Wednesday, February 20, 2019


स्‍मृति शेष - 
 
हिन्‍दी आलोचना में नामवरसिंह के होने का अर्थ   
* नन्‍द भारद्वाज  
  
 हिन्‍दी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा और समकालीन रचनाशीलता का वस्‍तुपरक विवेचन करने वाले मूर्धन्‍य आलोचक डॉ. नामवरसिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके अवसान के साथ ही हिन्‍दी आलोचना का एक शिखर व्‍यक्तित्‍व हमसे सदा के लिए विदा हो गया है, जो निश्‍चय ही एक अपूरणीय क्षति है। साहित्‍य की सैद्धांतिक आलोचना में जहां एक ओर उन्होंने पुराने रसवादी और नव-कलावादी मानदण्डों और मनोवृत्तियों से अनवरत संघर्ष किया, वहीं समकालीन आलोचना में उभरते सरलीकरणों और एकांगीपन का भी खुलकर विरोध किया। एक सहृदय पाठक और प्रबुद्ध रचनाकार के रूप में वे हिन्‍दी के नये रचनाकर्म के प्रति जितने सजग और संवेदनशील रहे हैं, अपने आलोचना-कर्म के प्रति वे उतने ही जवाबदेह।
      लेखक के रूप में नामवरजी की प्रारंभिक पहचान एक कवि के रूप में ही बनी थी - सन् 1940 से 45 के बीच उन्होंने जमकर कविताएं लिखीं और उन कविताओं का एक संग्रह नीम के फूलनाम से प्रकाशन के लिए तैयार भी हुआ, लेकिन किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो सका। इसी दौरान उन्होंने कुछ ललित निबन्ध और आलोचनात्मक लेख लिखने शुरू किये और उस काम में वे इतने रम गये कि जैसे और कुछ करने की फुरसत ही नहीं रह गई। सन् 1951 में उनकी जो पहली किताब प्रकाशित हुई वह थी बक़लम खुद’, जिसमें उनके 17 निबंध संकलित हैं। उसके बाद सन् 1952 से 57 के बीच उनकी छायावाद’,  आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, ‘इतिहास और आलोचनाआदि कई किताबें प्रकाशित होकर सामने आईं। ये सभी कृतियां उस जमाने में और बाद के सालों में हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित कृतियां मानी गईं। इसी क्रम में सातवें,  आठवें और नौवें दशक में कहानी नयी कहानी’, ‘कविता के नये प्रतिमान’,  दूसरी परम्परा की खोज औरवाद विवाद संवाद जैसी कृतियों के माध्यम से उन्‍होंने समकालीन साहित्य में ऐसी बहस का सूत्रपात किया, जिसकी अनुगूंज साहित्यिक हलकों में दूर तक सुनी गई।
    साहित्य के गंभीर अध्येता और अग्रणी आलोचक के साथ ही नामवरजी की शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने देश की अनेक बड़ी शिक्षण संस्थाओं जैसे काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय, सागर विश्‍वविद्यालय,  जोधपुर विश्‍व-विद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्‍व-विद्यालय में जहां वर्षों हिन्‍दी भाषा और साहित्य के गंभीर पठन-पाठन में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया, वहीं साहित्य की शिक्षण-प्रक्रिया और उसके पाठ्यक्रम को अद्यतन रूप देने में निर्णायक भूमिका अदा की है।
    यही नहीं, आजादी के बाद के इन सालों में साहित्‍य–संस्‍कृति के साथ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल, इस देश के सामाजिक परिवेश और उसमें राष्ट्र-नायकों की भूमिका, आर्थिक विकास की प्रक्रिया, भूमंडलीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रसार और जन-संचार की बदलती भूमिका पर भी नामवरजी अपनी संपादकीय टिप्पणियों, लेखों और व्याख्यानों के माध्यम से वैचारिक बहस को बढ़ावा देते रहे हैं – वे उन खतरों से भी बराबर आगाह करते रहे, जो भारत जैसे विकासशील देश और तीसरी दुनिया के देशों के सामने आज भी चुनौती बनकर खड़े हैं।
      साहित्य-परम्परा के पुनर्मूल्यांकन, नयी इतिहास-दृष्टि के निर्माण और समकालीन रचना-कर्म (नयी कविता और नयी कहानी) पर उनके नये विवेचन चर्चित और बहस-तलब रहे ही, उनके व्‍याख्‍यानों और साहित्य-संगोष्ठियों में दिये गये बयानों पर अक्‍सर हिन्दी जगत् में व्यापक प्रतिक्रिया हुई है। हिन्दी में वे अकेले ऐसे आलोचक-वक्ता हैं, जिनके वक्तव्य कई बार लिखे हुए शब्द की अपेक्षा कहीं बड़ी बहस का कारण बने हैं। यह भी एक तथ्य है कि आधुनिक काल में हिन्दी में जो भी महत्‍वपूर्ण रचनाकर्म सामने आया, उस पर नामवर जी की राय सबसे अधिक संजीदा, सामयिक और गौर-तलब मानी गई।
      साहित्य-कला-संस्कृति और जन-संचार पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहने वाले लेखकों में सक्रिय सुधीश पचौरी अपने आरंभिक दौर में नामवर सिंह की आलोचना-पद्धति पर विरोध के स्वर में बहुत-कुछ लिखते रहे हैं। उन्‍होंने अपने को उनसे अधिक क्रांतिकारी और सजग लेखक मानते हुए उन पर संशोधनवादी, पलायनवादी और वर्ग-सहयोगवादी होते जाने के आक्षेपों को भी खूब हवा दी, लेकिन अपने इसी मुखर अहंभाव के चलते जब मार्क्सवादी विचार और संगठन से खुद उनकी महत्वाकांक्षाएं टकराने लगीं, तो वे एकाएक उससे भी अलग जा खड़े हुए और पूंजीवादी व्यावसायिक पत्रिकाओं में अपनी टिप्‍पणियों के माध्‍यम से उसी जनवादी सोच और प्रगतिशील परम्परा की जड़ें खोदने में जुट गये।
      कालान्‍तर में प्रगतिशीलता औैर जनवादी सोच को एकांगी, सीमित और समस्याग्रस्त मानने वाले यही सुधीश पचौरी इधर उत्तर आधुनिकतावादी लेखकों के संसर्ग में तर्क-वितर्क और अराजक भाषा के ऐसे-ऐसे खेल सीख गये कि अब साहित्य और संस्कृति की दुनिया उनके लिए एक तरह का वाग्-विलास (डिस्कोर्स) होकर रह गई है, जिसे उन्होंने हिन्दी में विमर्श का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया है। उत्तर-आधुनिकतावाद की पैरवी के जुनून में अपने इन्हीं विमर्शों को वे अब किसी के भी विमर्श बनाकर पेश कर सकते हैं।
         सुधीश पचौरी  ने नामवरसिंह के अड़सठवें जन्म-दिवस पर एक ग्रंथ संपादित किया था ‘नामवर के विमर्श’, जो प्रकारान्तर से उनकी उसी बदली हुई मानसिकता का परिचय देता है। व्यावसायिक वृत्ति वाले लेखक ऐसे अवसरों पर अक्सर अभिनंदन ग्रंथ की आयोजना कर लिया करते हैं, लेकिन सुधीश पचौरी चूंकि उत्‍तर-आधुनिक हो चुके थे, तो यह आयोजन वैसा अनुष्ठान बनने से बच गया। संकलित सामग्री के अपने महत्व के कारण उनके चाहे-अनचाहे यह एक ऐसा संग्रह अवश्‍य बन गया, जो समकालीन हिन्दी-आलोचना की केन्द्रीय चिन्ताओं और नामवरसिंह के अवदान पर गंभीरता से विचार करने का एक अवसर अवश्‍य प्रदान करता है।
      इस ग्रंथ के प्रकाशन से पूर्व भी पहल’, पूर्वग्रह’, ‘दस्तावेज’, ‘कहानी’,  आदि पत्रिकाओं ने नामवर जी पर अलग-थलग अवसरों पर कुछ महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित की थी, जो पर्याप्‍त चर्चित रही, साथ ही रणधीर सिन्हा, नंदकिशोर नवल और डॉ. रामबक्ष ने अपने आलोचना-ग्रंथों में नामवरजी की आलोचना पद्धति और उनके अवदान पर काफी विस्तार से प्रकाश डाला। इन्हीं आलोचना ग्रंथों और पत्रिकाओं के विशेषांकों की काफी सामग्री यहां पुनः प्रस्तुत की गई, साथ ही पहले और दूसरे खंड में कुछ ऐसे भी आलेख पहली बार प्रकाशित हुए , जो नामवरसिंह के व्यक्तित्व और आलोचना-कर्म के कई अनछुए पक्षों को उजागर करते हैं। इस ग्रंथ के पहले खण्ड में कुछ संस्मरणात्मक आलेख वाकई लाजवाब हैं। लेकिन इसी दूसरे खण्‍ड विमर्श में कुछ नकारात्मक स्वर वाले आलेख भी शामिल किये गये हैं, जिनके चयन का कोई औचित्य स्पष्ट नहीं किया गया, न सम्पादक ने ही इन विवादी स्वर वाले आलेखों से उभरने वाले निष्कर्षों पर अपनी कोई राय-टिप्पणी प्रस्तुत की। वे चाहते तो ऐसी और सामग्री भी जुटा सकते थे, क्योंकि नामवरसिंह से असहमति रखने वाले लेखकों की तादाद भी कुछ छोटी नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि चौथे खण्ड में स्वयं संपादक सुधीश पचौरी ने नामवरजी से असहमति रखने वाले हिन्दी के दो वरिष्ठ लेखकों अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के साथ काफी विस्तार से की गई एक महत्‍वपूर्ण बातचीत भी इस संग्रह में शामिल की। उस बातचीत में अपने प्रश्‍नों के जरिए स्‍वयं सुधीश पचौरी नामवरजी के विरोध में उन्हें उकसाते हुए बहुत से मसलों पर ले गये। अशोक वाजपेयी यों भी इस साहित्य-समय के सधे हुए खिलाड़ी हैं, इसलिए उन्हें प्रश्‍नों में घेर लेना इतना आसान नहीं होता, लेकिन राजेन्द्र यादव के अन्तर्विरोधी बयानों की हालत तो वाकई देखने लायक है।
      कथा-आलोचना के क्षेत्र में नामवर जी के समीक्षा-कर्म को लेकर हिन्दी कथाकारों का एक वर्ग उनसे काफी अप्रसन्न रहा है - उनके समकालीनों में कमलेश्‍वर, राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश तो उनके कट्टर विरोधी थे ही, बाद की पीढ़ी के कथा-लेखकों को भी उनसे कुछ गंभीर शिकायतें रही हैं। नामवर जी की आलोचना-दृष्टि में कुछ बारीक असंगतियां देखने वाले आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय यह मानते हैं कि उन्होंने कहानी समीक्षा के विकास की जो सार्थक शुरूआत की थी, उसमें नवीनता और ताज़गी तो थी, कहानी की तात्विक आलोचना या शास्त्रीय समीक्षा से अलग हटकर वस्तुतात्विक विवेचन, संरचनात्मक विश्‍लेषण और कलात्मक मूल्यांकन का प्रयास भी किया, लेकिन उसमें जिस सहयोगी प्रयास और रचना-आलोचना संवाद की बात कही गई थी, उसका अंत कटु विवाद में ही हुआ।
      साहित्य, संस्कृति और राजनीति के अन्तर्संबंधों पर विचार करते हुए नामवर जी ने लिखा था - ‘‘राजनीतिक परिवर्तन को लक्ष्य में रखते हुए भी एक लेखक के नाते वह अपनी रचनाओं के द्वारा सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में सक्रिय होता है, क्योंकि सांस्कृतिक परिवर्तन के बिना राजनीतिक परिवर्तन कठिन है।’’ इस पर टिप्पणी करते हुए डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने एक सैद्धान्तिक आशंका व्यक्त की थी कि सांस्कृतिक परिवर्तन के बगैर राजनीतिक परिवर्तन को कठिन कहना क्या प्रकारान्तर से बुनियादी बदलाव की प्रक्रिया में ऊपरी ढांचे को आधार से अधिक महत्व देना नहीं है ? पर यही बात जब फ्रेडिरिक एंगेल्स की तरफ से आती है तब शायद पाण्डेय जी को उस पर आशंका नहीं होती।
    नामवर जी की इस आलोचना के पीछे दो कारण तो स्पष्ट नज़र आते हैं। पहला कारण है, नामवरसिंह पर केन्द्रित इस तरह की विवादी चर्चा के बहाने अपने को सम-सामयिक साहित्यिक परिदृश्‍य में प्रासंगिक बनाये रखने का उपक्रम और दूसरा, अपने अनुकूल विमर्शों की आड़ में नामवरजी को उत्तर-आधुनिकतावाद के खाते में खपा लेने की होशियारी। सुधीश पचौरी को डॉ. नामवर सिंह का आलेाचना-कर्म आज भी एक तरह से लीलाओं का दिलचस्प पाठ ही नज़र आता है और उनकी यह स्वीकारोक्ति भी दिलचस्प है कि चूंकि ये मेरे पतन के दिन थे, इसलिए भी एक बड़े पतित से हमदर्दी होने लगी।" (पृष्ठ-15) देखने की बात यह थी कि हिन्दी के व्यापक पाठक समुदाय से यह छोटा पतित अब तक कितनी हमदर्दी बटोर पाया। वैसे सुधीश पचौरी की उत्तर-आधुनिकतावादी सोच से उपजे एक अहम सवाल का उत्तर नामवरजी ने अपने साक्षात्कार में काफी नप़े-तुले शब्दों में दे दिया था, बशर्ते कि सुधीश पचौरी और उत्तर-आधुनिकतावादी इस पर गौर करना पसंद करते। वह सवाल-जवाब कुछ यों था -
सुधीश पचौरी: जिसे आप बोलचाल, संवाद कहते हैं उसे हम डिस्कोर्स या विमर्श समझें और फूकोल्डियन डिस्कोर्स समझें, तो आरोप तो मैं नही कहूंगा, मगर मेरे मन में एक प्रश्‍न पैदा होता है कि जबसे आपने बोलना ज्यादा शुरू किया है, तब से साहित्य में राजनीति का विमर्श तो आप कर ही रहे हैं, लेकिन अब आप एक सत्ता का डिस्कोर्स भी कर रहे हैं। यह जो सत्ता का विमर्श  आप कर रहे हैं तो साहित्य के अनुशासन के हेतु आप कर रहे हैं। आप इसमें जो साहित्य का अनुशासन हो रहा है, वह क्या बन रहा है?
नामवर सिंह: फूको का नाम लिया आपने। ज्ञान मात्र को उसने सत्ता के पर्याय के रूप में देखा है। यद्यपि मैं उस पूरे दर्शन को मानता नहीं हूं। सारे संघर्ष को सत्ता का संघर्ष ही मान लिया जाए तो सत्यनाम की चीज़ तो रह नहीं जाएगी। ये हो जायेगा कि आज जो दमन करने वाले लोग हैं, जिनके हाथ में सत्ता है वो और दलित जो सत्ता में भागीदारी चाहते हैं, इसलिए दोनों समान रूप से दोषी होंगे। इसलिए साहित्य में वह कौन-सी सत्ता है, जिसको लेने के लिए, हथियाने के लिए संघर्ष चल रहा है, मैं नहीं जानता। मैं तो इतना ही जानता हूं, मेरी समझ में एक साहित्यकार के नाते जो सचहै उस सच का यदि गला घोंटा जा रहा हो, दबाया जा रहा हो, परदा डाला जा रहा हो तो हम कोशिश करते हैं कि कम से कम उसकी जितनी रक्षा की जा सके, की जाय। चूंकि मैं आलोचना ही लिखता हूं तो आलोचना में यही मेरा प्रयास होता है। (पृष्ठ-492-493)
      जाहिर था कि फूकोवादी डिस्कोर्स चलाने वालों को यह शालीन और सटीक उत्तर रास नहीं आया और आगे कभी इसकी कोई चर्चा चलाना भी उन्‍होंने कम ही पसन्द किया।  उस आयोजन में इतना जरूर हुआ कि संपादक सुधीश पचौरी अपने पसन्दीदा चयन - अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव, गोविन्द द्विवेदी, कृष्णगोपाल वर्मा  और ललित कार्तिकेय की आधी-अधूरी टिप्पणियों के माध्यम से अपने उद्देश्‍य को एक हद तक पूरा कर पाने में कामयाब रहे। उन्होंने इस अर्थ में ईमानदारी अवश्‍य बरती है कि अन्य समकालीनों से बातचीत करने के साथ स्वयं नामवर जी से भी साक्षात्कार आयोजित कर बहुत-सी जरूरी बातों का खुलासा उन्‍हीं से ले लिया, वे स्‍वयं उसे मानें न मानें, ये उनका अपना मामला था। इसी आयोजन के तीसरे खण्ड में प्रस्तुत नामवर जी के चुनिन्दा आलोचनात्मक निबंधों और चौथे खण्ड में उनके विस्तृत साक्षात्कार के बाद सुधीश के संपादकीय में नामवरसिंह के जिस नये पाठ की आवश्‍यकता पर बल दिया गया था, वह बात स्वतः ही अप्रासंगिक हो गई।
      नामवरजी की कई बातों से असहमति रखने के बावजूद मैनेजर पाण्डेय यह अवश्‍य मानते रहे हैं कि उनके सम्पूर्ण आलोचनात्मक चिन्तन और व्यवहार में समकालीन रचनाशील प्रवृत्तियों की गहरी पहचान मिलती है, उसकी उपलब्धियों और कमजोरियों का विश्‍लेषण करते हुए ही समकालीन साहित्य में निहित प्रतिमानों की खोज का प्रयत्न भी संभव हो पाता है। इस अर्थ में डॉ. नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के एक ऐसे अनिवार्य संदर्भ के रूप में उभर कर सामने आते हैं, जिन्हें छोड़कर, हिन्दी आलोचना पर शायद ही कोई संवाद संभव हो सके।
      मुझे लगता है, अलग अलग समय पर अलग अलग लोगों द्वारा आलोचक नामवर सिंह पर होते रहने वाले ये आक्रमण अकारण नहीं थे, और न इनके पीछे साहित्यिक मूल्‍यांकन का कोर्इ वस्‍तुपरक आग्रह ही। उनके अब तक के आलोचना-कर्म और आलोचना-प्रक्रिया पर संजीदगी से बात हो, उनके नजरिये और तरीके से सहमति या असहमति हो, इसमें भला किसी को क्‍यों ऐतराज होगा? लेकिन उनकी जीवन-शैली, शैक्षणिक कार्य-क्षेत्र और सार्वजनिक जीवन को लेकर अपने निजी राग-द्वेष रखने वाले लोग जब उनकी आलोचना-दृष्टि और उनकी आलोचनात्‍मक कृतियों पर बात करते हैं और उन पर अपने मनोगत निष्‍कर्ष आरोपित करते हैं, तो एक अलग तरह की अप्रिय बहस सिर उठाने लगती है। ऐसे लोग दरअसल उनके आलोचना-कर्म पर नहीं, अपने ही किन्‍हीं वैयक्तिक राग-द्वेष पर बात करते हुए उसे सिद्धान्‍त या आलोचना का जामा पहनाने का असफल प्रयास कर रहे होते हैं और यहीं आकर यह उत्‍तर-आधुनिकतावादी विमर्श अपनी सारी अर्थवत्‍ता खो देता है, ऐसे लोग समकालीन हिन्‍दी आलोचना में नामवरसिंह के होने का अर्थ प्राय: कम ही स्‍वीकार कर पाते हैं।  
-71/247, मध्‍यम मार्ग
मानसरोवर, जयपुर – 302020
nandbhardwaj@gmail.com  

Monday, December 3, 2018


बाजार की संस्‍कृति और आम जीवन                                                   

·        नंद भारद्वाज

     संस्कृति के अलग-अलग पक्षों पर पिछले एक अरसे से बराबर अध्‍ययन-अनुसंधान होता रहा है और उसके निष्कर्ष अक्‍सर चर्चा का विषय बनते रहे हैं, लेकिन कोई भी अध्ययन या अनुसंधान अपने आप में पूर्ण या अंतिम होने का दावा नहीं कर पाता। अधिकांश अनुसंधानकर्त्ता या तो इसकी विविधता पर मुग्ध होते रहे हैं, कुछ चकित हैं, कुछ गहरे चिन्तन में डूबे हैं और कुछ परम चिन्तित ! इस अध्ययन और अनुसंधान की विषयगत चिन्ताओं से दीगर कुछ दुनियादार ऐसे भी हैं, जो इस सांस्कृतिक-उपक्रम का सामयिक लाभ भली-भांति पहचान चुके हैं और उसके जरिये अपना हित साधने-संवारने में पूरी तरह सतर्क और सक्रिय हैं। उन्हें कभी कोई अपराध-बोध या आत्म-चिन्ता नहीं घेरती। वैसे भी पूंजीवादी समाज में कला और संस्कृति की यह दशा होती आई है - वजह शायद यह भी रही कि जब मनुष्य का निजी अस्तित्व और उसकी अस्मिता ही संकट में दिखाई दे, तो कला-संस्कृति की चिन्ता कौन करे? लेकिन एक जागरूक समाज में यह स्थिति ज्यादा दिन तक नहीं चल सकती। अहम सवाल इस स्थिति के सिर्फ अध्ययन-अनुसंधान का नहीं, बल्कि जान-समझ लेने के बाद उसे बदलने का है।
     आज संस्कृति को ऐसे भिन्न अर्थ और रूप में समझने और समझाने की जरूरत है कि अपनी खामियों-खूबियों को पहचानते हुए, हम अपने लिए सही रास्ता चुन सकें। संस्कृति अपने पुरखों के सामूहिक इतिहास, उनकी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, उनके आचार-व्यवहार, जीवन-दर्शन, रीति-रिवाज और सामाजिक आचरण सहित अपने मौजूदा जीवन-यथार्थ से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। वह समाज की विकास-प्रक्रिया के साथ ही विकसित हुई है और उसका स्वरूप निरन्तर बदलता रहा है।
     चिन्ता की बात यह है कि एक ही अंचल में बसने वाले जातीय-समुदाय, एक ही तरह की भाषा, आचार-व्यवहार और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़े हुए लोगों के बीच आज अलगाव और विभेद की खाइयां गहरी और चौड़ी हो गई हैं - मेल-मिलाप और संघर्ष के उलझे हुए रिश्‍तों का संतुलन आज सिरे से बिगड़ गया लगता है और यह परिस्थिति विशेष रूप से आजादी के बाद के सालों में और भयावह होती गई है। भारतीय समाज की इस दशा में सुधार हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है। आज यह समस्या इतनी विकट हो गई है कि हर प्रयत्न अपर्याप्त साबित होता जा रहा है। ऐसी अवस्था में आज कला और संस्कृति के क्षेत्र में काम करने वाले जन-संचार माध्यमों से किसी बड़े परिवर्तन की आकांक्षा रखते हुए संकोच-सा होने लगा है। यह बात दूसरी है कि इस बदली हुई परिस्थिति में जन-संचार माध्यम ही वे सुलभ साधन रह गये हैं, जिनमें जन-आकांक्षाएं अपना अक्स देखती हैं।
    दरअसल यह विकट परिथिति बीसवीं सदी के उन आखिरी तीस सालों में बनी, जहां  सैटेलाइट और तकनीकि विकास के क्रान्तिकारी उछाल ने दुनिया का आर्थिक परिदृश्‍य बदलकर रख दिया था। इसी दौर में तेजी से बदल़ते समीकरणों को लेकर दुनिया के अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, समाजशास्त्री और मीडियाकर्मी (साहित्यकारों सहित) लगभग एकमत हैं कि यह वैश्विक पूंजीवाद के विकास की एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जिसमें वित्तीय-पूंजी ने अपने उत्पादों और आर्थिक प्रक्रियाओं के चलते जल, जमीन और हवा में एक सिरे से दूसरे सिरे तक कहीं भी पहुंच जाने की खुली छूट हासिल कर ली है। आवारा पूंजी के बल पर बनी यह पहुंच भौतिक और आभासी दोनों रूपों में देखी जा सकती है। यह और बात है कि पूंजी के इस खेल में आज सभी देशों की हैसियत एक जैसी नहीं है। सबके पास पूंजी निवेश की ताकत भी एक सरीखी नहीं है, इसलिए यदि यह कहा जाय कि यह प्रक्रिया अपनी प्रकृति में ही इकतरफा और असमान शर्तों पर आधारित है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सीधे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि यह दुनिया के कुछ तथाकथित विकसितदेशों (अमेरिका, कैनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, जर्मनी, इटली, रूस और जापान) द्वारा अपनी पूंजी और सामरिक बल पर दुनिया के बाकी देशों के बाजार पर कब्जा जमाने और अपना मुनाफा वसूल करने की खुली छूट का ही दूसरा नाम है, जिसे चाहें तो नव-साम्राज्यवादी या नव-उपनिवेशवादी प्रक्रिया भी कह सकते हैं। मोटै तौर पर इसी को बाजारीकरण या भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के रूप में लिया जा रहा है।
     हमारे देश में आजादी के बाद से अंग्रेजी, हिन्दी और अन्य भाषाओं के जन-संचार माध्यम इस वैश्विक परिदृश्य पर लगातार बल देते रहे हैं और बराबर आगाह करते रहे हैं कि हमारा देश भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया में कहीं पीछे न छूट जाय -  गोया हम भी उन जी-8 की प्रतिस्पर्धा में एक प्रभावशाली प्रतिभागी बने रहें, जबकि हालत यह है कि हमारा बाजार और जीवन-शैली लगातार उनकी गिरफ्त में पहुंचती गई है और देश, विदेशी कर्ज के गर्त में आकंठ डूबता गया है। आठवें दशक के बाद तो हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाएं भी इस वास्तविकता को उजागर करने में शामिल तो जरूर हो गईं, लेकिन उनका नजरिया उन व्‍यावसायिक माध्‍यमों से कतई अलग था । खुद भारतीय लेखक अब आर्थिक, राजनीतिक और समाजशास्त्रीय मसलों पर खुलकर अपनी राय व्यक्त करने लगा थे। और निश्चय ही इससे उनके साहित्यिक-सामाजिक सरोकारों का दायरा और व्यापक हुआ ।
     हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार और साहित्यकर्मी डॉ. रमेश उपाध्याय ने भूमंडलीकरण की इसी प्रक्रिया के तहत साहित्य की नयी रचनाशीलता पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर एक अच्छे-खासे ग्रंथ की रचना कर डाली है। वे इस बात पर विशेष बल देते रहे हैं कि भूमंडलीकरण को केवल पूंजी के निर्बाध प्रवाह के रूप में ही नहीं, उसे श्रम के भूमंडलीकरण के रूप में भी देखना चाहिए और एक ऐसी ऐतिहासिक दृष्टि से देखना चाहिए कि पूंजीवाद की वैश्विक व्यवस्था के विकल्प के रूप में एक बेहतर वैश्विक व्यवस्था का नक्शा उभरे तथा उसका निर्माण संभव दिखाई दे। उनकी नयी कृति साहित्य और भूमंडलीय यथार्थइस विषय के विभिन्न पहलुओं को विस्तार समझने का अवसर देती है।
     भूमंडलीकरण की इस प्रक्रिया का लक्षित क्षेत्र ऊपरी तौर पर बेशक आर्थिक और राजनीतिक दिखाई देता हो, उससे समूची दुनिया की सामाजिक संरचनाएं और संस्कृतियां गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। यों भी भूमंडलीकरण संस्कृति को साम्राज्यवाद के वाहक की भूमिका में ही देखता रहा है। संस्कृतिकर्मियों ने भूमंडलीकरण के इन्हीं खतरों और दुष्प्रभावों को गहराई से महसूस करते हुए अपने माध्यमों के जरिये लगातार इनके प्रति सतर्क रहने और संघर्ष करने पर बल दिया है।
     किसी प्रदेश की संस्कृति को बनाने या बिगाड़ने में इलैक्ट्रॉनिक मीडिया या अन्य किसी माध्यम की अपने आप में कोई निर्णायक भूमिका होती हो, ऐसा पहले से मान कर चलने का कोई कारण नहीं है। न ये माध्यम जीवन के बाहरी या अन्दरूनी हालात बदल सकते हैं और न लोगों के जीवन स्तर को ही। जब तक उनकी माली हालत, आर्थिक प्रक्रियाएं और जीवन यापन का तरीका नहीं बदलता, उनके सांस्कृतिक व्यवहार में इलैक्ट्रॉनिक मीडिया या अन्य माध्यम कोई खास असर नहीं रखते। इसके विपरीत जागरूक और संगठित समाज इन माध्यमों का अपनी सामाजिक आवश्‍यकताओं - खास कर संस्कृति के संरक्षण, प्रोत्साहन और शैक्षणिक कार्यों में बेहतर उपयोग अवश्‍य कर सकता है। हो यह रहा है कि इनको विश्‍व-बाजार के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए खुला छोड़ दिया गया है, कारपोरेट समर्थित राजसत्‍ता ने भी इन्‍हें अनुकूलित कर लिया है और देश का बुद्धिजीवी वर्ग बगैर वास्तविक कारणों की पड़ताल किये इस बात से दुखी है कि इलैक्ट्रॉनिक मीडिया हमारी संस्कृति और दैनंदिन जीवन को दूषित कर रहा है, जबकि विश्‍व-व्यापी व्यापारिक चैनलों की होड़ में आज इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का अपना चरित्र आमूल बदल गया है।
    संस्कृति के संरक्षण और उसके विकास के नाम पर आजादी के बाद पर्यटन पर खूब बल दिया गया है और वह भी ग्रामीण पर्यटन पर। ग्रामीणों और सैलानियों को पहली नजर में यह काफी लुभावना लगता है - यानी गांवों की ओर चमचमाती गाड़ियों में आते रंग-बिरंगे सैलानी, उनकी आव-भगत में आंखें बिछाये, अपनी मेहमान-नवाजी के लिए मशहूर भारत के ग्रामवासी, बधावे गाती नव-वधुएं और अपनी पारंपरिक पोशाकों में द्वारपालों की तरह अदब से खड़े ग्रामीण-जन! लेकिन ज्यों ही असलियत पर से पर्दा हटने लगता है याकि चारों ओर बिखरी वास्तविकता को हम उलट-पलट कर देखना आरंभ करते हैं, तो सारी तस्वीर धुंधली, धूसर और टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देने लगती है - कई बार तो विद्रूप और भय उत्पन्न करती-सी भी।
       सैलानी का पहला मकसद होता है अपने आमोद-प्रमोद और तफरीह के लिए नये-नये इलाकों की खोज - उनमें घूमना-फिरना और अपनी एकरस और सुस्त हो रही ज़िन्दगी में नया थ्रिल पैदा करना। ऐसे लोग चाहे देश के किसी अन्य हलके या प्रान्त से आते हों या बाहरी मुल्क से, वे आमतौर पर ऐतिहासिक इमारतों, धार्मिक स्थलों, प्राकृतिक दृष्टि से रमणीक समझे जाने वाले ठिकानों, अपने से भिन्न संस्कृति और लोक-जीवन की बानगी वाले आकर्षक स्थलों, वनों, अभयारण्यों और निर्जन स्थानों की खोज में ही अपनी इस घूमंतू वृत्ति की सार्थकता देखते हैं और ऐसे स्थानों पर आने के बाद उनके मकसद और इरादे भी अक्सर बदल जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि इस तरह आने वाले देशी और विदेशी सैलानियों की संख्या इन बीते पच्चीस-तीस सालों में लगातार बढ़ती रही है।
       दिलचस्प बात यह है कि पर्यटन से जुड़े इन ऐतिहासिक-धार्मिक-प्राकृतिक महत्व के स्थलों से जुड़ा यह उद्यम अब लगातार उनके आस-पास के ग्रामीण इलाकों और वहां के ग्रामीण जीवन को अपनी लालसा में लपेटता जा रहा है। उन ग्रामीणों का खान-पान, पहनावा, उनके तीज-त्यौहार और लोकानुरंजन के उत्सव अपने मूल स्वरूप से हटकर उनके आमोद-प्रमोद का हिस्सा होकर एक तरह के पर्यटक बाजार में तब्दील होते जा रहे हैं। शायद यह उसी का परिणाम है कि आज हर बड़े शहर में ऐसे अनोखे गांव और चौखी-अनोखी ढाणियां विकसित हो गई हैं, जो उन्हें शहर में ही गंवई खुलेपन और अपनापे का आभास देने लगी हैं और ये सैलानियों के आकर्षण का बहुत बड़ा केन्द्र भी बनती जा रही हैं। ग्रामीण इलाकों में बने किले, हवेलियां और रावले, जो देखरेख के अभाव में खंडहर होते जा रहे थे, हेरिटेज होटल्स में तब्दील होकर कमाई का जरिया बन गये हैं।
      पर्यटन एक ऐसा व्यवसाय है जो अपना आधारभूत ढांचा स्वयं अपने दबाव से विकसित करवा लेता है। वह इस बात का इंतजार नहीं करता कि कोई सरकार या बाहरी संस्था आगे बढ़कर उसके लिए बुनियादी सुविधाएं जुटा दे तो वहां पर्यटन की गतिविधियां शुरू की जाएं। अनुभव बताता है कि ऐसे बहुत से स्थल हैं, जहां पर्यटक पहले पहुंचे और सुविधाएं बाद में धीरे-धीरे जुटती चली गईं - ऐसी सुविधाएं जुटाना खुद जुटाने वालों के लिए भी अन्ततः फायदे का सौदा ही साबित होती हैं।
       ग्रामीण क्षेत्रों की ओर बढ़ते इस पर्यटन या पर्यटन की लपेट में आते ग्रामीण जीवन के बीच का रिश्ता उतना सरल और सीधा नहीं होता, जितना ऊपर से दिखाई देता है। पहली बात तो यही कि आजादी के बाद पिछले पच्चीस-तीस सालों में ग्रामीण जीवन में ऊपरी तौर पर बेशक कुछ बदलाव आया हो - जैसे सभी बड़े गांव रेल-सड़क यातायात से जोड़ दिये गये हैं, ग्रामीण विद्युतीकरण की नयी योजनाओं ने, बावजूद अपने अन्दरूनी संकट के, उन गांवों को जमीनी बिजली से जोड़ दिया है, कनेक्शन जोड़ लेने के बाद भी वह रौशनी दे पाए या न दे पाए, वह एक अलग मसला है। पानी की पाइप-लाइनें भी बिछ गई हैं, गांवों में चौखंभी मीनारों पर पानी की बड़ी टंकियां भी खड़ी कर दी गई हैं, उनमें पानी की आपूर्ति हो पाए या न हो पाए, इसकी कोई जवाबदेही निश्चित नहीं है! उपग्रह प्रणाली की बड़ी सफलता के बाद हर गांव में दूर-संचार की सेवाएं पहुंचा दी गई हैं - और यों भी निजी क्षेत्र में हुए फफूंदी-विस्तार के बाद तो अब दूर-संचार सेवाएं किसी सरकारी तंत्र की मोहताज नहीं रह गई हैं। परिवहन और ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में आई नई क्रान्ति के कारण दुपहिया और चौपहिया वाहन अब गांवों में आवागमन के आम साधनों की तरह हो गये हैं और रही-सही कसर जन-संचार के नये माध्यमों और कंप्यूटर के विस्तार तथा सूचना क्रान्तिने पूरी कर दी है।
       लेकिन इस ऊपरी तरक्की और विस्तार के बावजूद गांव की वास्तविक दशा में कोई खास बदलाव नहीं आया है, उल्टे अन्दरूनी तौर पर उसकी अपनी आत्मनिर्भर व्यवस्था, कृषि, पुश्तैनी काम-धंधे, ग्रामीणों के बीच का पारस्परिक सद्भाव और अन्याय-अत्याचार के प्रति संवेदनशीलता और कमजोर हो गई है। जातीय विद्वेष, छुआछूत की भावना और सामाजिक न्याय के मसले इस बदले हुए राजनीतिक माहौल में और खराब अवस्था में पहुंच गये हैं। स्त्रियों की दशा पहले भी खराब थी, वह समुचित शिक्षा-सुरक्षा और बढ़ती व्यावसायिकता के दौर में और बदतर अवस्था में पहुंच गई है - गांवों में बलात्कार, अपहरण, दहेज के कारण होने वाली हत्याओं और स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा की घटनाओं में इन सालों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई है। बेशक स्त्री संगठनों में इस बात को लेकर कुछ जागरूकता आई हो, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र और असर शहरों और बड़े कस्बों तक ही सीमित है, छोटे गांवों और ढाणियों की स्त्री आज भी अकेली और असुरक्षित है। इस पर्यटन व्यवसाय की गांवों में विकसित हो रही उन भौतिक सुविधाओं और अपने आमोद-प्रमोद में तो जरूर दिलचस्पी है, लेकिन ग्रामीणों की अन्दरूनी हालत और स्त्री की दशा पर विचार करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है।
        विचारणीय बात यह है कि इस बाजार की संस्कृति के दौर में हम आम जीवन की बिगड़ती दशा को किस नजरिये से देखें! हालत यह है कि अपनी गरीबी और दीन-दशा के कारण वह वैसे भी सामान्‍य आदमी एक अवांछित की तरह हो गया है। जिस गांव-कस्‍बे या शहर में वह रहता है, वहां अब उसके लिए कोई काम नहीं रह गया है, महानगरों में भी नोटबंदी और जीएसटी की मार से छोटे व्‍यवसाय और काम-धंधे चौपट हैं और रोजगार की संभावनाएं लगभग समाप्‍तप्राय। अभावग्रस्‍त गांवों में बिजली-पानी की सुविधाएं वैसे ही उसकी पहुंच से बाहर हैं। जन-संचार और दूर-संचार के साधनों का उसके लिए कोई खास अर्थ-मतलब नहीं रह गया है शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत पहले से बदतर ही हुई हैं, ऐसे में उनका उपयोग वह कम ही कर पाता है। इन सीमित साधन-सुविधाओं पर जनसंख्या के बढ़ते दबाव और लोगों की दीन-हीन दशा के कारण भारतीय लोकतंत्र और उसका मालिक मतदाता दोनों गहरे संकट के दौर में पहुंच गये हैं। इस संकट के बावजूद राजनीतिक दलों के लिए मतदाता तो वह है ही, इसलिए उसे अनदेखा भी नहीं किया जा सकता - ऐसे में एक ही तरीका बच रहता है कि उसके सामने देश की गरीबी और बढ़ती हुई आबादी का रोना रोया जाय, और वह भी कुछ इस अंदाज में कि इसके लिए वह अपने आपको ही कोसता रहे! उसे बताया जाता है कि देश लगातार तरक्की कर रहा है, लेकिन वे अभागे लोग अपने पिछड़ेपन, अशिक्षा और अपनी काहिली के कारण उस विकास-प्रक्रिया में भाग नहीं ले पा रहे हैं, उन्‍हें जल्द-से-जल्द अपनी इन कमजोरियों पर काबू पाना चाहिए और विकास की (अमूर्त)  मुख्य-धारा में शामिल हो जाना चाहिए। वह जब तक अपनी दुरावस्था पर इस तरह के विवेचन और व्याख्यान सुनता रहेगा, उससे बाहर निकलने के उपाय पर खुद कोई विचार या पहल नहीं करेगा, जो उसी के बूते अपनी इस ओछी राजनीति के बल पर सार्वजनिक जीवन में जिन्दा हैं, तब तक इस विकट परिस्थिति का क्या हल संभव है, कहना आसान नहीं है!
       यहीं हिन्दी के विख्यात कथाकार निर्मल वर्मा का यह विवेचन मुझे याद आता है। वे कहते हैं: ‘‘मानव संसार में जहां भी मनुष्य अपनी भौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने से बाहर किसी अन्य सत्ता पर निर्भर करता है, उसे अनिवार्यतः उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। वह पूर्णतः अपना स्वामी नहीं रहता, स्वाधीनता का अंश उन सत्ताओं को समर्पित करना पड़ता है, जो धरती पर उसका जीवन संभव बनाती हैं। बदले में ये सत्ताएं उसके लिए पूरा एक नीति-विधान और नियम-संहिता बनाती हैं, जो उसके जीवन के समस्त पक्षों को प्रभावित करती है। ..जिन सामाजिक-राजानीतिक सत्ताओं के बीच मनुष्य रहता है, वहां उसका केवल एक अंश उदघाटित होता है, केवल उतना अंश जो इतिहास द्वारा परिचालित होता है। किन्तु मनुष्य सिर्फ ऐतिहासिक प्राणी नहीं है।.....इतिहास और समाज की सत्ताएं उसे बांधती हैं - कल्पना में वह हर दिये हुए बंधन, कानून, नियम संहिताओं से मुक्त हो जाता है। दो शब्दों में कहें तो वह पहली बार सामाजिक ऐतिहासिक प्राणी होने की बजाय सिर्फ एक मनुष्यहोने की परिकल्पना करता है।’’
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