादकों की एक बड़ी विशिष्‍ट बिरादरी मेरी बौद्धिक विरासत का अंग है। मेरी सोच का गहरा और बड़ा हिस्‍सा भी। अच्‍छा लगता है यह सोचकर कि‍ इसकी विस्‍तृत सीमाओं में मेरी भी एक छोटी-सी पहचान जुड़ी हुई है।" जबकि यह निर्विवाद तथ्‍य है कि एक सजग, सक्रिय और जीवंत लेखक के रूप में वे हिन्‍दी और भारतीय साहित्‍य-समाज में स्‍त्री-गरिमा का प्रतीक और जिन्‍दादिली मिसाल मानी जाती हैं। अपनी आयु के 94 वें बसंत के आखिरी चरण में कृष्‍णा सोबती अपनी लेखकीय उपलब्धियों और मानवीय गरिमा से भरा-पूरा महत्‍वपूर्ण जीवन जीकर 25 जनवरी, 2019 को इस भौतिक संसार से बेशक विदा ले गई हों लेकिन अपनी लेखकीय विरासत और कालजयी कृतियों के माध्‍यम से उनकी उपस्थिति हमारे आस-पास सदा बनी रहेगी।

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Sunday, January 24, 2021

 


कृष्‍णा जी की जीवन-कथा का सिरोही-प्रसंग

·        नन्‍द भारद्वाज

हिन्‍दी की प्रतिष्ठित कथाकार कृष्‍णा सोबती आजादी पूर्व के अखंड पंजाब के जिस गुजरात शहर में पैदा हुईं, वह विभाजन के बाद अब पाकिस्‍तान का हिस्‍सा है। उनके पिता ब्रिटिश शासन में सीनियर सिविल सर्वेंट थे और अपनी नौकरी के सिलसिले में वे आधे साल शिमला और आधे साल दिल्‍ली रहते थे। कृष्‍णा जी का बचपन और शिक्षा दीक्षा शिमला, दिल्‍ली और लाहौर में सम्‍पन्‍न हुई और वे किशोरावस्‍था पार होने तक अपने जन्‍म-स्‍थल गुजरात बराबर आती-जाती रहीं। उनकी मां दुर्गादेवी और भाई-बहन विभाजन से पहले शिमला-दिल्‍ली आ चुके थे, बल्कि उनके दादा तो उससे भी पहले अपने काम के सिलसिले में कलकत्‍ता पहुंच चुके थे। कृष्‍णा सोबती की जन्‍मभूमि और ननिहाल पश्चिमी पंजाब में होने की वजह से उस समूचे अतीत और वहां के लोकजीवन से उनका गहरा भावनात्‍मक जुड़ाव हमेशा बना रहा। उनकी अनेक कहानियां और शुरुआती दौर के उपन्‍यास उसी आंचलिक परिवेश और जीवन से संबंधित रहे हैं, वह चा‍हे ‘डार से बिछुड़ी’ हो, ‘जिन्‍दगीनामा’ हो, ‘ऐ लड़की’ हो यह ताजा उपन्‍यास ‘गुजरात पाकिस्‍तान से गुजरात हिन्‍दुस्‍तान’। सन् 2017 में अपने पहले संस्‍करण के रूप में प्रकाशित यह कथा-कृति प्रकारान्‍तर से उनकी अपनी ही जीवन-कथा का अंश है।

    इस ताजा उपन्‍यास का एक बड़ा अंश साहित्यिक पत्रिका ‘तद्भव’ में छपा था और उसे पढ़ते हुए यही अनुमान हुआ था कि शायद वे इसे अपनी आत्‍मकथा के रूप में लिख रही हैं, लेकिन जब यह मौजूदा रूप में सामने आया तो इतना ही स्‍पष्‍ट हुआ कि यह उनकी अपनी जीवन-कथा का एक अंश अवश्‍य है, अपने जीवन की पूरी कथा न उन्‍होंने कभी लिखी और न लिखने का कोई इरादा ही रहा। इस आत्‍मकथा में आजादी पूर्व के लाहौर से अपनी कॉलेज शिक्षा पूरी कर उनके दिल्‍ली आने और पहली नौकरी के रूप में राजपुताना की सिरोही रियासत के राजघराने में गवर्नेस के बतौर दो वर्ष तक कार्य करने तक के अनुभव दर्ज हैं। दो वर्ष बाद सिरोही से वापस दिल्‍ली लौटने के साथ ही इस जीवन-वृतान्‍त को वे वहीं विराम दे देती हैं। इस जीवन-कथा के आवरण पृष्‍ठ पर अंकित टिप्‍पणी भी इसी ओर संकेत करती है, जिसमें कहा गया है कि “इस कृति का नजदीकी संबंध उस शख्सियत से है, जिसे हम कृष्‍णा सोबती के नाम से जानते हैं। बंटवारे के दौरान अपने जन्‍मस्‍थान गुजरात और लाहौर को यह कहकर कि ‘याद रखना, हम यहां रह गए हैं’, वे दिल्‍ली पहुंची थीं कि यहां के गुजरात ने उन्‍हें आवाज़ दी है और अपनी स्‍मृतियों को सहेजते-संभालते वे अपनी पहली नौकरी करने सिरोही पहुंच गई, जहां उनमें अपने स्‍वतंत्र देश का नागरिक होने का अहसास जगा, व्‍यक्ति की खुद्दारी और आत्‍मसम्‍मान को जांचने-परखने के लिए सामंती ताम-झाम का एक बड़ा फलक मिला।" 

     कृष्‍णा सोबती लाहौर के फतेहचंद कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी कर जब दिल्‍ली लौटी तब  उनके सिविल सर्वेंट पिता कर्जन रोड के सरकारी आवास में रहते थे। उसी आवास में रहते हुए एक दोपहर को उन्‍होंने बाहर सड़क पर कुछ मजदूरों को ‘तुरही नगाड़ा होइश्‍शा’ की नारेबाजी के साथ एक बिजली के गोल ट्रांसफॉर्मर को धकेलकर ले जाते हुए खिड़की से देखा और यह भी देखा कि उनके पड़ौसी कुरेशी अंकल के घर का सामान तांगे पर लदवाया जा रहा था और उस फ्‍लैट पर पी डब्‍ल्‍यू डी का चौकीदार ताला लगाने के लिए मुस्‍तैदी से खड़ा था। उसने देखा कि कुरेशी अंकल स्‍वयं भी परिवार के साथ जैसे हमेशा के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे, तो वह हड़बड़ाई-सी कुरेशी आंटी के पास पहुंची और उनका हाथ छूकर रोने लगी। कुरेशी अंकल ने पुचकारकर उसके सिर पर हाथ रखा और कहा – ‘जाओ बिटिया, जाओ, यह बाहर खड़े रहने का वक्‍़त नहीं।' वह स्‍वयं भी यह बात को जान चुकी थी कि उन दिनों चारों तरफ जिस तरह का माहौल था, उसमें अधिकांश मुस्लिम परिवार नये मुल्‍क पाकिस्‍तान की ओर पलायन कर रहे थे और ऐसा ही सिलसिला उधर से हिन्‍दु परिवारों के हिन्‍दुस्‍तान लौटने का भी बना हुआ था। इस आवाजाही के लिए कुछ स्‍पेशल गाड़ियों की व्‍यवस्‍था की गई थी, जो अपर्याप्‍त-सी थी। जिस तरह की तबाही की भयावह खबरें अखबारों और अफवाहों के जरिये आ रही थी, उससे चारों तरफ अराजकता का-सा माहौल बनता जा रहा था। ऐसी भयावह घटनाओं की एक चलचित्रनुमा तस्‍वीर कृष्‍णा जी ने इस जीवन-कथा के आरंभिक 15 पृष्‍ठों में दर्ज की है, जिससे यह अनुमान होता है कि उस समय लोग किस तरह के त्रासद हालात के बीच से गुजर रहे थे। ऐसे ही हालात में कृष्‍णा जी ने अपने को किसी काम में व्‍यस्‍त करने के उद्देश्‍य से जब अखबार में सिरोही रियासत का एक विज्ञापन देखा कि वहां की शिशुशाला के किसी प्रशिक्षित शिक्षक की जरूरत है, तो उन्‍हें यह काम अपनी रुचि के अनुरूप लगा और अपना आवेदन रजिस्‍टर्ड डाक से भेज दिया। उन्‍होंने चूंकि स्‍नातक डिग्री के साथ मौंटेसरी प्रशिक्षण का डिप्‍लोमा भी कर रखा था, इसलिए  कुछ ही दिनों में उन्‍हें बुलावा भी आ गया।

     पंजाब और हिमाचल की हरी-भरी वादियों में रहने वाली कृष्‍णा सोबती सिरोही रियासत के बुलावे पर शायद पहली बार राजस्‍थान की रूखी-सूखी धरती पर रेल-सफ़र कर रही थीं। ऐसे में उनकी यह प्रतिक्रिया स्‍वाभाविक ही थी, जो इन शब्‍दों में व्‍य‍क्‍त हुई – “वह सरसों के पीले-हरियाले खेत क्‍या हुए ! कहां ओझल हुए वह भरपूर पत्‍तोंवाले छांहदार पेड़। क्‍या हुईं वह कच्‍ची राहें ! वह दरिया चनाब की झिलमिलाती लहरें। कहां खो गई वह सुथरी चमकती रेते। और अब गाड़ी के साथ-साथ दौड़ती डूंगरों की सलवटों में छिपी मजबूत राजपुताना धरती।"

   इसी सफ़र के अंतिम पड़ाव के रूप में जब वे अपने टिकिट पर अंकित एरिनपुरा रेल्‍वे स्‍टेशन पर दोपहर के वक्‍़त उतरीं तो सामने सुनसान सपाट प्‍लेटफॉर्म को देखकर एकबारगी ठगी-सी रह गई थी कि वे कहां आ गई हैं ! सिरोही शहर से कोई चालीस किलोमीटर दूर तब का एरिनपुरा आज जवाई बांध रेल्‍वे स्‍टेशन के रूप में परिवर्तित हो गया है। गाड़ी से उतरकर जब उन्‍होंने चारों ओर नज़र दौड़ाई तो सामने से धोती-कमीज पहने एक नाटा-सा आदमी उनके करीब आता दिखा, जिसने करीब आने पर अपना नाम मुन्‍नालाल बताते हुए उन्‍हें आश्‍वस्‍त किया कि वह सिरोही राज की ओर उन्‍हीं को लेने आया है। उसने बताया कि रेल्‍वे स्‍टेशन के बाहर ही एक बस उनके इंतजार में खड़ी है, जो यहां की सवारियों को सिरोही पहुंचाती है। उसी बस में सवार होकर वे सवा-डेढ़ घंटे के सफ़र के अंत में वे सिरोही शहर पहुंच गई, जो पहली नज़र में एक ठीक-ठाक-सा छोटा शहर नज़र आ रहा था। वहां पहुचने पर सिरोही राज के गैस्‍ट हाउस में उनके लिए ठहरने की व्‍यवस्‍था थी, जो एक पुराना-सा गैस्‍ट हाउस था, दीवारें और दरवाजे बदरंग। वह रात उन्‍हें वहीं गुजारनी थी। सुबह जब आंख खुली तो बाहर का प्राकृतिक दृश्‍य उन्‍हें कुछ खुशनुमा-सा लगा। तभी गैस्‍ट हाउस के सेवक देवला ने आकर सलाम किया और बताया कि चाय-नाश्‍ता उन्‍हें दीवान जी यहां करना है।

   कृष्‍णा जी नहा-धोकर तैयार हो गईं और सवेरे नौ बजे उन्‍हें दीवान जी के यहां से गाड़ी आ गई। वह कुछ ही मिनट में दीवान जी की ड़योढ़ी पहुंच गई और बैठक में दाखिल हो गईं। दीवान जी ने उनका स्‍वागत किया और सुख-सुविधा की जानकारियां लीं। इस बीच उनका नाश्‍ता आ गया। दीवान जी से यह पहली मुलाकात एक तरह से कृष्‍णा जी का इंटरव्‍यू ही थी, जिसमें उनकी शिक्षा-दीक्षा और रुचियों के बारे में आवश्‍यक जानकारियां ली गई। इन्‍हीं जानकारियों में उन्‍होंने अपनी ‘सिक्‍का बदल गया’ और अज्ञेय जी की पत्रिका ‘प्रतीक’ में प्रकाशित कहानियों का भी हवाला दिया। इस मुलाकात में दीवान जी ने बताया कि उनके अहमदाबाद के मित्र देसाई जी और कृष्‍णा के पिता अच्‍छे मित्र हैं और उन्‍होंने पहले ही उसके आगमन की जानकारी दे दी थी, लेकिन उनका चयन विशुद्ध रूप से योग्‍यता के आधार पर किया जा रहा है, किसी सिफारिश पर नहीं। अगर उन्‍हें सिरोही रहना या यहां का काम पसंद न आए तो वे बिना किसी संकोच के बता सकती हैं, यात्रा-व्‍यय सहित उनकी वापसी की व्‍यवस्‍था कर दी जाएगी। इंटरव्‍यू के दौरान दीवान उन्‍हें बेटी कहकर ही संबोधित करते रहे और कृष्‍णा जी भी उनकी आंखों में अपने प्रति सहज स्‍नेह का भाव देखकर थोड़ी आश्‍वस्‍त हुई।

    दीवान जी ने कृष्‍णा जी को रियासत के एक और अधिकारी जुत्‍शी जी से भी मुलाकात करवा दी, जो उनके कक्ष में ही आ गये थे। जुत्‍शी जी के पास एजुकेशन सुपरिटेंडेंट और काल्विन स्‍कूल की प्रिंसीपलशिप का दोहरा चार्ज था। वे मूलरूप से कश्‍मीरी थे, लेकिन कुछ साल पहले उनका परिवार उदयपुर आ गया था। उन्‍होंने कृष्‍णा जी से जानकारियां लेकर शिशुशाला के बारे में मुख्‍य जानकारियां दे दीं और शिशुशाला दिखा भी दी। उन्‍होंने बताया कि महारानी साहिबा अहमदाबाद के श्रेयस स्‍कूल जैसा आदर्श स्‍कूल बनाना चाहती हैं, उसी के लिए योग्‍य शिक्षकों की तलाश की जा रही है। उन्‍होंने उनके रहने की व्‍यवस्‍था के बारे में जानकारी लेने के बाद यही सलाह दी वे दीवान जी से कहकर स्‍टेट के यूरोपियन गैस्‍ट हाउस में रह सकती हैं।

    जुत्‍शी ने कृष्‍णा जी को इस बात के लिए आश्‍वस्‍त भी कर दिया कि वे उन्‍हें इस काम के लिए सबसे उपयुक्‍त लगती हैं, बस एक बार राजमाता से उनकी मुलाकात हो जाए और वे भी अपनी सहमति दे दें, फिर उनका चयन निश्चित है। उन्‍होंने यह भी बताया कि वे जिस पद के लिए आई हैं, उस पर दीवान जी की पसंद का अहमदाबाद का एक और प्रत्‍याशी है, जो उनके बाद दूसरे नंबर पर है, इसलिए अगर उन्‍हें काम अनुकूल लगे तो वे निर्णय करने में देरी न करें, बल्कि तुरंत अपनी रजामंदी दे दें। जुत्‍शी जी से मुलाकात के बाद वे वापस अपने गैस्‍ट हाउस आ गई और भोजन के बाद कुछ देर आराम किया। इस बीच उन्‍हें दिल्‍ली से रवाना होने से पूर्व अपने पिता और हिन्‍दी के प्रसिद्ध लेखक भगवतीचरण वर्मा और नवीन जी (बालकृष्‍ण शर्मा ‘नवीन’) से हुई बातचीत की याद आती रही, जिनकी यही सलाह थी कि उन्‍हें कहीं अन्‍यत्र जाने की बजाय दिल्‍ली में ही बने रहना चाहिए। चाहें तो उनके साथ ही काम कर सकती हैं, लेकिन कृष्‍णा जी को किसी के मातहत काम करने की कोई इच्‍छा नहीं थी, इसलिए उन्‍होंने पिताजी को यही कहकर आश्‍वस्‍त किया था कि अगर उन्‍हें सिरोही का काम पसंद न आया तो वे दिल्‍ली लौट आएंगी और अपनी एम ए की पढ़ाई पूरी करेंगी। अपरान्‍ह जब वे आराम करके जागी तो राजमहल से उन्‍हें लेने के लिए गाड़ी आ गई थी। वे तैयार होकर राजमाता से मुलाकात के लिए रवाना हो गईं। सिरोही के दत्‍तक महाराज स्‍वरूपविलास में रहते थे और राजमाता केसरविलास में। उन्‍हें राजमाता से मिलने के नियम-कायदे बता दिये गये थे, जिन पर बिना कोई प्रतिक्रिया किये उन्‍होंने सुन लिया था। महल में प्रवेश के बाद लाउंज में उनकी भेंट एक अंग्रेज महिला मिस विलियम से हुई, जो अन्‍दरूनी व्‍यवस्‍था का काम देखती थीं। विलियम कृष्‍णा जी से आवश्‍यक जानकारियां लेने के बाद उन्‍हें राजमाता से मिलवाने भीतर ले गईं। मिस विलियम ने राजमाता को कृष्‍णा जी की ओर संकेत करते हुए बताया कि ये मिस सोबती दिल्‍ली से आई हैं। उसी के साथ कृष्‍णा जी ने राजमाता को ‘गुड ईवनिंग योर हाईनैस’ कहकर अभिवादन किया, जिसका उत्‍तर राजमाता ने भी ‘गुड ईवनिंग’ कहकर दिया और पास ही रखी सोफा चेयर पर बैठने का संकेत किया। राजमाता उन्‍हें एक खुशमिजाज स्‍त्री लगीं, जिन्‍होंने आरंभ में उनकी यात्रा और सिरोही में उनकी सुख-सुविधा के बारे पूछते हुए विलियम को चायपान के लिए निर्देश दिया। वे उनसे दिल्‍ली में उनकी रिहाइश और शिक्षा के बारे में सहजता से बात करती रहीं। जब चाय आ गई और मिस विलियम कहीं अंदर ही व्‍यस्‍त दिखीं तो कृष्‍णा जी ने राजमाता की अनुमति लेकर चाय के दो कप तैयार कर लिये। राजमाता ने बताया कि वे अहमदाबाद के श्रेयस संस्‍थान जैसा ही एक शिक्षण संस्‍थान सिरोही में बनाना चाहती हैं, जिसके लिए उन्‍होंने यही सलाह दी कि एक बार वे जुत्‍शी जी के साथ अहमदाबाद जाकर उस संस्‍थान को देख आएं और विलियम को यह भी निर्देश दिया कि सोबती के रहने की व्‍यवस्‍था यूरोपियन गैस्‍ट हाउस में करवा दी जाए। इस पर कृष्‍णा जी ने राजमाता के प्रति कृतज्ञता व्‍यक्‍त करते हुए जब यह कहा कि वे अभी यहां रहने का पक्‍का फैसला नहीं कर पाई हैं तो राजमाता ने हंसकर कहा कि कोई बात नहीं, आप इत्‍मीनान से विचार कर लें, लेकिन अगर यहां न भी रहना चाहें तो दिल्‍ली जाने से पहले सिरोही नगर और यहां की कृष्‍णावती नदी को अवश्‍य देखकर जाएं। उन्‍हें राजमाता का यह स्‍नेह-संवाद बहुत रुचिकर लगा और उनके प्रति फिर से गहरी कृतज्ञता व्‍यक्‍त की। इस मुलाकात से कृष्‍णा जी के मन को गहरा सुकून मिला। 

   राजमाता से मुलाकात के बाद कृष्‍णा जी ने सिरोही के इस शैक्षणिक संस्‍थान में काम करने के‍ लिए अपना मन बना लिया था। उन्‍हें सिरोही राज से दिल्‍ली के पते पर जो औपचारिक पत्र भेजा गया था, वह असल में नियुक्ति पत्र ही था, दीवान जी और राजमाता से मिलना तो एक तरह की शिष्टाचार मुलाकात थी। उन्‍होंने सवेरे ही सिरोही स्‍टेट के तहसील ऑफिस जाकर अपनी ज्‍वाईनिंग दे दी। उन्‍हें तहसील ऑफिस कर्मियों का रूखा व्‍यवहार तथा माहौल कुछ ऊबाऊ-सा जरूर लगा, लेकिन उसे अनदेखा करते हुए वे ज्‍वाईनिंग की कॉपी लेकर बाहर आ गईं। रास्‍ते में जुत्‍शी जी अपनी जीप में आते दिखाई दिये और पास आने पर जीप रुकवाकर जब उन्‍होंने पूछा कि वे यहां कैसे? तो कृष्‍णा जी ने बता दिया कि वे अपनी ज्‍वाईनिंग देकर आ रही हैं, इस पर जुत्‍शी जी ने आश्‍चर्य प्रकट किया कि उन्‍होंने इस बारे में उनसे तो पूछा ही नहीं, सीधे ज्‍वाईनिंग देने कैसे आ गईं। उन्‍हें और दीवान जी को पहली मुलाकात से यही अनुमान था कि शायद वे वापस दिल्‍ली लौट जाएंगी, इसलिए दीवान जी ने अपनी पसंद के पोपटलाल को पहले से वहीं रोक रखा था। जुत्‍शी जी को इस तरह उनसे बिना अनुमति लिये ज्‍वाईनिंग देना रास नहीं आया। उनकी जीप में अहमदाबाद का वही प्रतियोगी बैठा था, इसलिए वे बिना कुछ कहे आगे निकल गये। जीप के ड्राइवर ने हाथ के इशारे से कृष्‍णा जी को काल्विन शिक्षा संस्‍थान पहुंचने का संकेत जरूर कर दिया था, इसलिए वे मुस्‍कुराती हुई पैदल ही उस ओर रवाना हो गई।

    काल्विन पहुंचकर कृष्‍णा जी कुछ देर लाइब्रेरी में किताबें और पत्रिकाएं देखती रहीं, तभी जुत्‍शी भी बाहर से लौट आए। वे थोड़े खिन्‍न-से थे, कृष्‍णा जी को देखकर पहले जैसा उत्‍साह भी नहीं था, लेकिन सामान्‍य शिष्‍टाचार के नाते अपने कमरे में आमंत्रित किया और चाय मंगवाई। बातचीत में उन्‍होंने बताया कि सिरोही राज के घटनाक्रम में तेजी से बदलाव आया है, दीवान जी सेवानिवृत्‍त होकर जा रहे हैं और गोकुलभाई भट्ट सिरोही राज के मुख्‍यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाल रहे हैं। तब तक सिरोही राजस्‍थान राज्‍य से अलग था। वे बोले, ‘यह न समझ लीजिये कि आपने ज्‍वाईनिंग दे दी तो नौकरी पक्‍की हो गई। मुमकिन है पुराने इंटरव्‍यू ही रद्द कर दिये जाएं।‘ कृष्‍णा जी ने जुत्‍शी की बात को चुपचाप सुना और बातचीत के अंत में इतना ही पूछा कि ‘सिरोही में कोई देखने की खास जगह है?’ इस पर जुत्‍शी ने आश्‍चर्य प्रकट करते हुए माउण्‍ट आबू और सिरोही के कुछ प्रमुख स्‍थानों के नाम बताए, जो वे पहले ही देख चुकी थीं। इसी बीच तहसील से संदेशवाहक आया और उन्‍हें डाक-पैड दे गया। चाय पीते हुए उन्‍होंने डाक देखी और अंत में बताया कि अगले दिन सवेरे मुख्‍यमंत्री गोकुलभाई भट्ट ने उन दोनों को मुलाकात के लिए बुलाया है। विदा लेने से पहले कृष्‍णा जी ने सारणेश्‍वर जाने की इच्‍छा जताई, इस पर जुत्‍शी ने उन्‍हें जीप ले जाने का सुझाव दिया, लेकिन वे पैदल ही जाने का कहकर वहां से गैस्‍ट हाउस की ओर निकल आई।

   अगली सुबह जब वे गोकुलभाई भट्ट से मुलाकात के लिए पहुंची तो वहां दीवान और जुत्‍शी भी मौजूद थे। भट्ट जी ने कृष्‍णा जी को देखते ही जिस अपनत्‍व से उनका स्‍वागत किया और हाल-चाल पूछे तो दीवान और जुत्‍शी दोनों आश्‍चर्य से उन्‍हें देखते रह गये। भट्ट जी ने निर्देश देते हुए कहा कि “जुत्‍शी जी, इन्‍हें वह सब सुविधाएं दें कि ये अपना काम कुशलता से कर सकें। हम शिशुशाला को राज्‍य का सबसे अच्‍छा स्‍कूल बनाना चाहते है।" इस पर जुत्‍शी ने “हुकुम !” कहकर उन्‍हें आश्‍वस्‍त किया। भट्टजी ने कृष्‍णा जी से कहा कि “सोबती बाई, नवीन जी आपके लिए चिन्तित थे। हमने उन्‍हें आश्‍वासन दिया कि बाई को हमारे यहां कोई तकलीफ नहीं होगी।" और इस तरह कृष्‍णा जी की शिशुशाला की निर्देशिका के रूप में नियुक्ति निश्चित हो गई।  जुत्‍शी और प्रशासन के सभी लोगों को उनकी अहमियत और अपनी सीमाएं समझ में आ गई।

    गैस्‍ट हाउस पहंचने पर उन्‍हें मिस विलियम का छोटा-सा नोट मिला कि राजमाता शाम साढ़े चार बजे उनसे मिलने की इच्‍छुक हैं। कृष्‍णा जी घूमती हुई चार बीस पर केसरविलास पहुंच गई। नियत समय पर राजमाता के कक्ष में पहुंचने पर उन्‍होंने खुशी से स्‍वागत किया और अपनी बातचीत में उनके आत्‍मविश्‍वास की प्रशंसा भी की। फिर पिछले दो दिनों के हाल-चाल जानने की इच्‍छा प्रकट की। कृष्‍णा जी ने बिना किसी की शिकायत या किसी कमी का हवाला दिये सारी बातें उनके सामने बयान कर दीं। खासतौर से सारणेश्‍वर दर्शन का उत्‍साह से वर्णन किया। फिर दोनों के बीच साहित्‍य और दर्शन की कई पुस्‍तकों और दार्शनिकों पर भी चर्चा हुई। उन्‍हें यह जानकर अच्‍छा लगा कि राजमाता साहित्‍य और दर्शन में अच्‍छी रुचि रखती हैं। उन्‍होंने फिर कभी और चर्चा के लिए आमंत्रित करने का आश्‍वासन देकर उन्‍हें विदा किया।

     शिशुशाला में नियुक्ति निश्चित हो जाने के बाद कृष्‍णा जी ने सिरोही में रहने का अपना मन पक्‍का कर लिया था। अगली सुबह गैस्‍ट हाउस में शिशुशाला की दो सेविकाएं मिश्रीबाई और फूलीबाई उनकी हाजरी में आकर खड़ी हो गई और अपने लायक सेवा का निवेदन करने लगी। कृष्‍णा जी ने दोनों को यह कहते हुए विदा किया कि उनकी ड्यूटी स्‍कूल में है, उन्‍हें उन‍की निजी सेवा के लिए आने की जरूरत नहीं है। उसी दोपहर राज के दारोगा जी उनके लिए आवास की व्‍यवस्‍था हेतु उन्‍हें कुछ मकान दिखाने का प्रस्‍ताव लेकर आ गए। कृष्‍णा जी ने उनके साथ जाकर दो आवास देखे, लेकिन वे उन्‍हें पसंद नहीं आए, लौटते में स्‍वरूपविलास के पास एक भुतहा-सा कॉटेजनुमा मकान देखा, जो उन्‍हें पसंद आ गया, लेकिन उस मकान के बारे में आम राय यही थी कि यहां रात में भूत मंडराते हैं और इस मकान में कोई रहना पसंद नहीं करता। कृष्‍णा जी ने इस दलील को नहीं माना और उन्‍होंने विलियम को नोट भेजकर वह मकान आवंटित करवाने के बारे में रानी साहिबा को अपना निवेदन भिजवा दिया। रानी साहिबा के कहने पर वह कॉटेज तुरन्‍त उन्‍हें आवंटित कर दिया गया और उसकी साफ-सफाई कर रहने लायक करवा दिया गया। रहने की व्‍यवस्‍था निश्चित हो जाने के बाद उन्‍हें जुत्‍शी जी के साथ शिशुशाला के काम से अहमदाबाद और बंबई की यात्रा पर रवाना होना था। वे दो दिन बाद रेल यात्रा से अहमदाबाद पहुंच गई। वहां उनके मौसा रोहित मिल्‍स में चीफ इंजीनियर थे, इसलिए अहमदाबाद में उनके रुकने का अपना इंजजाम पहले से था। वे जुत्‍शी जी के साथ रेल्‍वे स्‍टेशन से सीधे अपनी प्रकाश मौसी के घर पहुंच गई और उनके मौसा मुकुल जी ने जुत्‍शी जी के लिए भी अपनी मिल के गैस्‍ट हाउस में ठहरने की व्‍यवस्‍था करवा दी।

     प्रकाश मौसी के करीब ही मिल कर्मचारियों के आवास के बीच उनकी छोटी मौसी शान्ति भी पाकिस्‍तान से विस्‍थापित होकर आनेवाले परिवारों के बीच छोटे से मकान में रहती थी। कृष्‍णा जब अपनी छोटी मौसी से मिलने पहुंची तो वे उसे गले लगाकर रुआंसी हो गई। विभाजन के दौर में मौसी और मौसा जी किसी तरह अपने दो बच्‍चों के साथ जान बचाकर बड़ी बहन के पास अहमदाबाद आ गये थे, जहां मुकुल जी ने अपने साढू को रोहित मिल में ही काम पर लगवा दिया और रहने की तात्‍कालिक व्‍यवस्‍था भी करवा दी। शान्ति मौसी और कृष्‍णा की इस मुलाकात और उनकी आपसी बातचीत में ऐसे विस्‍थापितों की पीड़ा गहराई से व्‍यक्‍त हुई है।

    अहमदाबाद में कृष्‍णा जी को एक-दो दिन ही रुकना था, उसके बाद उन्‍हें बंबई के लिए रवाना होना था। दो दिन बाद जब वे बंबई स्‍टेशन पहुंची तो उसके बड़े मामा (कृष्‍णा जी की मां के मामा) और उनके बेटे काशीनाथ स्‍टेशन पर उन्‍हें रिसीव करने आ गये थे। उन्‍होंने जुत्‍शी जी से उनके ठहरने की व्‍यवस्‍था पूछकर  टैक्‍सी से उन्‍हें कालबादेवी रोड के लिए रवाना कर दिया  और कृष्‍णा को गाड़ी में बिठाकर अपने माटुंगा आवास पहुंच गये। माटुंगा में मामा जी के आवास में उनकी अपनी नानी से मुलाकात हुई, जो विभाजन के दौर में कष्‍ट सहती हुई किसी तरह बंबई पहुंची थी। बड़े मामा ने अगली सुबह जुत्‍शी जी के पास कृष्‍णा को हार्नबी रोड, पहुंचाने की जिम्‍मेदारी काशीनाथ को सौंप दी थी। कृष्‍णा जी एक सप्‍ताह बंबई में रहीं और दौरान उनके बहुत से दोस्‍त और सहेलियां उनसे मिलने आए। सप्‍ताह भर में जुत्‍शी जी के साथ शिशुशाला के लिए आवश्‍यक सामान की खरीद कर वे उसी रेलयात्रा से सिरोही लौट आई। सिरोही लौटकर उन्‍होंने अपने मम्‍मी पापा को पत्र लिखा जिसमें अहमदाबाद और बंबई में अपने मामा और मौसियों से हुई मुलाकात के बारे में विस्‍तार से लिखा। सिरोही लौटने पर यह भी जानकारी मिली कि राजघराने और सिरोही की नयी सरकार के बीच शिशुशाला को लेकर उत्‍पन्‍न हुए नये विवाद के कारण उसकी शुरुआत अभी स्‍थगित कर दी गई है, ऐसे में कृष्‍णा जी के लिए नये काम की तजवीज के लिए कमीश्‍नर ने उन्‍हें यूरोपियन गैस्‍ट हाउस विचार-विमर्श के लिए बुलाया था। कमीश्‍नर ने कृष्‍णा जी को राजभवन में नये महाराज की गवर्नेस के रूप में कार्य करने का प्रस्‍ताव किया तो उन्‍होंने उसे सहर्ष स्‍वीकार कर लिया और वे अगले ही दिन तैयार होकर स्‍वरूपविलास पहुंच गई।

    गवर्नेस के रूप में स्‍वरूपविलास में प्रवेश के साथ ही कृष्‍णा जी के सिरोही प्रवास की परिस्थितियां, प्रयोजन और उनकी पूरी दिनचर्या बदल गई। सबसे पहले तो उनके रहने का ठिकाना बदलकर महल के भीतर सभी सुख-सुविधाओं से लैस वह कक्ष हो गया, जहां रहते हुए उन्‍हें दत्‍तक महाराज तेजसिंह की शिक्षा, राजसी संस्‍कार और उनके व्‍यक्तित्‍व विकास की तमाम जिम्‍मेदारियां निभानी थी। इसके लिए उन्‍हें सबसे पहले उन सभी लोगों को जानना जरूरी था, जो महल के भीतर महाराज की सेवा में पहले से नियुक्‍त हैं, जैसे उनके ए डी सी जयसिंह और उनके प्रभारी कर्नल साहब आदि। यहां तक कि युवराज की बड़ी मां और छोटी मां की देखरेख तथा पूर्व अंग्रेज गवर्नेंस मिसेज मैकफर्ल्‍न द्वारा दी गई अब तक की शिक्षा आदि को जान-समझ लेना जरूरी था। इस प्रक्रिया में कुछ वक्‍़त लगना स्‍वाभाविक था। उन्‍होंने पाया कि युवराज में सामान्‍य शिष्‍टाचार, विनम्रता और बालसुलभ जिज्ञासाभाव पर्याप्‍त रूप में विद्यमान था, इससे उन्‍हें अपना काम थोड़ा सहज लगा। युवराज की शिक्षा के लिए निर्धारित वर्करूम में जब कृष्‍णा जी ने महात्‍मा गांधी और पंडित नेहरू के चित्र देखे तो उन्‍हें यह भी आश्‍वस्ति हुई कि यह राज परिवार बदलते समय के प्रति सकारात्‍मक रुख रखता है। उन्‍हें आजादी की लड़ाई में प्रजामंडल के साथ देशी रियासतों के टकराव की भी जानकारी थी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिन्‍द फौज के प्रति लोगों के सहज लगाव से भी वे परिचित थी और अपेक्षा कर रही थी कि इस बदलते माहौल के प्रति इस राजभवन के लोगों की सोच में भी कुछ बदलाव अवश्‍य आया होगा। इस राजनैतिक परिदृश्‍य के साथ ही देश के बंटवारे से उत्‍पन्‍न विस्‍थापन की पीड़ादायक स्‍मृतियां यदा-कदा उनके मन-मस्तिष्‍क में अक्‍सर गहरी टीस पैदा करती थी। राजमहल में काम करते हुए अक्‍सर वे उन स्‍मृतियों में खो जाती थी और वे फ्‍लैशबैक्‍ के रूप में उनकी चेतना में उभर आती थी। आजादी मिलने के तुरन्‍त बाद देश में बढ़ते साम्‍प्रदायिक तनाव, दक्षिणपंथी ताकतों के  उभार, महात्‍मा गांधी की हत्‍या आदि ऐसे मसले थे, जो उनकी चेतना और स्‍मृतियों पर लंबे समय तक बने रहे। इसी चिन्‍ता, सोच और संवेदना के बीच वे अपनी गवर्नेंस की जिम्‍मेदारियां निभा रही थी। इन बाह्य परिस्थितियों के बावजूद राजमहलों के भीतर का वातावरण पूर्व की भांति आपसी रंजिश, मनमुटाव, ईर्ष्‍या-द्वेष और वर्चस्‍व की मानसिकता से मुक्‍त नहीं हो पाया था। यही प्रवृत्तियां इस राजभवन में भी कमोबेश रूप में कायम थी, जिनके बीच गवर्नेस कृष्‍णा जी को अपने दायित्‍व का निर्वाह करना था और अपने शिष्‍य नन्‍हे युवराज के मानस को उनसे बचाते हुए उनमें सहज मानवीय संवेदना और संस्‍कारों का विकास करना अपना प्राथमिक कर्तव्‍य लग रहा था। उन्‍होंने प्रयत्‍न करके युवराज के साथ अपना निरापद समय अवश्‍य निश्चित करवा लिया, जिसमें महारानियों और राजपरिवार के किसी अन्‍य वयक्ति का कोई दखल न हो। खुद युवराज भी शिक्षक के रूप में उसके निर्देशों को संजीदगी से लेने लग थे। वे जो हिदायतें देतीं, वे उनका पालन करते। गवर्नेस और संरक्षक के रूप में वे उनके खान-पान, राजभवन परिसर की विभिन्‍न गतिविधियों में उनकी मौजूदगी, उनके आचरण और उन पर होनेवाले असर का पूरा ध्‍यान रखती थी। वे यह जान गई थी कि सिरोही दरबार तेजसिंह के पिता भूपालसिंह मनादर के ठिकानेदार थे। अपने रुतबे के मुताबिक सभी मामलों में बीकानेरी बड़ी मां छोटी मां से हल्‍की पड़ती थीं, क्‍योंकि दरबार तेजसिंह छोटी मां की कोख से ही पैदा हुए थे। गुजरात की इस राजकुमारी से भूपालसिंह की शादी बीकानेरी रानी साहिबा की सहमति से इसी मकसद से करवाई गई थी कि उनसे होनेवाली संतान उन्‍हीं के निर्देशों का पालन करेगी, ताकि राजमाता के रूप में उनके अधिकार सुरक्षित रहें। तेजसिंह बालपन में ही बड़ी मां द्वारा गोद ले लिये गये और सिरोही दरबार बनकर गद्दी पर आसीन हुए। रियासती गद्दी और वह भी आजादी के बाद। बचपन से ऐसी ही परवरिश में पलने के कारण वे बड़ी मां पर कुछ ऐसे न्‍यौछावर रहते कि बड़ी मां देखकर खुश रहतीं। वे अपनी आंखों से बेटे को बांधे रखतीं। छोटी मां दोनों को बाहरी वृत्‍त से ही देख पातीं। पहले की विलायती गवर्नेस भी उन्‍हें अपने बेटे से दूर-दूर ही रखतीं, ले‍किन देसी गवर्नेस के रूप में कृष्‍णा जी के जिम्‍मेदारी सम्‍हाल लेने के बाद छोटी मां के लिए अपने बेटे से मिलना और बात करना सहज हो गया था। महल में आरामदायक आवास व्‍यवस्‍था के बावजूद कृष्‍णा जी अपनी सुरक्षा के प्रति पूरी चौकस थी। सेविका मिश्रीबाई को इसी मकसद से उन्‍होंने अपने साथ ही रखा था। सिरोही के स्‍वरूपविलास में कुछ महीने गुजारने के बाद एक सुबह उन्‍हें बताया गया कि दरबार अब माउंट आबू के स्‍वरूपविलास में रहेंगे, इसलिए उन्‍हें भी उनके साथ माउंट आबू जाना है। 

     दरबार तेजसिंह, एडीसी जयसिंह, कर्नल साहिब और गवर्नेस कृष्‍णा जी माउंट आबू पहुंच गये। माउंट आबू पहुंचने के बाद भी तेजसिंह की शिक्षा जारी रही। उसी दौरान दरबार के मामा देवीसिंह और पुराने दीवान पांड्या जी भी माउंट आबू पहुंच गये थे। माउंट आबू के स्‍वरूपविलास में एक दिन गुजरात कैडर के नये एडमिनिस्‍ट्रेटर प्रेमा भाई पटेल उनसे बिना किसी पूर्व सूचना के मुलाकात के लिए आ गये, जबकि दरबार को अपनी मां से मुलाकात के लिए निकलना था।  वे इस मुलाकात के लिए तैयार नहीं थे, लेकिन प्रेमा भाई तो बैठक में आ चुके थे, इसलिए दरबार कुछ क्षण उनके पास रुक गए। प्रेमा भाई उन्‍हें बच्‍चा समझकर बेतकल्‍लुफी से उनका  नाम पूछने लगे, दरबार पहले तो चुप रहे, फिर जब दुबारा पूछा और कृष्‍णा जी ने उन्‍हें उत्‍तर देने के लिए कहा तो दरबार ने इतना ही कहा कि जब ये मेरा नाम ही नहीं जानते तो इस  मुलाकात का क्‍या मतलब है। इस बात पर जब प्रेमा भाई अपने अफसर होने का रौब दिखाने लगे और कृष्‍णा जी को उनकी जिम्‍मेदारियों के बारे में कहने लगे तो दरबार ने तुरंत मुलाकात को स्‍थगित करने की घोषणा कर दी और कृष्‍णा जी के साथ मां साहब के कक्ष की ओर रवाना हो गये, जबकि एडीसी जयसिंह और कर्नल प्रेम जी पटेल के पास खड़े रहे। प्रशासक प्रेम जी  पटेल को यह बहुत नागवार गुजरा और उन्‍होंने अगले ही रोज गवर्नेस के नाम मीमो के रूप में दो पत्र भेज दिये। कृष्‍णा जी ने उन्‍हें पढ़ा और बाद में तसल्‍ली से जवाब देने के लिए अलग रख दिया। अगले ही दिन दिल्‍ली से भारत सरकार के एक वरिष्‍ठ अधिकारी भास्‍कर राव दरबार से मुलाकात के लिए आनेवाले थे, जिसकी सूचना पहले ही मिल दरबार को चुकी थी। अगले दिन जब रेजीडेन्‍सी ऑफिस में भास्‍कर राव से दरबार और कृष्‍णा जी की मुलाकात हुई तो वे दरबार की शालीन बातचीत और गवर्नेस के काम से बेहद प्रभावित हुए।

      एक शाम दरबार का काफिला जब स्‍वरूपविलास से नक्‍कीलेक की ओर निकला तो रास्‍ते में सिरोही राज के प्रजाजन अपने महाराज के दर्शन और उनके सम्‍मान में खम्‍माघणी कहते हुए रास्‍ते में खड़े मिल गए। इन सबको देखकर बाई (कृष्‍णा जी) सोचने लगी – “पुरानी रस्‍म कब बदलेगी। विदेशी रेजीडेंट की रजामंदी से तेजसिंह गोद ले लिये गए। अंग्रेज चले जाने के बाद स्‍वदेशी राज की नीतियों के अनुसार गद्दी पर आसीन हैं। इस छोटे-से बच्‍चे के आस-पास सिर उठाती चिन्‍ताओं की भीड़ है। अलवर महाराजा जैसे हितचिन्‍तक कम हैं, दुश्‍मन ज्‍यादा। सिरोही राज के लिए नए एडमिनिस्‍ट्रेटर प्रेमा भाई से सहानुभूति की कोई उम्‍मीद नहीं। सिरोही अंबाजी तीर्थ के दबाव में राजस्‍थान से गुजरात में जोड़ दी जाएगी। तो भी क्‍या तेजसिंह दरबार बने रहेंगे? दिल्‍ली सरकार इस रियासती ताम-झाम को किसी और को सौंप देगी?” यही सब चिन्‍ता करते हुए जब उनकी गाड़ी आगे बढ़ी तो सड़क किनारे एक साधु को देखकर कर्नल साहब के इशारे पर ड्राइवर को कार रोकनी पड़ी। गाड़ी के रुकते ही साधु शिलाखंड महाराज जय जूजाननाथ की आवाजें लगाता हुआ उनके करीब आ गया। कर्नल के कहने पर दरबार ने उनका अभिवादन करते हुए हाथ जोड़ दिये, जबकि कृष्‍णा जी को यह निरा पाखंड लग रहा था। उन्‍होंने ड्राइवर को गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए कहा, लेकिन कर्नल के संकेत पर गाड़ी अभी रुकी रही। शिलाखंड दरबार तेजसिंह की बजाय उनके प्रतिस्‍पर्धी अभयसिंह का हिमायती था, इसलिए वह कह रहा था कि अब वह तभी मिलेगा जब अभयसिंह सिरोही राज की गद्दी संभाल लेंगे। तेजसिंह को भी साधु का यह व्‍यवहार कुछ अजीब-सा लगा और वे खिन्‍न हो गये। कृष्‍णा जी ने सख्‍त आवाज में ड्राइवर को गाड़ी आगे बढ़ाने की हिदायत दी और वे सीधे नक्‍कीलेक की ओर बढ़ गए। वहां पहुंचकर कुछ देर सभी ने झील में बोटिंग की। तेजसिंह थक गये थे, इसलिए वे नाव में ही कृष्‍णा जी गोद में सिर देकर सो गये। दरबार का सिर सहलाते हुए कृष्‍णा जी पहले से ही एक गहन चिन्‍ता में डूबी हुई थी।  

      गवर्नेस के रूप में कृष्‍णा जी अब राजभवन के अंदर की सियासी बातों को काफी कुछ जान गई थी और उन्‍हें अपने शिष्‍य से गहरी हमदर्दी थी। वे यह जानती थी कि “नाबालिग तेजसिंह की ‘रीजैंसी काउंसिल’ की मुखिया राजमाता साहिबा हैं। अभयसिंह राजमाता के नजदीक हैं। वे जयपुर दरबार के भी निकट हैं। जाम साहिब नावानगर सिरोही के जामाता हैं और सरदार पटेल के करीब हैं। उनके तराजू में कौन तुलेगा, एक ओर अभयसिंह और दूसरी ओर तेजसिंह। वजन आमने-सामने का नहीं, ऊपर नीचे का था।" निवर्तमान दीवान पांड्या का झुकाव भी अभयसिंह की तरफ लग रहा था, कर्नल और जयसिंह यों भी अबोले और असरहीन व्‍यक्ति थे और यही बात कृष्‍णा जी की चिन्‍ता का मुख्‍य कारण थी।

    माउंट आबू प्रवास के दौरान दरबार तेजसिंह को एक दिन खेतड़ी हाउस में स्‍वामी जी का आशीर्वाद लेने जाना था। गवर्नेस, एडीसी और कर्नल साहिब सहित वे नियत समय पर खेतड़ी हाउस पहुंच गए, जहां उनका गर्मजोशी से स्‍वागत हुआ। यहां भी कृष्‍णा जी को स्‍वामी जी की विलासी जीवन शैली और स्त्रियों के प्रति पूर्वाग्रही व्‍यवहार के कारण उनसे मिलकर निराशा ही हुई, लेकिन सिरोही राज की अपनी मर्यादाओं के कारण वे बिना कोई प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त किये इस औपचारिकता को निभा आई। वहां से लौटकर सभी स्‍वरूपविलास आ गये, लेकिन कृष्‍णा जी को कुछ वस्‍त्र खरीदने थे, इसलिए वे गाड़ी लेकर बाजार की ओर निकल आईं। बरूचा की दुकान से उन्‍होंने कुछ ओढ़नियां, सलवार और कमीज खरीदे और थोड़ा सुस्‍ताने के लिए राजपुताना होटल के रेस्‍तरां आ गई। उन्‍होंने चाय का ऑर्डर दिया ही था कि दरबार के प्रतिस्‍पर्धी अभयसिंह के भाई रामसिंह शिष्‍टाचारवश उनके पास आ खड़े हुए। वे उनसे पहले केसरविलास में मिल चुकी थीं। कृष्‍णा जी को थोड़ा आश्‍चर्य तो जरूर हुआ लेकिन उन्‍होंने चाय का प्रस्‍ताव किया और कुछ देर उनसे औपचारिक बातचीत की। चाय खत्‍म होने के साथ उनसे विदा लेकर वे स्‍वरूपविलास लौट आई। उसी शाम दरबार से मुलाकात के लिए अभयसिंह जी के वकील के एम मुंशी, सीतलवाड़ और दरबार के अपने वकील अमीन साहिब भी आ गये। के एम मुंशी ने दरबार से गुजराती में बात करनी चाही, लेकिन उन्‍होंने हिन्‍दी में बात करना ही पसंद किया। उन्‍होंने दरबार को अंबा जी दर्शन के लिए पधारने का आग्रह किया, लेकिन दरबार ने उसे यह कहकर टाल दिया कि जब मां साहिब कहेंगी, तभी आएंगे। इस बीच के एम मुंशी ने कृष्‍णा जी से पूछा कि गवर्नेस के रूप में वे दरबार को कौन-सी भाषाएं सिखाती हैं, साथ ही उनकी शिक्षा दीक्षा और मूल निवास के बारे में भी जानकारी ली। कृष्‍णा जी ने जानकारियां देते हुए जब यह बताया कि वे उनकी पुस्‍तक ‘बैरनी वसुलात’ को हिन्‍दी अनुवाद पढ़ चुकी हैं, तो वे भी उनसे प्रभावित हुए। थोड़ी देर इसी तरह की औपचारिक बातचीत के बाद वे तीनों वापस लौट गये। वे शायद दरबार तेजसिंह की शिक्षा, मनोबल और सिरोही की गद्दी पर उनकी दावेदारी का पक्ष जानने समझने के लिए आए थे, लेकिन इस पर बात करने का कोई सीधा संदर्भ नहीं खोज पाए और न दरबार ने ही उसमें कोई रुचि ली। गवर्नेस कृष्‍णा जी ने यह जरूर अनुभव किया कि बातचीत के दौरान एडीसी जयसिंह और कर्नल साहिब मौन ही बने रहे। ऐसे में कृष्‍णा जी को दत्‍तक पुत्र तेजसिंह और रियासत का भाग्‍य उन्‍हें चक्रव्‍यूह में ही फंसता नज़र आया।

    आबू प्रवास की समाप्ति के बाद दरबार का काफिला एक दिन सिरोही वापसी पर रवाना हो गया। वे एक रात ही सिरोही रुक पाए। इस बीच उन्‍हें दिल्‍ली यात्रा का बुलावा आ चुका था और उसके लिए आबू रोड से ही ट्रेन पकड़नी थी। गवर्नेस कृष्‍णा जी को भी उनके साथ दिल्‍ली जाने का आदेश हुआ तो वे अपने सामान के साथ दिल्‍ली यात्रा के लिए तैयार हो गई। एडीसी जयसिंह और कर्नल तो साथ थे ही। दिल्‍ली पहुंचने पर अलवर हाउस की दो गाड़ियां दरबार की अगवानी में तैयार खड़ी थी। अलवर हाउस पहुंचकर सभी ने नाश्‍ता वगैरह किया और उसके तुरन्‍त बाद उन्‍हें मसूरी के लिए रवाना होना था। मसूरी में दरबार तेजसिंह के वकील बंबई से पहुंचने वाले थे, उन्‍हीं से मुलाकात के लिए वे मसूरी जा रहे थे। बीच रास्‍ते में कृष्‍णा जी दरबार को देहरादून, मसूरी और उत्‍तरांचल के बारे में बहुत सी बातें बताती रहीं। वे इस क्षेत्र में बहुत बार आ चुकी थी। उन्‍होंने मसूरी के होटल में ही रात्रि-विश्राम किया, जहां उनके वकील पहले ही पहुंच चुके थे। अगली शाम तक वे सभी दिल्‍ली वापस लौट आए। सुबह एडीसी जयसिंह ने बताया कि दरबार के साथ मंत्रालय जाना है इसलिए सभी तैयार होकर बैठक में पहुंचे तो कृष्‍णा जी को यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि वहां दीवान पंड्या भी बैठे थे। पंड्या ने भी उन्‍हें देखा तो हुक्‍म देने के अंदाज में कहा कि ‘आप यहीं रहिए, आपको हमारे साथ नहीं जाना होगा।' और ज्‍यों ही कृष्‍णा जी ने ‘ठीक’ कहकर दरबार का हाथ छोड़ा तो दरबार तेजसिंह को पांड्या की यह हरकत बहुत नागवार गुजरी और उन्‍होंने फौरन आज्ञा के स्‍वर में कहा – “मैम हमारे साथ जाएंगी, आप भले न जाएं पांड्या जी।"

    वे सभी मंत्रालय पहुंच गए, लेकिन शाम तक इंतजार करने के बावजूद मंत्री जी से उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। ऐसे में सभी लोग वापस अलवर हाउस लौट आए। आखिर लंबे इंतजार के बाद अगले दिन शाम मंत्री जी से मुलाकात का समय निश्चित हुआ और वे लोग मंत्री जी के निवास पहुंच गए। मंत्री जी के निवास पर नवीन जी और सिरोही के नये मुख्‍य मंत्री गोकुलभाई भट्ट से दरबार की भेंट हुई। उनके बीच थोड़ी देर सामान्‍य बातचीत हुई और नवीन जी ने बताया कि मंत्री जी से बातचीत अगले दिन सवेरे 11 बजे हो सकेगी। वे लोग वापस अलवर हाउस आ गये। अलवर हाउस में शाम की चाय पीते हुए दीवान पांड्या जी जाने किस बात पर खफा थे कि वे एडीसी जयसिंह से गवर्नेस कृष्‍णा जी को लेकर कुछ अनर्गल-सी टिप्‍पणियां करने लगे। पहले तो कृष्‍णा जी ने उनकी बातचीत को अनसुना करने की कोशिश की लेकिन जब वे नहीं रुके तो उन्‍हें सख्‍ती से कहना पड़ा कि न वे सिरोही राज के दीवान हैं और न ही दरबार के हितचिन्‍तक। वे महज मामा देवीसिंह के कहने पर अपने मकसद से यहां चले आए हैं, इसलिए अपनी मर्यादा में रहें। कृष्‍णा जी की इस सपाट और तल्‍ख टिप्‍पणी के बाद पांड्या के पास और कुछ कहने का कोई आधार नहीं था। इसके कुछ क्षण बाद ही कृष्‍णा जी दरबार से अपने पिता से मिलने की इजाजत लेकर वहां से निकल आई और रात्रि विश्राम अपने घर पर ही किया।

   अपने घर के पुराने कमरे में जब नींद खुली तो कृष्‍णा को लगा ही नहीं कि बीते समय का कोई टुकड़ा कहीं था भी। मां और पिताजी अभी अभी उठे नहीं थे। वह बिस्‍तर से उठी, बाथरूम जाकर हाथ-मुंह धोए, अपना पुराना जोड़ा निकाला और फ्‍लीटबूट पहनकर सैर को निकल गई। बाहर पर्याप्‍त उजाला हो चुका था। फिरोजशाह चौक से कर्जनरोड पर दूर तक उनकी चिर-परिचित सड़क सूनी और साफ दिख रही थी। सड़क पर चलते हुए उनकी स्‍मृति में सिरोही की सुबहें और नन्‍हे दरबार की सेवा-चाकरी में लगे लोगों की गतिविधियां कौंधती रही। वे जब तक घूमकर लौटीं, मां-पिताजी उठ गये थे और चाय पीते हुए अखबार देख रहे थे। कृष्‍णाजी भी उनके करीब बैठकर अखबार देखने लगी और जब पिताजी ने उनके अगले कार्यक्रम के बारे में पूछा तो यही बताया कि वह आज घर पर ही रहेंगी। फिर यह भी बता दिया कि अब वह लौटकर सिरोही नहीं जाएगी। यहीं दिल्‍ली रहकर अपनी पसंद का काम करेगी। दिन में एकबार दरबार से मिलने अलवर हाउस जाएगी और फिर उनसे विदा लेकर लौट आएगी।

   कृष्‍णा जी जब अलवर हाउस पहुंची तो दरबार कुछ नयी पोशाक देखने उनके साथ कनॉट प्‍लेस तक निकल आए। एडीसी जयसिंह उनके साथ थे, जब नयी पोशाक के लिए वे ट्रायल रूम में जाने लगे तो एडीसी की बजाय उन्‍होंने कृष्‍णा जी को अपने साथ आने का निवेदन किया और जब थोड़ा एकान्‍त मिला तो उन्‍होंने अपनी मैम से पूछ लिया कि ये ‘बेदखल’ क्‍या होता है। मैम के वजह पूछने पर उन्‍होंने बताया कि दिन में पांड्या और मामा देवीसिंह की बातचीत में इसी शब्‍द का जिक्र हो रहा था। कृष्‍णा जी को थोड़ा अफसोस तो जरूर हुआ, लेकिन आनेवाले समय में रियासतों के भविष्‍य और अपने शिष्‍य तेजसिंह की बढ़ती समझदारी पर भरोसा रखते हुए उन्‍होंने यही कहा कि वे इन बातों की तनिक भी परवाह न करें और अपने आत्‍मविश्‍वास को बनाए रखें। वहां का कार्य संपन्‍न होने पर जब दरबार तेजसिंह के साथ सभी उनकी कार तक पहुंचे और बैठने लगे तो दरबार ने मैम से भी अपने साथ चलने का आग्रह किया, लेकिन कृष्‍णा जी ने मुस्‍कुराते हुए उनसे अपने घर लौटने की इजाजत मांग ली और वहीं से ‘बाय’ कहकर वापस अपने मां-पिताजी के पास लौट आईं। अगले दिन हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स में एक इंटरव्‍यू दिया और अपने को हर तरह के दबावों से मुक्‍त अनुभव करते हुए अपनी इस जीवन-कथा को वहीं विराम दे दिया।  

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