Wednesday, August 21, 2019



कुछ लिक्‍खा जो नितान्‍त अपना होता है 

 *  नंद भारद्वाज 

एक संवेदनशील मनुष्य जिस सामाजिक-सांस्‍कृतिक पर्यावरण में जीता है, उससे उपजने वाले सुख-दुख, मनोवेग, अनुभव, आशंकाएं और संघर्ष मानवीय अभिव्‍यक्ति के कई रूपों में व्यक्त होते हैं - कविता सर्जनात्‍मक अभिव्‍यक्ति का ऐसा ही कला-रूप है, जो एक संवेदनशील रचनाकार के अन्‍त:करण से रूबरू कराता है। जो रचनाकार अपनी काव्य-परंपरा और भाषिक संवेदन के प्रति सचेत रहते हुए मौलिक अभिव्यक्ति के लिए आग्रहशील रहते हैं, वे अपनी कविता का अलग मुहावरा और पहचान तो विकसित करते ही हैं, उस परम्‍परा में कुछ नया और बेहतर जोड़ने का प्रयत्‍न भी करते हैं। विमलेश शर्मा ऐसी ही संवेदनशील कवयित्री हैं, जो अपनी कविताओं के माध्‍यम से उस काव्‍य-परम्‍परा और नवोन्‍मेष के बीच एक बेहतर रिश्‍ता  बनाने के लिए प्रयासरत हैं।    
     कविता जहां मानवीय संवाद का एक विश्‍वसनीय माध्‍यम मानी जाती है, वहीं वह आत्‍मसंवाद या आत्‍माभिव्‍यक्ति का प्रभावशाली रूप भी – एक ऐसा कला-रूप, जिसे अपनाते हुए हर रचनाकार अपने भीतर के मनुष्‍यत्‍व से अंतरंग साक्षात्‍कार करता है। यह उस जैविक संवेदन और विवेक का अपना वरण और विस्‍तार भी है, जो उसे सर्जक की गरिमा प्रदान करता है। विमलेश की इन कविताओं के बीच से गुजरते हुए यह बात विश्‍वास से कही जा सकती है कि उनकी बयानगी की सहज विनम्रता उनके सर्जनात्‍मक प्रयत्‍न को और गहरा एवं आत्‍मीय बनाती  है। अपनी इसी विनम्र काव्‍य-प्रकृति के बूते वे सदियों पुरानी आख्‍यान-परम्‍परा से आती कृष्‍णप्रिया के अपूर्ण प्रेम की पीड़ा और पदचाप को न केवल सुन पाती हैं, बल्कि उन्‍हीं स्‍मृति-गलियारों में उसे अक्‍क महादेवी और मीरां के काव्‍य-संवेदन में और विस्‍तार पाते भी देखती हैं।
     प्रेम और रागात्‍मकता इन कविताओं में केन्‍द्रीय भाव की तरह विन्‍यस्‍त है। इसी भाव-लोक के इर्द-गिर्द रची गई इन कविताओं में प्रेम की अंतरंगता, उल्‍लास, राग-विराग उसकी व्‍यापकता को अभिव्‍यक्‍त करते हुए जब वे यह कहती हैं कि “मैं ॠतु नहीं हूं / पर उसका उल्‍लास सहेज / सदा खिलता रहूंगा तुम्‍हारे लिए” या कि “मैं वह आकाश हूं / जो थामे रहता है / धरा को / तमाम मौसमों में” तो प्रेम की एक विराट परिकल्‍पना आकार लेने लगती है।
        अपनी विनम्रता और सहजता में वे बहुत सरस और सुहाती बातें बेशक कहती हों, किन्‍तु जीवन के कटु यथार्थ से उपजने वाली टीस, कठिन रास्‍तों की कश्‍मकश और मनुष्‍य के असंगत आचरण से होने वाली परेशानियों को भी अपनी बयानगी का हिस्‍सा अवश्‍य बनाती हैं। जीवन-यथार्थ की इसी बेबाक सचाई को लक्षित करते हुए वे कहती हैं – “जीवन को जीना आसान नहीं होता / यहां एक जीवन के भीतर जाने कितने जीवन छिपे होते हैं / बहुत कुछ होते हुए भी / कुछ नहीं होता यहां / बहुत फर्क पड़ते हुए भी / सब ठीक-ठाक रहता यहां। / चलते हुए भी बहुत कुछ ठहरा है यहां / और दिखती गहराई में सब कुछ उथला है यहां ! दुनिया के इस उथलेपन को उन्‍होंने अन्‍यत्र भी उजागर करते हुए मनुष्‍य और व्‍यवस्‍था के आचरण पर गंभीर सवाल उठाए हैं, खासकर स्त्रियों के प्रति होने वाले उस विषम आचरण को लेकर, जहां स्‍त्री आज भी अपने को वंचित और असुरक्षित अनुभव करती है। इस अवस्‍था से उबरने के लिए वे स्‍वयं स्त्रियों का ही आह्वान करते हुए कहती हैं – “तुम जब इस जंगल के बियाबान में उतरोगी / तब बहुत-सी बातें होंगी / जिन्‍हें तुम कह सकती हो / विचित्र, अनहोनी, बकैती या ऊलजलूल / हिम्‍मत रखना, रहना अटल / और अनसुना कर देना उस बतकही को / जो खारिज करती है तुम्‍हारी निष्‍पाप चेतना को।" इतना ही नहीं, इन विषम परिस्थितियों में भी वह सकारात्‍मक संदेश देते हुए इस दुनिया की खूबसूरती को कतई अनदेखा नहीं करती और कहती है – “भरोसा रखना कि / दुनिया फिर भी खूबसूरत है / उसी चमकीले रूपक की तरह / जिसे तुम जन्‍नत कहा करती हो।" लेकिन आज इस ‘जन्‍नत’ की बदहाली हर किसी की आंख में खटक रही है। देश-दुनिया का आमजन जिन कठिन हालात का सामना करते हुए जी रहा है, कोई भी संवेदनशील और सजग कवि इससे अछूता कैसे रह सकता है? विमलेश की कविताओं का यह पक्ष भी उतना ही महत्‍वपूर्ण है, जहां वे सामयिक हालात पर पैनी नजर रखते हुए ‘सन्‍नाटों में दीपते रतजगे’ जैसी प्रभावशाली कविता के माध्‍यम से अपनी चिन्‍ताएं कुछ यों व्‍यक्‍त करती हैं – “एक शोर मचता रहता है रात की निस्‍तब्‍धता चीर / जिसकी चोट कनपटी पर फड़क बन उभरती है / शोर, आहटों, पदचापों के बीच कोई बुदबुदाता है / कि तुम्‍हें यूं नहीं लौटना था / कि तुम्‍हें यहां होना था / कि तुम्‍हें जीने का सलीका सीखना था / कि तुम्‍हें प्रतिरोध करना था / कि तुम्‍हें अपना मान रखना था।" यथार्थवादी तेवर की इस बयानगी में ‘दीपदान’, ‘भोर-बाती’, ‘लौटना महज लौटना नहीं होता’ आदि ऐसी ही उल्‍लेखनीय कविताएं हैं। 
      विमलेश शर्मा के इस संग्रह में सामयिक यथार्थ और पारिवारिक मानवीय संबंधों की गुरु-गरिमा को उजागर करती कुछ ऐसी विलक्षण कविताएं भी हैं, जो अपनी विषयवस्‍तु और बयानगी में गहरा प्रभाव छोड़ने की क्षमता रखती हैं। विशेषत: माता-पिता और सं‍तति के रिश्‍ते को लेकर रची गई दो बेजोड़ कविताएं हैं - ‘मां को जीते हुए’ और पिता-पुत्री के आत्‍मीय रिश्‍ते पर लिखी कविता ‘पिता यूं ही नहीं पिता हो जाते’। मां पर लिखी इस कविता को पढ़ते हुए तो हिन्‍दी के यशस्‍वी कवि चंद्रकान्‍त देवताले की मार्मिक कविता ‘मां पर नहीं लिख सकता कविता’ का अनायास ही स्‍मरण हो आता है, हालांकि विमलेश की इस कविता की भावभूमि और बयानगी देवताले की उस कविता से नितान्‍त भिन्‍न और अनूठी है, खासतौर से एक मां-बेटी के संश्लिष्‍ट   रिश्‍ते को लेकर। इस सघन कविता की एक छोटी-सी बानगी देखें –
“जिसे लिखते हुए क़लम रुआँसी हो जाए / और आखर गीले
जिसे देखते हुए आँखों में पावित्र्य उतर आए
और हाथों में इबादत की मुद्रा / जिसकी छाँव सुकूनबख़्श हो
जिसे पढ़ते हुए कॉर्निया पर पनीली परत चढ़ जाए
बस ऐसी ही तो कुछ होती है माँ!”
और इसी तरह की मार्मिकता को उजागर करती पिता पर लिखी कविता की यह बानगी –
अक्‍सर टूट जाते हैं पिता
जब उनके शहजादे झुलस जाते हैं ताप से
जब उनकी बेटियाँ  /  काँच सी बिखर जाती हैं 
उन क्षणों में वे कोसते हैं उस ईश्वर को
उसके नियम, कानून, कायदों में रद्दोबदल की माँग करते हैं
और अंततः ठुकरा कर उस चौखट को  / स्वयं ईश्वर हो जाते हैं पिता ! 
      और एक अंतिम बात इस संग्रह की कविताओं के बारे में यह भी कि एक सजग कवयित्री के रूप में विमलेश शर्मा अपने लिखे का महत्‍व भी बखूबी जानती हैं, जिसकी ओर संकेत करते हुए उन्‍होंने कहा भी है – “मेरे लौट जाने पर / जब खोजोगे मुझे / कुछ नहीं होगा वहां / होंगे तो बस / संदूकची में करीने से तह किए कुछ शब्‍द / जिन्‍हें यह जानते हुए रख छोड़ा था कि‍ / कुछ लिक्‍खा नितान्‍त अपना होता है !” 

*** 

nandbhardwaj@gmail.com 
9829103455   

Tuesday, July 9, 2019


समीक्षा
नन्द भारद्वाज की कविताएं : आदिम बस्तियों के बीच

·        अपर्णा मनोज 

पश्चिमी राजस्थान के सीमावर्ती हलके में रेतीले धोरों के बीच बसा वह गुमनाम सा नाम -स्मृतियाँ अपने आदिम आकारों में वहीँ से चली आ रही हैं. कवि का कल्प-संसार इसी धरातल से जन्म लेता है और धरती की देह से उठकर कवि की देह में प्रविष्ट हो जाता है. अपनी जीवनचर्या में 'स्थान' अवचेतन में बना रहता है, किसी विवरण के तौर पर नहीं बल्कि कविता के भूगोल की निर्मिति के रूप में. अतीत के पैर केवल पुराकाल की खुदाई में होंगे, किसी ऐतिहासिक खुदाई में होंगे ऐसा नहीं, वे कहीं हमारी शब्दावलियों में गुम्फित हैं..हम पलटकर उन तक लौटते हैं. भाषा में उसका अतीत उतना ही रहता है जितना वर्तमान त्वरित गति से भविष्य को दौड़ता है. नन्द जी की कविताओं से वही आदिम संवाद पाठक का होता है. गाँव के प्रत्यय व्याकुलता और घेर-घुमेर संवेदनाओं के साथ उनकी कविताओं में लौटते हैं. एक घड़ा पानी से संवाद करते हुए कवि गाँव की टोपोग्राफी और उसकी भाषा में तल्लीन दीखता है-

"किसी प्राचीन पर्वत श्रृखला के पार
जितनी दूर भी आ सकें आप-
चले आइये,
रेतीले धोरों के बीच बिखरी बस्तियों में,
जहाँ घरों में एक घड़ा पानी ही
संचित पूँजी होता है,
सूरज,चाँद और सितारे होते हैं
उजास के आदिम स्रोत -" (कविता-एक घड़ा पानी)

स्थानिकता सहजता से कविता में अंतर्विष्ट होती है और कवि को अंतर्मुखी बनाती हुई जैसे अपने में गुनगुना रही है-

जानता हूँ,
ज्वार उतरने के साथ
यहीं किनारे पर ही
छूट जायेंगी कश्तियाँ
शंख-घोंघे -सीपियों के खोल
अवशेषों में अब कहाँ जीवन? (आदिम बस्तियों के बीच)

महत्त्वपूर्ण बात ये है कि यहाँ कीमियागिरी वर्णन या ब्यौरों की मुहताज नहीं, बल्कि विलक्षण तरीके से वह जीवन के अनुभवों की पुनर्रचना जान पड़ती है, जिसे कवि पूरी इंटेंसिटी और भाषिक आवेग के साथ व्यक्त करना सृजन की जरूरत मानते हैं.

मितबोले क्षणों में ::

जितनी बार कविताओं से संवाद किया,पाया कि वे हौले-हौले बोलती हैं और जरूरतभर बोलती हैं. गहरा बोलती हैं और पूरे स्पर्श के सुख के साथ बोलती हैं. यथार्थ में जीते हुए उनकी शांत भंगिमा कविता के स्त्री होने को सिद्ध कर देती हैं. ये छिपी हुई स्त्री ही कवि को करुणा और प्रेम का कवि बना रही है.

"आज फिर आई तुम्हारी याद
तुम फिर याद में आयीं -
आकर समा गई चौतरफा
समूचे ताल में... (तुम्हारी याद)

कहीं निचाट उदासी प्रेम में कुछ सोचते -सहेजते थके पाँव चली आती है-
"
और यही कुछ सोचते सहेजते
थके पाँव लौट आता हूँ
उन बीते बरसों की धुंधली स्मृतियों के बीच
गो कि कोई शिकायत नहीं है
तुम्हारे मान से-
फ़क़त कुछ उदासियाँ हैं
अकेलेपन कि अपनी." (तुम यकीन करोगी)

लोक की मरुगंध से::

लोक की मरुगंध में स्नात स्वैर विन्यास नन्द जी की कविताओं की विशिष्टता है. आप कविताओं तक आइये और वे उनके संस्कृतिकर्मी रूप को बोल उठेंगी. मरुधर में मोरचंग की तरह बजती हुई कविताएँ आस्वाद की बहुपक्षीय रीत से हृदय में उतरती हैं. कितनी ही सुपरिचित संज्ञाएँ हैं, जीवन के दृश्यों -परिदृश्यों की आख्यायिकाएँ हैं जो पाठक से उसी तरह बतियाती हैं जैसे चाँद पर बैठी बुढ़िया की कथा में एक तकली चल रही है, एक चरखा चल रहा है...  बहुत पुराना सूत..धुनता हैकतता हैबुनता है और समकालीन सन्दर्भों की काव्य-जिज्ञासा बन जाता है. काव्य -कौतुक से कहीं अधिक उत्सुकता का भाव यहाँ स्थायी रूप से वास कर रहा है. जटिलताएँ जनविसर्जन में सरल हो रही हैं. भाषा भी इसी सरलता में विन्यस्त हो गई है; दृष्टव्य है कि गंभीरता आद्योपांत इन कविताओं की प्रकृति है, जो इनके लोकवृत को विस्तार दे रही है. जन सरोकारों से सीधा कवि को जोड़ रही है. आंधी-अंधड़ के शोर गुल वाले समय में कवि नैराश्य के स्वर को तोड़ता है. अतियथार्थवाद का संत्रास यहाँ नहीं है, बल्कि जीवन को भरोसे से देखने का भाव है.

"आदमी के हाथ" कविता में नन्द जी माटी में खिलते आदमी के सयाने हाथों को लेकर जहाँ विचलित हैं,वहीँ अंततः आश्वस्त होते दीखते हैं.
"
धमाकों से थरथरा उठती है
धरती की कोख-
यह किस तरह की आत्मघाती आग में
घिरता-झुलसता जा रहा है
आदमी !
आदमी के हाथ-
बंजर में फूल खिलाते हैं."(आदमी के हाथ)

उलझे हुए सन्दर्भों बीच साफगोई::

चारों तरफ ढेरों उलझे हुए सन्दर्भ हैं. तो हमारे समय की कविता भी उलझ गई है. कहीं वह यथार्थ के जादू में अपना अस्तित्व तलाश रही है तो कहीं यंत्रणा से गुज़रते हुए असंतोष में जी रही है. कविता का मुहावरा बदला है. तकनीक ने इसे मशीनी कलात्मकता की तरफ धकेला है. नाना प्रयोग हैं. हम मिथ तोड़ने में लगे हैं. अस्पष्ट सी बातें हैं. वाद बहुतेरे हैं. विरोधाभास से हम घिरे हैं. लोकतान्त्रिक मांग है पर पूंजीवाद से पीछा नहीं छूट रहा. बाज़ार की अंतर्छायाएँ लेखक और पाठक में डोल रही हैं. आतंक से उबरे नहीं हैं. संशय बढ़ा ही है. ऐसे में नन्द जी का काव्य-संसार संयत होकर अपनी बात कहता -सुनता दिखाई देता है.
सब कुछ स्तुत्य होगा, ऐसा भी नहीं है;पर खुशामदीद पूछती-चाहती कविताएँ हैं.कवि की चिंताएं समय के सन्दर्भ में अपनी प्रासंगिकता खुद-बखुद सिद्ध कर रही हैं. अपनी कविता "उलझे हुए संदर्भ" में आवाज़ों की जात पर कवि प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं..यहाँ यंत्र बेकाबू हो गए हैं,लोग बाज़ारों में लापता हैं.संचार-व्यवस्था अबूझ संकेतों में उलझी है. ये कैसा विरोधाभास है कि कवि को अटल होकर कहना पड़ रहा है कि


"
पिछले कई महीनों से-
दमकलें बाधाओं को कुचलती
बेतहाशा भाग रही हैं,
आवाजाही के सारे कायदे उलट गए हैं
सायरन चीख रहे हैं लगातार
समूचा आसमान धुएँ से भर गया है,
परेशान है (उलझे हुए संदर्भ)

दूसरी ओर गुमनामियों से निकलकर ये आवाज़ आम आदमी पर केन्द्रित हो जाती है. यहाँ वह विद्रोह करता है और प्रश्न पूछने का साहस रखता है. दमित सवालों की पटभूमि से अनुगूंज सुनाई देती है-

"आदमी तड़प कर पूछता है:
आखिर मेरा अपराध क्या है?
क्यों हर बार मुझे
मरने के लिए अकेला छोड़ दिया जाता है-
निहत्था करके ठेल दिया जाता है
अकाल की हिंसक परछाइयों के बीच
आखिर क्यों?"

 रिश्तों की आंच में::

जीवन की बहुवचनीयता में अकसर हम अंतरंगता और निजता की गंध को भूल जाते हैं और कस्तूरी मृग की तरह भटकते फिरते हैं. ये छीना-झपटी चलती रहती हैउहापोह और ऊब की नावों को अपने सिर पर ढो कर हम नदी तर जाना चाहते हैं. आत्मकेंद्रिता बढ़ती है, विखंडन होता है.कविता हमें इस उचाट जिन्दगी से बचाती है. ऐसी शरण्या है कविता, जहाँ आपको सुकून के पल मिलते हैं. अपनी आवाज़ को जगह मिलती है. अंतर्मुखी होकर आप खुद से संवाद करते हैं. ये भी तो जरूरी है न. गृहस्थी भी हो..परिवार भी हो, रिश्ते-नाते हों पर रहे तो कुछ इस तरह जैसे शब्दों में कविता. संबंधों की आंच पर ईख पके तो गुड़ की डलियाँ बनें. नन्द जी में ये मिठास स्वभावगत है तो कविता में ये मुस्कान की तरह आ गई है.सहज प्रीतिकर अनुभव सोते की तरह बह चले हैं...अनकही हामी के पुश्तैनी रिश्तों को देखता कवि आयास पीढ़ियों के पानी में बहता जाता है-

"इस सनातन सृष्टि की
उत्पत्ति से ही जुड़ा है मेरा रक्त -सम्बन्ध
अपने आदिम रूप से मुझ तक आती
असंख्य पीढ़ियों का पानी
दौड़ रहा है मेरे ही आकार में" (पीढ़ियों का पानी )
पर कवि की प्रीति ऊर्ध्वगामी है. वह बादलों की तरह ऊपर उठती है और फिर सरस जाती है. इसी कविता में कवि कहते हैं-
"
मेरे ही तो सहोदर हैं
ये दरख्त ये वनस्पतियाँ
मेरी आँखों में तैरते हरियाली के बिम्ब
अनगिनत रंगों में खिलते फूलों के मौसम
अरबों प्रजातियाँ जीवधारियों की
खोजती हैं मुझमें अपने होने की पहचान."

संवेदनाओं का ये कवि कहीं-कहीं खूब भावुक हो उठा है. "माँ की याद"ऐसी ही कविता है. बचपन के बेतरतीब दिनों में माँ की आवाज़ पीछा करती है.आंसुओं से विगलित अपने जीवन में उसे केवल एक ही चिंता है, "वह बचाए रखती थी हमें/उन बुरे दिनों की अदीठ मार से/ कि ज़माने की रफ़्तार में/ छूट नहीं जाए किसी का साथ/ उसकी धुंधली पड़ती दीठ के बाहर!"

शब्दों के सफ़र से:: कुछ खींची तस्वीरें:

कविता के भूगोल की समझ के लिए केवल उसकी संवेदना तक पहुंचना पर्याप्त नहीं. कविता के बरक्स आप उसके शब्दों की अंतर्यात्रा करते हैं. वे मात्र अभिव्यक्ति नहीं हैं..उनमें कहीं विस्फोट है तो कहीं मंथर गति. कभी वे कल्पना के सहारे कविता में अंतरित होते हैं तो कभी तमाम विवरण और घटनाएं उनकी नियति तय कर रही होती हैं. मैं शब्दों को मानव के अवचेतन का हिस्सा भी मानती हूँ:खासकर तब जब आप एक ख़ास दशा में अपना होना देख रहे हैं. अवचेतन स्वप्नों के आवाजाही की विशिष्ट जगह है. यहाँ भारी उथल-पुथल है. बाह्य जीवन के प्रभावों के बिम्ब यहाँ तैर रहे हैं ,जिनसे आपका चेतन सुभिज्ञ  नहीं. अचानक इस मनोजगत में कहीं से विचारों का पत्थर झप से गिरता है और झील आपके लिए खुल जाती है. बाद को वही शांति. ऐसे में शब्द आपकी मदद करते हैं. वे इस तहखाने की अभिव्यक्ति हैं. और अभिव्यक्तियाँ एक तरह का स्थापत्य होती हैं. स्थापत्य में जादू रहता है जो पाठक को खींच कर अन्य जगत में ले जाता हैस्थापत्य विरेचन भी है. कभी केवल मोहविष्ट से आप इसे निरखेंगे तो कभी ये आपको रुलाएगा. जम कर हंसायेगा.

शिल्प अपने तरह की ज्यामिति है. एक ख़ास पैटर्न- जिसमें कलाकार और समय दोनों खूब महत्त्वपूर्ण हैं. देखिये, शब्द एक तरह से सिगमा-5 की तरह काम करते हैं. इनके अपने सिगनल हैं. अपने संकेत..बिलकुल उस तरह जैसे रेडियो एक सुनिश्चित आवृति पर साफ़ सुनाई पड़ता है. ठीक इसी तरह कोई भी विधा अपने संकेतों और पाठक की फ्रीक्वेंसी पर निर्भर भी करती है..इसलिए हम ये बंटवारा करने लगते हैं कि ये साहित्य में शामिल है और ये नहीं. इसके पीछे शिल्पकार का शिल्प ही रहता है.

अब नन्द जी पर. उनकी कविता से गुज़रते हुए राजस्थान का एक ख़ास स्थापत्य आपको आकर्षित करता है. खासकर पश्चिमी राजस्थान की विशिष्ट स्थानिकता. देशज शब्द सायास नहीं आये हैं. वे कवि के चित्त के बहुत करीब हैं. पुस्तक में भूमिका पढ़ते समय एक बात ने पकड़ा-"उदारीकरण की प्रक्रिया में इधर बहुत से बाहरी दबाब अनायास ही बाज़ार में प्रवेश कर गए हैं. यह व्यवसायीकरण जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा करके कहीं अपना पाँव नहीं टिका पाता. इन कम्पनियों को जब अपना उत्पाद आम लोगों तक पहुँचाना होता है,तो वे कोई भारतीय भाषा ही क्या, उन भाषाओँ की सामान्य बोलियों तक जा पहुँचती हैं. यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक-भाषाओँ को अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी है.साहित्य का काम इन्हीं लोगों के मनोबल को बचाए रखना है." तो कई कविताओं में पाया कि कवि की भाषा राजस्थान की मांस-मज्जा का हिस्सा है. वहां खेजड़ी पर कविता का होना अचरज की बात नहीं बल्कि खेजड़ी पेड़ का नाम आते ही एक सजग पाठक के तौर पर आप खेजरली तक पहुँच जाते हैं. अमृता देवी जिक्र न होते हुए भी इस वृक्ष में शामिल रहेंगी. मैंने ख़ास ये महसूस किया. इसका कारण मेरी अपनी जड़ें गहरे तक राजस्थान से जुडी होना हो सकता है. तो ये ख़ास स्थापत्य है, जो हर पाठक को अपने तरह का सुख देता है.कितनी स्थानिक संज्ञाएँ हैं जो कविता में रच बस गई हैं.. बार-बार टीबे आते हैं. बावड़ियाँ हैं.आंधियां हैं. टेराकोटा के घड़े हैं.कुल धारा है, उजाड़ हवेलियाँ हैं..
एक जगह  जब कवि कहते हैं,"उसी निश्छल हंसी में चमकते हैं/ चाँद और सितारे आखी रात तो मैं यकायक चमक जाती हूँ..क्योंकि ये आखा शब्द कितने महीनो के बाद सुना..ठेठ मेरा अपना. कितने ही लोक गीतों में ये शब्द आया होगा. इसी तरह कविता "घर तुम्हारी छाँव में" एक शब्द 'जीवारी' की पुनरावृत्ति हुई है. इन शब्दों का होना मुझे अपने स्थान से जोड़ता है.

कई कविताएँ हैं जहाँ कवि के अवचेतन से आपकी मुलाक़ात होती है और आप ठिठक जाते हैं.. ये तो अपना सा लागे का भाव मुस्करा उठता है."बच्चे के सवाल" एक ऐसी ही कविता है, जो आपको बचपन में ले जायेगी..
कुल मिलाकर कवि का अपना मुहावरा, जैसा की नवल किशोर जी ने कहा है-"उनकी कविताएँ एक विशेष मरुगंधी पहचान देती हैं... मुझे सौ फीसदी सही लगता है.

पुस्तक और कविता पर ::खोज ली पृथ्वी
"तुम्हारे सपनों में बरसता धारोधार
मैं प्यासी धरती का काल मेघ होता

लौटकर आता
रेतीले टीबों के अधबीच
तुम्हारी जागती इच्छा में सपने आंजता" (खोज ली पृथ्वी )
कविता के सत्त्व रूप में उपर्युक्त पंक्तियाँ मैंने बतौर पाठक बचा कर रख ली हैं.
प्रकाशक : विजया बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली – ११००३२, प्रथम संस्करण - २०११
मूल्य - १७५ रूपये

Wednesday, February 20, 2019


स्‍मृति शेष - 
 
हिन्‍दी आलोचना में नामवरसिंह के होने का अर्थ   
* नन्‍द भारद्वाज  
  
 हिन्‍दी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा और समकालीन रचनाशीलता का वस्‍तुपरक विवेचन करने वाले मूर्धन्‍य आलोचक डॉ. नामवरसिंह अब हमारे बीच नहीं रहे। उनके अवसान के साथ ही हिन्‍दी आलोचना का एक शिखर व्‍यक्तित्‍व हमसे सदा के लिए विदा हो गया है, जो निश्‍चय ही एक अपूरणीय क्षति है। साहित्‍य की सैद्धांतिक आलोचना में जहां एक ओर उन्होंने पुराने रसवादी और नव-कलावादी मानदण्डों और मनोवृत्तियों से अनवरत संघर्ष किया, वहीं समकालीन आलोचना में उभरते सरलीकरणों और एकांगीपन का भी खुलकर विरोध किया। एक सहृदय पाठक और प्रबुद्ध रचनाकार के रूप में वे हिन्‍दी के नये रचनाकर्म के प्रति जितने सजग और संवेदनशील रहे हैं, अपने आलोचना-कर्म के प्रति वे उतने ही जवाबदेह।
      लेखक के रूप में नामवरजी की प्रारंभिक पहचान एक कवि के रूप में ही बनी थी - सन् 1940 से 45 के बीच उन्होंने जमकर कविताएं लिखीं और उन कविताओं का एक संग्रह नीम के फूलनाम से प्रकाशन के लिए तैयार भी हुआ, लेकिन किसी कारणवश प्रकाशित नहीं हो सका। इसी दौरान उन्होंने कुछ ललित निबन्ध और आलोचनात्मक लेख लिखने शुरू किये और उस काम में वे इतने रम गये कि जैसे और कुछ करने की फुरसत ही नहीं रह गई। सन् 1951 में उनकी जो पहली किताब प्रकाशित हुई वह थी बक़लम खुद’, जिसमें उनके 17 निबंध संकलित हैं। उसके बाद सन् 1952 से 57 के बीच उनकी छायावाद’,  आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’, ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’, ‘इतिहास और आलोचनाआदि कई किताबें प्रकाशित होकर सामने आईं। ये सभी कृतियां उस जमाने में और बाद के सालों में हिन्दी आलोचना के क्षेत्र में सर्वाधिक चर्चित कृतियां मानी गईं। इसी क्रम में सातवें,  आठवें और नौवें दशक में कहानी नयी कहानी’, ‘कविता के नये प्रतिमान’,  दूसरी परम्परा की खोज औरवाद विवाद संवाद जैसी कृतियों के माध्यम से उन्‍होंने समकालीन साहित्य में ऐसी बहस का सूत्रपात किया, जिसकी अनुगूंज साहित्यिक हलकों में दूर तक सुनी गई।
    साहित्य के गंभीर अध्येता और अग्रणी आलोचक के साथ ही नामवरजी की शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। एक शिक्षक के रूप में उन्होंने देश की अनेक बड़ी शिक्षण संस्थाओं जैसे काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय, सागर विश्‍वविद्यालय,  जोधपुर विश्‍व-विद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्‍व-विद्यालय में जहां वर्षों हिन्‍दी भाषा और साहित्य के गंभीर पठन-पाठन में विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया, वहीं साहित्य की शिक्षण-प्रक्रिया और उसके पाठ्यक्रम को अद्यतन रूप देने में निर्णायक भूमिका अदा की है।
    यही नहीं, आजादी के बाद के इन सालों में साहित्‍य–संस्‍कृति के साथ राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली राजनीतिक उथल-पुथल, इस देश के सामाजिक परिवेश और उसमें राष्ट्र-नायकों की भूमिका, आर्थिक विकास की प्रक्रिया, भूमंडलीकरण, उपभोक्तावादी संस्कृति के प्रसार और जन-संचार की बदलती भूमिका पर भी नामवरजी अपनी संपादकीय टिप्पणियों, लेखों और व्याख्यानों के माध्यम से वैचारिक बहस को बढ़ावा देते रहे हैं – वे उन खतरों से भी बराबर आगाह करते रहे, जो भारत जैसे विकासशील देश और तीसरी दुनिया के देशों के सामने आज भी चुनौती बनकर खड़े हैं।
      साहित्य-परम्परा के पुनर्मूल्यांकन, नयी इतिहास-दृष्टि के निर्माण और समकालीन रचना-कर्म (नयी कविता और नयी कहानी) पर उनके नये विवेचन चर्चित और बहस-तलब रहे ही, उनके व्‍याख्‍यानों और साहित्य-संगोष्ठियों में दिये गये बयानों पर अक्‍सर हिन्दी जगत् में व्यापक प्रतिक्रिया हुई है। हिन्दी में वे अकेले ऐसे आलोचक-वक्ता हैं, जिनके वक्तव्य कई बार लिखे हुए शब्द की अपेक्षा कहीं बड़ी बहस का कारण बने हैं। यह भी एक तथ्य है कि आधुनिक काल में हिन्दी में जो भी महत्‍वपूर्ण रचनाकर्म सामने आया, उस पर नामवर जी की राय सबसे अधिक संजीदा, सामयिक और गौर-तलब मानी गई।
      साहित्य-कला-संस्कृति और जन-संचार पर पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहने वाले लेखकों में सक्रिय सुधीश पचौरी अपने आरंभिक दौर में नामवर सिंह की आलोचना-पद्धति पर विरोध के स्वर में बहुत-कुछ लिखते रहे हैं। उन्‍होंने अपने को उनसे अधिक क्रांतिकारी और सजग लेखक मानते हुए उन पर संशोधनवादी, पलायनवादी और वर्ग-सहयोगवादी होते जाने के आक्षेपों को भी खूब हवा दी, लेकिन अपने इसी मुखर अहंभाव के चलते जब मार्क्सवादी विचार और संगठन से खुद उनकी महत्वाकांक्षाएं टकराने लगीं, तो वे एकाएक उससे भी अलग जा खड़े हुए और पूंजीवादी व्यावसायिक पत्रिकाओं में अपनी टिप्‍पणियों के माध्‍यम से उसी जनवादी सोच और प्रगतिशील परम्परा की जड़ें खोदने में जुट गये।
      कालान्‍तर में प्रगतिशीलता औैर जनवादी सोच को एकांगी, सीमित और समस्याग्रस्त मानने वाले यही सुधीश पचौरी इधर उत्तर आधुनिकतावादी लेखकों के संसर्ग में तर्क-वितर्क और अराजक भाषा के ऐसे-ऐसे खेल सीख गये कि अब साहित्य और संस्कृति की दुनिया उनके लिए एक तरह का वाग्-विलास (डिस्कोर्स) होकर रह गई है, जिसे उन्होंने हिन्दी में विमर्श का पर्याय बनाकर प्रस्तुत किया है। उत्तर-आधुनिकतावाद की पैरवी के जुनून में अपने इन्हीं विमर्शों को वे अब किसी के भी विमर्श बनाकर पेश कर सकते हैं।
         सुधीश पचौरी  ने नामवरसिंह के अड़सठवें जन्म-दिवस पर एक ग्रंथ संपादित किया था ‘नामवर के विमर्श’, जो प्रकारान्तर से उनकी उसी बदली हुई मानसिकता का परिचय देता है। व्यावसायिक वृत्ति वाले लेखक ऐसे अवसरों पर अक्सर अभिनंदन ग्रंथ की आयोजना कर लिया करते हैं, लेकिन सुधीश पचौरी चूंकि उत्‍तर-आधुनिक हो चुके थे, तो यह आयोजन वैसा अनुष्ठान बनने से बच गया। संकलित सामग्री के अपने महत्व के कारण उनके चाहे-अनचाहे यह एक ऐसा संग्रह अवश्‍य बन गया, जो समकालीन हिन्दी-आलोचना की केन्द्रीय चिन्ताओं और नामवरसिंह के अवदान पर गंभीरता से विचार करने का एक अवसर अवश्‍य प्रदान करता है।
      इस ग्रंथ के प्रकाशन से पूर्व भी पहल’, पूर्वग्रह’, ‘दस्तावेज’, ‘कहानी’,  आदि पत्रिकाओं ने नामवर जी पर अलग-थलग अवसरों पर कुछ महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित की थी, जो पर्याप्‍त चर्चित रही, साथ ही रणधीर सिन्हा, नंदकिशोर नवल और डॉ. रामबक्ष ने अपने आलोचना-ग्रंथों में नामवरजी की आलोचना पद्धति और उनके अवदान पर काफी विस्तार से प्रकाश डाला। इन्हीं आलोचना ग्रंथों और पत्रिकाओं के विशेषांकों की काफी सामग्री यहां पुनः प्रस्तुत की गई, साथ ही पहले और दूसरे खंड में कुछ ऐसे भी आलेख पहली बार प्रकाशित हुए , जो नामवरसिंह के व्यक्तित्व और आलोचना-कर्म के कई अनछुए पक्षों को उजागर करते हैं। इस ग्रंथ के पहले खण्ड में कुछ संस्मरणात्मक आलेख वाकई लाजवाब हैं। लेकिन इसी दूसरे खण्‍ड विमर्श में कुछ नकारात्मक स्वर वाले आलेख भी शामिल किये गये हैं, जिनके चयन का कोई औचित्य स्पष्ट नहीं किया गया, न सम्पादक ने ही इन विवादी स्वर वाले आलेखों से उभरने वाले निष्कर्षों पर अपनी कोई राय-टिप्पणी प्रस्तुत की। वे चाहते तो ऐसी और सामग्री भी जुटा सकते थे, क्योंकि नामवरसिंह से असहमति रखने वाले लेखकों की तादाद भी कुछ छोटी नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि चौथे खण्ड में स्वयं संपादक सुधीश पचौरी ने नामवरजी से असहमति रखने वाले हिन्दी के दो वरिष्ठ लेखकों अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव के साथ काफी विस्तार से की गई एक महत्‍वपूर्ण बातचीत भी इस संग्रह में शामिल की। उस बातचीत में अपने प्रश्‍नों के जरिए स्‍वयं सुधीश पचौरी नामवरजी के विरोध में उन्हें उकसाते हुए बहुत से मसलों पर ले गये। अशोक वाजपेयी यों भी इस साहित्य-समय के सधे हुए खिलाड़ी हैं, इसलिए उन्हें प्रश्‍नों में घेर लेना इतना आसान नहीं होता, लेकिन राजेन्द्र यादव के अन्तर्विरोधी बयानों की हालत तो वाकई देखने लायक है।
      कथा-आलोचना के क्षेत्र में नामवर जी के समीक्षा-कर्म को लेकर हिन्दी कथाकारों का एक वर्ग उनसे काफी अप्रसन्न रहा है - उनके समकालीनों में कमलेश्‍वर, राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश तो उनके कट्टर विरोधी थे ही, बाद की पीढ़ी के कथा-लेखकों को भी उनसे कुछ गंभीर शिकायतें रही हैं। नामवर जी की आलोचना-दृष्टि में कुछ बारीक असंगतियां देखने वाले आलोचक डॉ. मैनेजर पांडेय यह मानते हैं कि उन्होंने कहानी समीक्षा के विकास की जो सार्थक शुरूआत की थी, उसमें नवीनता और ताज़गी तो थी, कहानी की तात्विक आलोचना या शास्त्रीय समीक्षा से अलग हटकर वस्तुतात्विक विवेचन, संरचनात्मक विश्‍लेषण और कलात्मक मूल्यांकन का प्रयास भी किया, लेकिन उसमें जिस सहयोगी प्रयास और रचना-आलोचना संवाद की बात कही गई थी, उसका अंत कटु विवाद में ही हुआ।
      साहित्य, संस्कृति और राजनीति के अन्तर्संबंधों पर विचार करते हुए नामवर जी ने लिखा था - ‘‘राजनीतिक परिवर्तन को लक्ष्य में रखते हुए भी एक लेखक के नाते वह अपनी रचनाओं के द्वारा सांस्कृतिक परिवर्तन की दिशा में सक्रिय होता है, क्योंकि सांस्कृतिक परिवर्तन के बिना राजनीतिक परिवर्तन कठिन है।’’ इस पर टिप्पणी करते हुए डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने एक सैद्धान्तिक आशंका व्यक्त की थी कि सांस्कृतिक परिवर्तन के बगैर राजनीतिक परिवर्तन को कठिन कहना क्या प्रकारान्तर से बुनियादी बदलाव की प्रक्रिया में ऊपरी ढांचे को आधार से अधिक महत्व देना नहीं है ? पर यही बात जब फ्रेडिरिक एंगेल्स की तरफ से आती है तब शायद पाण्डेय जी को उस पर आशंका नहीं होती।
    नामवर जी की इस आलोचना के पीछे दो कारण तो स्पष्ट नज़र आते हैं। पहला कारण है, नामवरसिंह पर केन्द्रित इस तरह की विवादी चर्चा के बहाने अपने को सम-सामयिक साहित्यिक परिदृश्‍य में प्रासंगिक बनाये रखने का उपक्रम और दूसरा, अपने अनुकूल विमर्शों की आड़ में नामवरजी को उत्तर-आधुनिकतावाद के खाते में खपा लेने की होशियारी। सुधीश पचौरी को डॉ. नामवर सिंह का आलेाचना-कर्म आज भी एक तरह से लीलाओं का दिलचस्प पाठ ही नज़र आता है और उनकी यह स्वीकारोक्ति भी दिलचस्प है कि चूंकि ये मेरे पतन के दिन थे, इसलिए भी एक बड़े पतित से हमदर्दी होने लगी।" (पृष्ठ-15) देखने की बात यह थी कि हिन्दी के व्यापक पाठक समुदाय से यह छोटा पतित अब तक कितनी हमदर्दी बटोर पाया। वैसे सुधीश पचौरी की उत्तर-आधुनिकतावादी सोच से उपजे एक अहम सवाल का उत्तर नामवरजी ने अपने साक्षात्कार में काफी नप़े-तुले शब्दों में दे दिया था, बशर्ते कि सुधीश पचौरी और उत्तर-आधुनिकतावादी इस पर गौर करना पसंद करते। वह सवाल-जवाब कुछ यों था -
सुधीश पचौरी: जिसे आप बोलचाल, संवाद कहते हैं उसे हम डिस्कोर्स या विमर्श समझें और फूकोल्डियन डिस्कोर्स समझें, तो आरोप तो मैं नही कहूंगा, मगर मेरे मन में एक प्रश्‍न पैदा होता है कि जबसे आपने बोलना ज्यादा शुरू किया है, तब से साहित्य में राजनीति का विमर्श तो आप कर ही रहे हैं, लेकिन अब आप एक सत्ता का डिस्कोर्स भी कर रहे हैं। यह जो सत्ता का विमर्श  आप कर रहे हैं तो साहित्य के अनुशासन के हेतु आप कर रहे हैं। आप इसमें जो साहित्य का अनुशासन हो रहा है, वह क्या बन रहा है?
नामवर सिंह: फूको का नाम लिया आपने। ज्ञान मात्र को उसने सत्ता के पर्याय के रूप में देखा है। यद्यपि मैं उस पूरे दर्शन को मानता नहीं हूं। सारे संघर्ष को सत्ता का संघर्ष ही मान लिया जाए तो सत्यनाम की चीज़ तो रह नहीं जाएगी। ये हो जायेगा कि आज जो दमन करने वाले लोग हैं, जिनके हाथ में सत्ता है वो और दलित जो सत्ता में भागीदारी चाहते हैं, इसलिए दोनों समान रूप से दोषी होंगे। इसलिए साहित्य में वह कौन-सी सत्ता है, जिसको लेने के लिए, हथियाने के लिए संघर्ष चल रहा है, मैं नहीं जानता। मैं तो इतना ही जानता हूं, मेरी समझ में एक साहित्यकार के नाते जो सचहै उस सच का यदि गला घोंटा जा रहा हो, दबाया जा रहा हो, परदा डाला जा रहा हो तो हम कोशिश करते हैं कि कम से कम उसकी जितनी रक्षा की जा सके, की जाय। चूंकि मैं आलोचना ही लिखता हूं तो आलोचना में यही मेरा प्रयास होता है। (पृष्ठ-492-493)
      जाहिर था कि फूकोवादी डिस्कोर्स चलाने वालों को यह शालीन और सटीक उत्तर रास नहीं आया और आगे कभी इसकी कोई चर्चा चलाना भी उन्‍होंने कम ही पसन्द किया।  उस आयोजन में इतना जरूर हुआ कि संपादक सुधीश पचौरी अपने पसन्दीदा चयन - अशोक वाजपेयी, राजेन्द्र यादव, गोविन्द द्विवेदी, कृष्णगोपाल वर्मा  और ललित कार्तिकेय की आधी-अधूरी टिप्पणियों के माध्यम से अपने उद्देश्‍य को एक हद तक पूरा कर पाने में कामयाब रहे। उन्होंने इस अर्थ में ईमानदारी अवश्‍य बरती है कि अन्य समकालीनों से बातचीत करने के साथ स्वयं नामवर जी से भी साक्षात्कार आयोजित कर बहुत-सी जरूरी बातों का खुलासा उन्‍हीं से ले लिया, वे स्‍वयं उसे मानें न मानें, ये उनका अपना मामला था। इसी आयोजन के तीसरे खण्ड में प्रस्तुत नामवर जी के चुनिन्दा आलोचनात्मक निबंधों और चौथे खण्ड में उनके विस्तृत साक्षात्कार के बाद सुधीश के संपादकीय में नामवरसिंह के जिस नये पाठ की आवश्‍यकता पर बल दिया गया था, वह बात स्वतः ही अप्रासंगिक हो गई।
      नामवरजी की कई बातों से असहमति रखने के बावजूद मैनेजर पाण्डेय यह अवश्‍य मानते रहे हैं कि उनके सम्पूर्ण आलोचनात्मक चिन्तन और व्यवहार में समकालीन रचनाशील प्रवृत्तियों की गहरी पहचान मिलती है, उसकी उपलब्धियों और कमजोरियों का विश्‍लेषण करते हुए ही समकालीन साहित्य में निहित प्रतिमानों की खोज का प्रयत्न भी संभव हो पाता है। इस अर्थ में डॉ. नामवर सिंह हिन्दी आलोचना के एक ऐसे अनिवार्य संदर्भ के रूप में उभर कर सामने आते हैं, जिन्हें छोड़कर, हिन्दी आलोचना पर शायद ही कोई संवाद संभव हो सके।
      मुझे लगता है, अलग अलग समय पर अलग अलग लोगों द्वारा आलोचक नामवर सिंह पर होते रहने वाले ये आक्रमण अकारण नहीं थे, और न इनके पीछे साहित्यिक मूल्‍यांकन का कोर्इ वस्‍तुपरक आग्रह ही। उनके अब तक के आलोचना-कर्म और आलोचना-प्रक्रिया पर संजीदगी से बात हो, उनके नजरिये और तरीके से सहमति या असहमति हो, इसमें भला किसी को क्‍यों ऐतराज होगा? लेकिन उनकी जीवन-शैली, शैक्षणिक कार्य-क्षेत्र और सार्वजनिक जीवन को लेकर अपने निजी राग-द्वेष रखने वाले लोग जब उनकी आलोचना-दृष्टि और उनकी आलोचनात्‍मक कृतियों पर बात करते हैं और उन पर अपने मनोगत निष्‍कर्ष आरोपित करते हैं, तो एक अलग तरह की अप्रिय बहस सिर उठाने लगती है। ऐसे लोग दरअसल उनके आलोचना-कर्म पर नहीं, अपने ही किन्‍हीं वैयक्तिक राग-द्वेष पर बात करते हुए उसे सिद्धान्‍त या आलोचना का जामा पहनाने का असफल प्रयास कर रहे होते हैं और यहीं आकर यह उत्‍तर-आधुनिकतावादी विमर्श अपनी सारी अर्थवत्‍ता खो देता है, ऐसे लोग समकालीन हिन्‍दी आलोचना में नामवरसिंह के होने का अर्थ प्राय: कम ही स्‍वीकार कर पाते हैं।  
-71/247, मध्‍यम मार्ग
मानसरोवर, जयपुर – 302020
nandbhardwaj@gmail.com