Friday, March 2, 2018




साहित्‍य सामाजिक बदलाव का महत्‍वपूर्ण माध्‍यम है : नंद भारद्वाज  

(हिन्‍दी और राजस्‍थानी के वरिष्‍ठ साहित्‍यकार नंद भारद्वाज से रेवतीरमण शर्मा की बातचीत) 

रेवतीरमण शर्मा - आप मूलत: पश्चिमी राजस्‍थान के ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं, जहां आपका बचपन बीता और प्रारंभिक शिक्षा संपन्‍न हुई, लेकिन हाई स्‍कूल, उच्‍च शिक्षा और सार्वजनिक सेवा के साथ साहित्‍य-लेखन का कार्य आपने बड़े शहरों में रहकर संपन्‍न किया, इसके बावजूद आपकी रचनाओं में ग्रामीण जीवन और परिवेश उस शहरी जीवन की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से व्‍यक्‍त हुआ है, इसकी क्‍या वजह मानते हैं आप?
नंद भारद्वाज – रेवती बाबू, ये बात सही है कि मैं मूलत: गांव से आता हूं, मेरा जन्‍म बाड़मेर जिले के एक छोटे-से गांव माडपुरा गांव में हुआ। मेरा पूरा बचपन यहीं व्‍यतीत हुआ, मेरी प्रारंभिक शिक्षा भी इसी गांव के निकट एक बड़े कस्‍बे कवास में सम्‍पन्‍न हुई, जहां ग्राम पंचायत थी, स्‍कूल थी और कुछ बुनियादी सुविधाएं भी थीं, जहां से मैंने आठवें दर्जे तक शिक्षा प्राप्‍त की। उस क्षेत्र के ज्‍यादातर लोग ढाणियों में बसते हैं, गांव में कम ही लोग रहना पसंद करते हैं, यही कारण है कि उन दिनों वे बहुत-सी बुनियादी सुविधाओं से वंचित रह जाते थे। चूंकि मैं एक बड़े कस्‍बे से जुड़ा रहा, तो मेरी प्रारंभिक शिक्षा ठीक से हो गई, हालांकि कुछ कठिनाइयां भी रहीं, घर के बड़े लोग पिताजी भाई वगैरह ज्‍यादा  इच्‍छुक नहीं थे कि मैं आठवें दर्जे के बाद अपनी शिक्षा जारी रखूं। मुझे शहर भेजकर पढ़ाई का खर्चा वहन करने की गुंजाइश भी नहीं थी उनके पास। लेकिन मेरी इच्‍छा थी आगे पढ़ने की, मेरे कुछ शिक्षकों ने भी बराबर उत्‍साहित किया कि मै पढ़ाई जारी रखूं।  मैंने आठवां दर्जा फर्स्‍ट डिजीजन, फर्स्‍ट पोजीशन से पास किया था। अपनी उस प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही मैं पढ़ाई के अलावा बहुत सी गतिविधियों में भाग लेता था। पिताजी के संपर्क में ही संगीत में गहरी रुचि पैदा हुई, उनके साथ रात्रि जागरणों में भाग लेता था और उन्‍हीं के मुख से रामायण, महाभारत, गीता और बहुत सी पौराणिक कथाओं से परिचित हुआ। कबीर, तुलसी, मीरा के भजन भी जाने समझे, उन्‍हें खूब गया भी। इस तरह पौराणिक साहित्‍य और काव्‍य से मेरा गहरा रिश्‍ता शुरू से ही बन गया, जो आगे की पढ़ाई के दौरान भी जारी रहा। असल में पिताजी का जिस तरह ज्‍योतिष और पौराणिक साहित्‍य के प्रति रुझान था और उस वाचिक परंपरा की बहुत सी बातें जिस तरह उन्‍होंने मुझे बताई, इससे अपनी पढ़ाई के दौरान मेरा दो तरह से अच्‍छा शिक्षण हुआ – एक तो पिताजी के माध्‍यम से उस वाचिक परंपरा का ज्ञान और दूसरी स्‍कूली पाठ्यक्रम के जरिए नये आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की व्‍यवस्थित शिक्षा। प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर जब मै हाई स्‍कूल की पढ़ाई के लिए पास के शहर बाड़मेर आया तो फिर आगे कॉलेज शिक्षा का भी संयोग बन गया। मेरी हायर सैकेण्‍डरी पूरी होते ही उसी साल वहां कॉलेज खुल गया तो मेरा बी ए करना आसान हो गया। स्‍कूल और कॉलेज में संयोग से शिक्षक भी अच्‍छे मिले। संगीत और साहित्‍य के प्रति मेरे रुझान देखते हुए शिक्षकों ने मुझे खूब बढ़ावा दिया। शायद उसी की वजह से साहित्‍य और लेखन के प्रति मुझमें वह  रुझान पैदा हुआ। शायद उसी रुझान की वजह से मुझमें ग्रामीण भावबोध और संस्‍कार सहज रूप से विकसित हो पाए – बाद में जब मैं कॉलेज की शिक्षा पूरी कर उच्‍च शिक्षा के लिए जयपुर आ गया तो यहां अखबारों और रेडियो के संपर्क में भी आया। अखबारों और पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छपने लगी थीं, तो इस तरह धीरे-धीरे लेखन के साथ जुड़ाव गहरा होता गया। इसी प्रक्रिया में शहरी जीवन-शैली से संपर्क भी बढ़ता गया और उसी का असर शायद रचनाओं में भी आने लगा था। शहर और गांव दोनों के वातावरण का असर तो मुझ पर रहा ही, लेकिन शायद गांव का असर इसलिए भी ज्‍यादा है कि मैं मूलत: ग्रामीण बोध का व्‍यक्ति हूं। अपने बचपन को मैं कभी नहीं भूलता, क्‍योंकि उसका असर ज्‍यादा गहरा रहा है। मैंने गांव के लोगों को ज्‍यादा तकलीफ वाला जीवन जीते देखा है और वही अनुभव मुझे लिखने के लिए प्रेरित भी करते रहे हैं।
रेवतीरमण - आपका कहना है कि मेरा मन हिन्‍दी से ज्‍यादा राजस्‍थानी में रमता है, अपनी मातृभाषा के प्रति लेखक का लगाव स्‍वाभाविक भी है। राजस्‍थानी भाषा की संवैधानिक मान्‍यता के मसले से भी आप जुड़े रहे हैं, मेरी जिज्ञासा है कि भाषा और संस्‍कृति के विकास में संवैधानिक मान्यता के सवाल को आप कितना महत्‍वपूर्ण मानते है?
नंद - जब मैं अपनी उच्‍च शिक्षा के दौरान हिन्‍दी और राजस्‍थानी दोनों में लिखने लगा, तो उसके पीछे एक दृष्टिकोण यह था कि उस आंचलिक परिवेश में रहने की वजह से उस भाषा के मैं ज्‍यादा नजदीक रहा हूं, निश्‍चय ही एक भावनात्‍मक लगाव उस भाषा और संस्‍कृति से मुझे आरंभ से ही रहा है, लेकिन मेरी औपचारिक शिक्षा हिन्‍दी माध्‍यम से ही हुई है‍। हमने उत्‍साह से हिन्‍दी सीखी है और इस कारण हिन्‍दी मेरे लिए उतनी ही सहज हो गई, जितनी कि राजस्‍थानी सहज है। लेकिन उस शिक्षा के दौरान ही मुझमें यह समझ भी विकसित हुई कि अपनी मातृभाषा किसी भी व्‍यक्ति की पहचान और उसके विकास में कितनी अहम भूमिका निभाती है, तब एक लेखक के रूप में मुझे लगा कि अपनी मातृभाषा राजस्‍थानी की मान्‍यता और उसके विकास के लिए हमें संजीदगी से प्रयत्‍न करने चाहिए। जिस भाषा का हजार साल का साहित्‍य है, जीवन के हर क्षेत्र में उसका प्रभावशाली व्‍यवहार रहा है, यहां तक कि हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में उसके आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल की पहचान में राजस्‍थानी साहित्‍य का बहुत बड़ा योगदान है - आप पृथ्‍वीराज रासो, ढोला मारू रा दूहा, मीरा के पद या सूर्यमल्‍ल मीसण की वीर सतसई के बिना कैसे साहित्‍य इतिहास की कल्‍पना करते हैं? यानी उन्‍नीसवीं शताब्‍दी तक जो साहित्‍य बराबर महत्‍वपूर्ण बना रहा, वह आधुनिक काल शुरू होते ही एकाएक महत्‍वहीन कैसे हो गया? तब हमें लगता है कि हम जिस बड़ी परम्‍परा से जुड़े रहे हैं, उससे इस तरह काटकर अलग कर देना न्‍यायसंगत नहीं है। अगर आजाद भारत में अन्‍य भारतीय भाषाओं के साथ ऐसा बरताव नहीं हुआ, तो राजस्‍थानी के साथ ऐसा क्‍यों हुआ? इसलिए हम चाहते हैं कि हमारी भाषा के साथ न्‍याय हो और उसे संवै‍धानिक भाषा के रूप में महत्‍व दिया जाना चाहिए।
रेवतीरमण - मैं आपसे साहित्‍य रचना के सरोकारों के बारे में बात करना चाहता हूं – आप साहित्‍य-कर्म को लेकर क्‍या सोचते हैं, हमारी शास्‍त्रीय परम्‍परा में साहित्‍य के जो प्रयोजन बताए गये है, वे किस तरह आज के जटिल समय में कविता या कहानी में सिद्ध होते दीखते हैं?
नंद – मैं अमूमन यह बात कहता हूं कि साहित्‍य-कर्म मेरे जीने का तरीका है और इसे मैं किसी विशिष्‍ट कर्म की तरह नहीं करता, जैसे जीवन के अन्‍य कार्य है, – जिस तरह किसान खेती करता है, कारीगर कोई उपकरण बनाता है या एक शिक्षक शिक्षण का कार्य करता है, उसी तरह साहित्‍य-कर्म मेरा अपना कार्य है। एक आम धारणा यह भी है कि ‘साहित्‍य समाज का दर्पण है’, जैसा समाज होगा, वही तो साहित्‍य में प्रतिबिम्बित होगा। मैं इस धारणा को इस तरह नहीं ग्रहण कर पाता और न साहित्‍य को दर्पण ही मानता। मैं साहित्‍य को सामाजिक बदलाव के एक महत्‍वपूर्ण माध्‍यम रूप में देखता हूं और लेखक को एक सजग व्‍यक्ति के रूप में। लेखक के रूप में वह अपने समय और समूह के एक प्रति‍निधि के रूप में काम करता है, उसकी बात केवल अपनी अकेले की बात नहीं होती, उसमें समान सोच और समान अनुभव वाले बहुत-से लोगों का साझा होता है। हमारी शास्‍त्रीय परम्‍परा में साहित्‍य के प्रयोजन के रूप में यश-अर्थ-काम-मोक्ष की धारणा को  अक्‍सर दोहराया जाता है, वह धारणा आज प्रासंगिक नहीं रह गई हैं। साहित्‍य एक ओर जहां हमारे आत्मिक संवाद का माध्‍यम है, वहीं दूसरी ओर वह सामाजिक रूपान्‍तरण की प्रक्रिया में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाने वाला एक विश्‍वसनीय माध्‍यम भी है। उस माध्‍यम से लेखक अपने श्रोता-दर्शक-पाठक को संबोधित करता है, ऐसी अवस्‍था में यह स्‍वाभाविक है कि लेखक की बात उसके व्‍यापक हित से जुड़ी हो। लोक-संवदेना या लोक-संस्‍कार से बड़ा कुछ नहीं होता। इसलिए लेखक उस बड़े मानव-समुदाय में एक जिम्‍मेदार प्रतिनि‍धि के तौर पर सक्रिय रहें, यही साहित्‍य का व्‍यापक सामाजिक सरोकार है, इससे भिन्‍न किसी सरोकार या प्रयोजन की मैं कल्‍पना नहीं करता।
रेवतीरमण -  आप अच्‍छे कथाकार भी हैं। आपकी कई कहानियां मैंने पढ़ी हैं और पसंद भी हैं, लेकिन हाल के कुछ कथाकारों की कहानी से कहीं कथा ही गायब है और जहां कथा चलती है, वहां प्रेमचंद की कहानियों जैसा बतकहीपन लुप्‍त हुआ है, इसे किस तरह लिया जाए?  
नंद - दरअसल हमारी जो कथा-परम्‍परा है, वह बहुत बड़ी है, वह संस्‍कृत साहित्‍य से आरंभ होती है, और प्राकृत, अपभ्रंश तथा मध्‍यकाल से गुजरती हुई आज तक पहुंचती है। इस तरह ज्ञान की जो बड़ी विरासत है, वह कथा के माध्‍यम से संप्रेषित हुई और सुरक्षित भी रही। कहने का आशय यह है कि हमारी कथा परंपरा जिस तरह से विकसित हुई है, उस प्रक्रिया में आधुनिक युग तक आते-आते वह काफी बदल गई है, उसका बेहतर विकास हुआ है। उसके कथ्‍य और शिल्‍प के साथ आधारभूत साधनों का भी विकास हुआ, मुद्रण-प्रक्रिया विकसित होने के साथ जब प्रकाशन की सुविधाएं और तकनीक भी विकसित हुई तो वही कथा वाचिक से लिखित रूप में सामने आ गई। कथा का एक निश्चित पाठ बन गया, उसमें लेखक के लिए अपनी कल्‍पना-शक्ति और रचना-कौशल के प्रयोग की व्‍यापक संभावनाएं निकल आईं। प्रेमचंद और उनके कुछ समय बाद तक उस पुरानी किस्‍सागोई या बतकहीपन का निर्वाह जरूर हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उसमें एक पक्ष और जुड़ा गया, जिसे मैं महत्‍वपूर्ण परिवर्तन मानता हूं, वह पक्ष है मनुष्‍य के भीतर के मन को जानने का पक्ष – उसके अंतर्द्वंद्व को, उसके भीतर की जद्दोजहद को जानने का पक्ष। ऐसे में कथानक या घटनाएं प्रमुख नही रह जातीं, यद्यपि उनका महत्‍व अपनी जगह अवश्‍य है, वह अंत:सूत्र की तरह कथा को बांधे तो अवश्‍य रखता है, लेकिन कथा के चरित्रों को विकसित होने और प्रभावी होने का अवसर इस बदली हुई तकनीक में ही संभव हो पाता है‍। हालांकि इसका नकारात्‍मक असर भी पड़ा है – खासकर उत्‍तर आधुनिकता के नाम पर जिस तरह की कहानियां लिखी गई हैं, उसमें बहुत से अनर्गल प्रयोग भी हुए हैं। निश्‍चय ही इसका पाठक वर्ग पर विपरीत प्रभाव पड़ा है और लेखक और पाठक के बीच दूरी भी बढ़ी है। इधर जिन संजीदा कथाकारों ने अपने चरित्रों के भीतर उतर कर उनके अंतर्मन को समझने का प्रयत्‍न किया है, उन मानवीय मूल्‍यों को नया स्‍वरूप देने का प्रयास किया है, जो मनुष्‍य की स्‍वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्‍याय जैसे लोकतांत्रिक मूल्‍यों को महत्‍व देने की प्रक्रिया है, विशेष रूप से ऐसी कहानियों के माध्‍यम से जो सशक्‍त नारी चरित्र उभर कर सामने आ रहे  हैं, और उसमें स्‍त्री कथाकारों की सक्रियता और भूमिका को मैं महत्‍वपूर्ण मानता हूं, ये बदलाव कथा के क्षेत्र में निश्‍चय ही महत्‍वपूर्ण है। 
रेवतीरमण -  आपकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि आपके जो कथा-पात्र हैं, वे बहुत जीवंत हैं, मेरी जिज्ञासा यह है कि ये पात्र आपने अपने वास्‍तविक जीवन से लिये हैं याकि कथा-वस्‍तु की संरचना के अनुरूप कल्पित हैं। अपने पात्रों के बारे में कुछ बताएं।  
नंद - रेवती जी, मैं यह मानता हूं कि जो लेखक का अपना जीवन अनुभव है, जिनके बीच रहकर यह अनुभव अर्जित करता है, उन्‍हीं के बीच से वह पात्रों का चयन करता है, या कभी-कभी अपने स्‍वयं के जीवन-अनुभव भी लिखने का आधार बनते हैं। शरच्‍चन्‍द्र को पढ़ते हैं तो लगता है कि जैसे शरत अपने को व्‍यक्‍त कर रहे हैं, लेकिन लेखक जब लिखता है और मुक्तिबोध ने जिस प्रक्रिया की ओर इशारा किया है, कि रचना के प्रारंभ में कोई एक चरित्र या आईडिया से बेशक आरंभ करता हो, लेकिन ज्‍यों ही वह आगे बढ़ता है तो वह प्रक्रिया सामान्‍यीकरण की ओर बढ़ने लगती है, सामान्‍यीकरण की इस प्रक्रिया में उसी अनुभव या चरित्र को गहरा बनाने वाले बहुत-से तत्‍व घुलमिल जाते हैं, और एक जीवंत चरित्र का निर्माण करते हैं और इस तरह यथार्थ और कल्‍पना के सहमेल से ही एक मुकम्‍मल रचना आकार लेती है। चरित्र बेशक किसी रचनाकार की सृजनशील कल्‍पना से निर्मित हों, लेकिन हर कल्‍पना या आईडिया का अपना एक यथार्थ अवश्‍य होता है। किसी भी लेखक के रचना-संसार में हम जितने भी चरित्र या कथा-पात्र देखते हैं, वे आते उसी के अनुभव-जगत से ही निकलकर हैं।
रेवतीरमण -  संस्‍थागत या राज्‍याधीन पुरस्‍कार लेखक को अति-उत्‍साही बनाते हैं, इससे श्रेष्‍ठ साहित्‍य के उत्‍खनन में रुकावट आती है और एक अवांछित लेखकीय प्रतिस्‍पर्धा और जोड़-तोड़ की राजनीति बन जाती है। हीरा है तो अंधेरे में भी चमकता है, क्‍या रामविलास शर्मा हमारे सम्‍मानित मार्गदर्शक नहीं बन पा रहे हैं?
नंद - आपका सवाल मूलत: लेखकों को दिये जाने वाले पुरस्‍कारों, पुरस्‍कार-प्रक्रिया और साहित्‍य जगत में उन पर होने वाली चर्चा से जुड़ा हुआ है। इधर यह सवाल कई इतर कारणों से भी उभर आया है, इस पर लोगों की अलग-अलग राय है। मैं व्‍यक्तिगत रूप से पुरस्‍कारों को लेकर बहुत उत्‍साहित नहीं हूं, लेकिन बहुत गौण या गैर-महत्‍वपूर्ण भी नहीं मानता, इसलिए कि‍ जीवन के तमाम क्षेत्रों में अच्‍छे काम को मान्‍यता देने या बढ़ावा देने के लिए प्रतिभाओं को पुरस्‍कृत या सम्‍मानित करने की जो प्रक्रिया है, वह इसलिए होती है कि एक अच्‍छे दृष्‍टान्‍त के रूप में वह सामने रहे। इसमें सब से महत्‍वपूर्ण बात यही है कि यह प्रक्रिया निष्‍पक्ष रहे, उस पर किसी तरह का दबाव न हो, कोई उसे मैनेज न करे, इतर कारण उसमें महत्‍वपूर्ण न हो जाएं और वह इतनी वस्‍तुपरक और पारदर्शी भी रहे कि उस पर किसी को एतराज उठाने की गुंजाइश न रहे। गुणवत्‍ता को जितना महत्‍व मिलेगा, और गुणवत्‍ता के आधार पर ही जिसे पुरस्‍कार देने का निर्णय होगा तो उसका महत्‍व भी बना रहेगा। लेकिन दुर्भाग्‍य से यह प्रक्रिया इतनी साफ-सुथरी रह नहीं गई है, इसमें निहित स्‍वार्थ वाले लोगों के हित जुड़ गये हैं। आर्थिक लाभ का मसला होने के कारण कई तरह के लालच जुड़ गये है, चयन-प्रक्रिया भी अपनी विश्‍वसनीयता खोने लगी है। इन आशंकाओं के बावजूद हमारी अपेक्षा यही है कि अच्‍छे लेखन को बढ़ावा मिलना चाहिए। प्रक्रिया में आई कमजोरियों के कारण उसे बंद कर देना तो कोई विकल्‍प नहीं है। हां, अगर पुरस्‍कृत करने का कोई प्रावधान ही न रखना हो तो ऐसा सिर्फ साहित्‍य-कला के क्षेत्र में ही क्‍यों, जीवन के सारे क्षेत्रों में लागू कर दिया जाना चाहिये। आपने मिसाल के तौर पर डॉ रामविलास शर्मा का हवाला दिया, तो उस संबंध में मेरा यही कहना है कि रामविलास जी ने साहित्‍य अकादमी या उस स्‍तर के किसी पुरस्‍कार या सम्‍मान के प्रति उत्‍साह बेशक न दिखाया हो, लेकिन उसका विरोध कभी नहीं किया। ये उनका बड़प्‍पन है कि उन्‍होंने ऐसे पुरस्‍कारों से मिलने वाली राशि को साक्षरता मिशन या किसी सार्वजनिक हित के काम में दान कर दिया। ये उनकी महानता है। वे उत्‍सवी आयोजनों में जाते भी नहीं थे, उनके लिए अपना लेखन कार्य ही इतना महत्‍वपूर्ण था कि कहीं अनावश्‍यक जाना-आना पसंद भी नहीं करते थे, वे सही मायनों में एक बड़े और सम्‍माननीय लेखक थे।
रेवतीरमण -  नंद जी, आपको तो अनेक पुरस्‍कार और सम्‍मान मिले हैं, लेकिन जाने क्‍या वजह रही कि राजस्‍थान के किसी हिन्‍दी लेखक को आज तक साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार या किसी राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार-सम्‍मान के योग्‍य नहीं समझा गया - नंद चतुर्वेदी, ॠतुराज, विजेन्‍द्र, हरीश भादानी, जुगमंदिर तायल, नंदकिशोर आचार्य, डॉ नवलकिशोर आदि कितने ही हिन्‍दी के महत्‍वपूर्ण रचनाकार हमारे प्रदेश में रहे हैं, लेकिन इनमें से किसी को कोई महत्‍वपूर्ण पुरस्‍कार नहीं मिला। एकबार बिज्‍जी का नाम नोबल पुरस्‍कार चयन की चर्चा में जरूर सुना था, लेकिन वह कहीं खोकर रह गया, इस पर आप क्‍या कहेंगे?
नंद -  आपकी यह अपेक्षा तो सही है कि राजस्‍थान में हिन्‍दी के इतने वरिष्‍ठ और महत्‍वपूर्ण रचनाकारों के होते हुए भी उनमें से किसी को आज तक साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार नहीं प्राप्‍त हुआ, जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर के दूसरे पुरस्‍कार और सम्‍मान अनेक लेखकों को अवश्‍य मिले हैं, चाहे वह बिड़ला फाउंडेशन का बिहारी पुरस्‍कार हो या संगीत नाटक अकादमी सम्‍मान। साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार के बारे में मुझे ऐसा लगता है कि वह पुरस्‍कार उत्‍तर भारत के मध्‍यवर्ती हिन्‍दी राज्‍यों उत्‍तरप्रदेश, मध्‍यप्रदेश, बिहार, दिल्‍ली आदि के लेखकों तक सीमित होकर रह गया है, उसके बाहर राजस्‍थान, हरियाणा, हिमाचल या दूसरे प्रदेशों में काम करने वाले हिन्‍दी लेखक उस प्रक्रिया से बाहर अदेखे ही छूट जाते रहे हैं। अकादमी की चयन समितियों में भी इन हाशिये के प्रदेशों का कोई महत्‍वपूर्ण लेखक शायद ही शामिल रहा हो, जो इस बात की ओर ध्‍यान आकर्षिक करवा पाता। आमतौर पर उनको अनदेखा कर दिया जाता है। राजस्‍थान बेशक हिन्‍दी प्रदेश के रूप में कहा जाता हो, लेकिन वह दरअसल हिन्‍दी क्षेत्र से बाहर का प्रदेश है, यहां के लोगों की मूल भाषा हिन्‍दी है भी नहीं और जो है उसे संवैधानिक मान्‍यता नहीं है। मैं इस बात के लिए साहित्‍य अकादमी की अवश्‍य सराहना करता हूं कि उसने राजस्‍थानी को एक समर्थ भाषा का दरजा दे रखा है और हर वर्ष उसमें किसी प्रतिभाशाली लेखक को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार से सम्‍मानित भी किया जाता है। प्रदेश के हिन्‍दी रचनाकारों के साथ जो बरताव होता रहा है, उसके कारणों को समझने का प्रयास यहां के लोगों को अवश्‍य करना चाहिये।
रेवतीरमण -  आप लंबे अरसे तक रेडियो और दूरदर्शन की सेवा से जुड़े रहे हैं, इस सेवा के दौरान आपने कैसा महसूस किया, और क्‍या अपने रचनाधर्म पर इन माध्‍यमों का कोई अनुकूल या प्रतिकूल असर आपने महसूस किया ? 
नंद - पारिवारिक जरूरत से कहिये या जीवन-निर्वाह के लिए प्रत्‍येक व्‍यक्ति को कोई सार्वजनिक सेवा जैसा कार्य करना ही होता है। खासतौर से उन्‍हें, जिनका अपना कोई पुश्‍तैनी कार्य-व्‍यापार पहले से विकसित नहीं होता। ऐसे में जो सार्वजनिक सेवा में जाते हैं, उनके सामने विकल्‍प सीमित होते हैं, एक तो उनका स्‍थान-विशेष पर लंबे समय तक बने रहना आसान नहीं होता, उनका स्‍थानान्‍तरण एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर होता रहता है। उसमें बहुत कुछ नया जुड़ता भी है और बहुत कुछ छूटता भी। एक लेखक के रूप में जो काम हम कर रहे होते हैं, उससे भी कई बार दूरी-सी बन जाती है, या उपयुक्‍त समय ही नहीं निकाल पाते। ये अनुभव तो निश्चित रूप से रेडियो या दूरदर्शन में काम करते हुए मुझे भी हुआ। नौकरी को लेकर दूर-दराज जाना पड़ा, जिनके बीच एक लेखक के रूप में मैं सक्रिय रहने का इच्‍छुक रहा हूं, उनसे दूरी होने पर असर तो पड़ता है, लेकिन बहुत ज्‍यादा फर्क नहीं पड़ता, क्‍योकि वहां का भी तो अपना जीवन है, उससे काम के नये अवसर निकल आते हैं, वहां का नया परिवेश भी तो सामने होता था, तो मैं धीरे-धीरे उसमें रुचि लेता रहा, उन को अपने लेखन का विषय भी बनाता रहा, और यह मेरी ही बात नहीं, मीडिया में काम करने वाले सारे लेखकों के साथ यह होता है। सार्वजनिक सेवा में काम करते हुए रोज आठ-नौ घंटे उस सेवा को देने ही होते हैं, जीवन की जो बेहतरीन ऊर्जा होती है वह तो उस काम में लगती है। मेरा अपना निजी अनुभव थोड़ा अलग भी रहा, और मैंने उस सेवाकाल के दौरान भी अपनी रुचि के कामों के लिए बेहतर अवसर निकाले, कई ऐसे काम कर सका, जो उन माध्‍यमों में होने के कारण ही संभव हो सके। ऐसे बहुत से रचनात्‍मक कार्य मैंने उस नौकरी के दौरान संपन्‍न भी किये, मेरे अपने लेखन कार्य से जुड़ी किताबें बराबर प्रकाशित होती रहीं, हालांकि मैं उन लेखकों को भाग्‍यशाली मानता हूं जो एक पूर्णकालिक लेखक के रूप में अपने लेखन के बल पर सर्वाइव कर पाते हैं, मेरी निजी स्थिति निश्‍चय ही उनसे भिन्‍न रही, इसके बावजूद जो कर सका, मेरे लिए वह कम महत्‍व का नहीं है।
 रेवतीरमण - आपने मीडिया में तेतीस बरस काम किया है, उसके बहुत से अच्‍छे और रोचक अनुभव भी होंगे, कभी किसी अप्रिय स्थिति या मन के विपरीत काम करने से साबका पड़ा होगा, ये अनुभव आपके लेखन में भी उभरे होंगे, कृपया बेबाकी से बताएं।
नंद -  देखिये, जब मैं सन् 1975 में रेडियो में आया, उससे पहले मैं एक लेखक और पत्रिका के संपादक के रूप में सक्रिय था, लेखन को लेकर मेरी जो सोच और रुचियां थीं, मेरी इच्‍छा तो यही थी कि मैं वही काम उसी मनोयोग से करता रहूं, लेकिन ज्‍यों ही मैं एक सेवाकर्मी के रूप में मीडिया में आया, मुझे अपनी दिनचर्या को बदलना ही पड़ा। पहली बात तो यह हुई कि मेरा दिन का पूरा समय आठ-नौ घंटे उस रेडियो की नौकरी में लगाना होता था, फिर उस सेवा की प्रकृति भी अलग तरह की थी, उसमें कार्यक्रम आयोजना की दृष्टि से जीवन के सभी विषय और क्षेत्र महत्‍वपूर्ण थे, अकेले साहित्‍य या कला ही नहीं, दूसरे विषय और रूप भी मेरी कार्य-प्रणाली के अंग हो गये। कह सकते हैं कि कुछ काम रुचिकर नहीं भी होते, कभी कभी तनाव भी अनुभव करता था, लेकिन मैंने अपने को बदला और मीडियम के अनुरूप अपने को ढाला भी। मैं कविता कहानी तो लिखता ही था, लेकिन मीडिया में काम करते हुए मैंने रुपक विधा में, रेडियो वार्ता, संवाद, सजीव प्रसारण, संगीत या दूसरे जीवनोपयोगी विषयों के लिए कार्यक्रम नियोजन और निर्माण का काम भी पूरे मनोयोग से किया, उसके कारण कई बड़ी राष्‍ट्रीय प्रतिभाओं या विद्वानों से संवाद करने के अवसर भी आए, उनके लिए खुद को तैयार भी किया, ऐसे दस्‍तावेजी महत्‍व के संवादों का एक संकलन ‘संवाद निरंतर’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुआ। सन् 1993 के बाद जब मैं रेडियो से दूरदर्शन में शिफ्‍ट हुआ, तो उस माध्‍यम के साथ जुड़कर कार्यक्रम निर्माण के क्षेत्र में कई महत्‍वपूर्ण परियोजनाओं को आकार देने का अवसर मिला – उस माध्‍यम के लिए भारतीय साहित्‍य की कालजयी कथाओं की एक सी‍रीज मेरे संयोजन में तैयार हुई, जिसमें 14 भारतीय भाषाओं की श्रेष्‍ठ आधुनिक कथाओं पर एक सीरीज तैयार करवाई, जिसके लिए मुझे दूरदर्शन महानिदेशालय ने विशिष्‍ट सेवा पुरस्‍कार देकर सम्‍मानित किया, मीडिया के विभिन्‍न पक्षों पर मेरे स्‍वतंत्र आलेखों का एक संकलन ‘संस्‍कृति जनसंचार और बाजार’ भी प्रकाशित हुआ, जिस पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भारतेन्‍दु हरिश्‍चंद्र पुरस्‍कार प्रदान किया। दूरदर्शन सेवा के आखिरी दौर में ‘भारतायन’ जैसी वृत्‍त-रूपक श्रृंखला अपनी देखरेख में तैयार करवाई, जिसका दूरदर्शन के राष्‍ट्रीय और अन्‍य चैनलों पर प्रसारण हुआ, ये कार्य करते हुए जो भी खट्टे-मीठे अनुभव हुए, वे सीखने और कुछ बेहतर करने की दृष्टि से मेरे लिए वाकई महत्‍वपूर्ण रहे।
रेवतीरमण -  आपने कविता, कहानी, संवाद, अनुवाद आदि के साथ साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में भी काम किया है, मैंने आपकी आलोचना कृति ‘साहित्‍य-परम्‍परा और नया रचनाकर्म’ पढ़ी है। आलोचकों पर यह आरोप है कि वे किसी कृति को पूरा पढ़े बिना ही उस पर लिख देते हैं, जबकि आलोचना को सकारात्‍मक और वस्‍तुपरक होना चाहिए। अच्‍छी रचना के प्रति कई बार आलोचकीय दृष्टिकोण भ्रमित भी करता है, आप इस बारे में क्‍या कहना चाहेंगे?
नंद - हरेक लेखक या आलोचक एक अच्‍छा पाठक भी होता है, और पाठक की पहली कोशिश यह होती है कि वह जिस किसी भी कृति को पढ़ रहा है, उसके मूल भाव को समझे, उसके माध्‍यम से लेखक के संवेदनात्‍मक उद्देश्‍य को जाने कि कुल मिलाकर यह कृति कहती क्‍या है।  पाठक के ग्रहण करने की अपनी एक प्रक्रिया है, लेकिन वह आलोचक उससे जरा आगे बढ़कर उस कृति का विवेचन करते हुए उसके भीतर खूबियों या सीमाओं को उद्घाटित करता है, उस प्रक्रिया में वह कृति को तटस्‍थ भाव से या कहना चाहिये वस्‍तुपरक दृष्टिकोण से भी उसे जांचने परखने का कार्य करता है, उसी विषय पर अन्‍यत्र क्‍या-कुछ लिखा गया है या उस विषय का जो व्‍यापक परिप्रेक्ष्‍य है, उसमें यह कृति क्‍या कुछ जोड़ती है, उन सारे संदर्भों के साथ उसका मूल्‍यांकन करने की जिम्‍मेदारी लेता है, इस तुलनात्‍मक विवेचन या अध्‍ययन के माध्‍यम से जो नतीजे सामने आते हैं, वे महत्‍वपूर्ण तो होते ही हैं, वे उस विषय को कैसा नया परिप्रेक्ष्‍य या आयाम देते हैं, यह तय कर पाना भी संभव होता है, इस दृष्टि से मैं आलोचना को एक गंभीर दायित्‍वपूर्ण कार्य मानता हूं। हालांकि हर बार तुलनात्‍मक दृष्टिकोण से देखने पर ही किसी कृति का सही मूल्‍यांकन होता हो, ऐसा मैं नहीं कहता, पहली कोशिश तो यही होनी चाहिये कि लेखक ने अपनी कृति के माध्‍यम से जो कहा है, पहले उसके मूल भाव को समझा और समझाया जाए और फिर उसमें तटस्‍थ भाव से अपनी राय दे। आलोचना को कुछ हद तक सजेस्टिव और सकारात्‍मक भी होना चाहिये।
रेवतीरमण -  इसी क्रम में मेरा एक छोटा-सा सवाल और भी है कि आपने राजस्‍थान के  और हिन्‍दी जगत के बहुत से महत्‍वपूर्ण हिन्‍दी कवियों पर लिखा है, खासकर नंद चतुर्वेदी, हरीश भादानी, नंदकिशोर आचार्य, भगवत रावत, ज्ञानेन्‍द्रपति, राजेश जोशी, लीलाधर मंडलोई, कुमार अंबुज, एकान्‍त श्रीवास्‍तव, अनिल गंगल आदि की कविताओं पर आपकी अच्‍छी समीक्षाएं पढ़ने को मिली हैं, इन सब पर लिखने के पीछे क्‍या नजरिया रहा ?
नंद - आप जानते हैं कि एक कवि के रूप में कविता से मेरा गहरा रिश्‍ता रहा है, कविताएं तो लिखता ही रहा हूं, अपने समय के महत्‍वपूर्ण कवियों को पढ़ते हुए उनकी कविताओं पर लिखना भी मुझे बहुत उत्‍साहजनक लगता रहा है। इसी क्रम में मैंने अपने समकालीनों और वरिष्‍ठ कवियों पर खुलकर लिखा है – नागार्जन, केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय, मुक्तिबोध, धूमिल आदि बड़े कवियों के अलावा हमारे अपने प्रदेश के नंद चतुर्वेदी, हरीश भादानी, नंद किशोर आचार्य, अनिल गंगल, गोविन्‍द माथुर और हिन्‍दी के बहुत से कवियों पर मैं लिखता राह हूं - आपकी कविताओं पर भी लिखा है, दरअसल इस रूप में पिछले चार दशक की कविता के विभिन्‍न पक्षों पर जो कुछ लिख पाया हूं, अब उसे एक पुस्‍तक के रूप में तैयार करने की मेरी योजना है, कुछ पक्ष या महत्‍वपूर्ण कवि रह गये हैं, जिन पर लिखना बाकी है, उन पर मैं लगातार काम कर भी रहा हूं।
रेवतीरमण -  और एक अंतिम प्रश्‍न मेरे अपने लिए – आपकी एक कविता मेरे मन से बहुत भिड़ती है, मैंने अनेक बार उसे पढ़ा है, जी में आता है कि मैं आप ही की तरह बीज क्‍यों न बन जाऊं, जन जन की भूख मिटाने की, क्‍यों न वह सामर्थ्‍य हासिल कर लूं, जो वाकई मुझे कविता की असली ताकत लगती  है। मेरा प्रश्‍न है कि आखिर आप बीज क्‍यों बन जाना चाहते हैं?
नंद -  आपका इशारा मेरे नये काव्‍य-संग्रह ‘आदिम बस्तियों के बीच’ में प्रकाशित इसी शीर्षक कविता की ओर है, जो इस संग्रह की अंतिम कविता है, जिसमें मैं एक कवि के रूप में अपने मूल या कहिये कि जड़ों से जुड़े रहने के आत्मिक भाव पर बल देता हूं – ‘इससे पहले कि अंधेरा आकर/ ढांप ले फलक तक फैले/ दीठ का विस्‍तार/ मुझे पानी और मिट्टी के बीच/ बीज की तरह/ बने रहना है इसी जीवन की कोख में।' यह कविता मैंने अपनी सेवा-मुक्ति के बाद लिखी थी और इसका मूल भाव यह है कि एक लंबी यात्रा से गुजर कर जहां मैं आया हूं, और कहीं मन में एक सुप्‍त भाव हमेशा से रहा है कि मैं जिस जमीन से जुड़ा रहा हूं, उससे कभी मेरा संबंध-विच्‍छेद न हो, मैं सदा उससे जुड़ा रहूं,  मनोवैज्ञानिक स्‍तर पर और संभव हो तो भौतिक रूप से भी। हालांकि आपका जानकर आश्‍चर्य होगा कि ‘सांम्‍ही खुलतौ मारग’ जैसा उपन्‍यास मैंने गुवाहाटी में बैठक्‍र लिखा, जबकि पूरा उपन्‍यास राजस्‍थान की मिट्टी और अनुभव से जुड़ा उपन्‍यास है। कहने का तात्‍पर्य यह कि लेखक चाहे जहां रहकर अपना लेखन कार्य करे, अगर वह अपनी जमीन से आत्मिक स्‍तर पर जुड़ा रहे तो वह कहीं दूर-दराज या विदेश में रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़ा रह सकता है। जयपुर मेरी पसंद की जगह रही है, लेकिन बाड़मेर जिले का वह गांव आज भी मेरी प्राथमिकता में कायम है, आज भी उससे जीवंत जुड़ाव बना हुआ है और ऐसे अवसर आते रहते हैं कि अपनी जमीन और जीवन से लगाव रखने वाले उन तमाम लोगों से मिलकर उसी रचनात्‍मक ऊर्जा को बरकरार रख सकूं, कुछ और बेहतर काम कर सकूं। 



(नंद भारद्वाज हिन्‍दी और राजस्‍थानी में कवि, कथाकार, समीक्षक और संस्‍कृतिकर्मी के रूप में अपनी विशिष्‍ट पहचान रखते हैं। कविता, कहानी, उपन्‍यास, आलोचना, संवाद और अनुवाद विधाओं में निरन्‍तर लेखन करते रहे हैं। उनकी प्रमुख कृतियां हैं – काव्‍य संग्रह : झील पर हावी रात, हरी दूब का सपना और आदिम बस्तियों के बीच (हिन्‍दी में), अंधार पख और आगै अंधारौ (राजस्‍थानी में)। कहानी संग्रह : बदलती सरगम (राजस्‍थानी) और ‘आपसदारी’ (हिन्‍दी), उपन्‍यास : ‘सांम्‍हीं खुलतौ मारग’ और इसी का हिन्‍दी अनुवाद ‘आगे खुलता रास्‍ता’। आलोचना : दौर अर दायरौ (राजस्‍थानी) तथा ‘साहित्‍य परम्‍परा और नया रचनाकर्म’ (हिन्‍दी) । साक्षात्‍कार  : संवाद निरन्‍तर, मीडिया : ‘संस्‍कृति जनसंचार और बाजार’, अनुवाद : अल्‍बेयर कामू के उपन्‍यास ‘ल स्‍ट्रैंजर’ का राजस्‍थानी अनुवाद ‘बैतियांण’, मृदुला बिंहारी के हिन्‍दी उपन्‍यास ‘पूर्णाहुति का राजस्‍थानी अनुवाद तथा वैश्विक सैद्धांतिक आलोचना के आधारभूत निबंधों का राजस्‍थानी अनुवाद ‘साहित्‍य आलोचना री आधारभोम’। संपादन :  ‘रेत पर नंगे पांव’ (काव्‍य संग्रह), तीन बीसी पार (राजस्‍थानी कहानी संग्रह) तथा  ‘जातरा और पड़ाव’ (प्रतिनिधि राजस्‍थानी काव्‍य संग्रह) का संपादन एवं प्रकाशन। सम्‍मान-पुरस्‍कार : साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार, के के बिड़ला फाउंडेशन का ‘बिहारी पुरस्‍कार’, दूरदर्शन का ‘विशिष्‍ट सेवा पुरस्‍कार’, राजस्‍थानी भाषा साहित्‍य एवं संस्‍कृति अकादमी का ‘सूर्यमल्‍ल शिखर पुरस्‍कार’ तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का भारतेन्‍दु हरिश्‍चन्‍द्र पुरस्‍कार आदि। संप्रति :  दूरदर्शन केन्‍द्र जयपुर के वरिष्‍ठ निदेशक पद से सेवा-निवृत्‍त तथा जयपुर साहित्‍य उत्‍सव के क्षेत्रीय सलाहकार। )

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Sunday, August 13, 2017




कहानी -     


अकाल मृत्यु
·         नंद भारद्वाज

‘भाभी का देहान्‍त... जल्‍द घर पहुंचें...’  उन चंद शब्‍दों ने एकाएक पांवों के नीचे से जैसे जमीन ही खींच ली थी... टेलीग्राम के उस छोटे-से कागज को दो-तीन बार उलट-पलट कर पढ़ लेने के बाद भी उसमें दर्ज सूचना को मान लेने को मन कतई तैयार नहीं था। इस मैसेज के साथ न किसी भेजने वाले का नाम था और न ही पता-ठिकाना...। ...एक बार फिर से अपना नाम और पता जांच लिया कि कहीं किसी और व्यक्ति का तार तो नहीं आ गया गलती से, लेकिन मजमून की शुरुआत में ही मेरा नाम और मकान का पता साफ-साफ लिखा था यानी तार आया तो मेरे नाम से ही है। तार की लिखावट के बारे में तो कहा ही जाता है कि ‘लिखे मूषा और पढ़े खुदा...’ बहुत-बार लिखनेवाले की अपनी मनोदशा पर भी बहुत-कुछ निर्भर करता है... कई बार संदेश ऐसी लिखावट में आता है कि उस लिखे को सही-सही उघाड़ने के लिए किसी ऐसे तजुर्बेकार  शख्स को तलाश करना पड़ता है, जो हर तरह की लिखावट को सही-सही पढ़ लेने का अच्छी सलाहियत रखता हो। कई बार अगर लिखने वाला बहुत थका-मांदा हुआ या इस तरह के एकरस काम से ऊबा हुआ हो तो अक्सर ऐसे वक्त में लिखे जाने वाले मजमूनों की लिखावट अजीब हो ही जाती है, ...अब इसकी शिकायत करें भी करें तो किससे... और कौन सुने ?   
    एक बार फिर से उस जगह का नाम खोजने की कोशिश की, जहां से तार आया था। मेरे नाम-पते की ऊपरी लाइन में ही दो दिन पहले की तारीख और डाकघर की अपनी गुप्त भाषा में जगह के नाम पर दो कमजोर से हर्फ उभर रहे थे - कवा....जिससे यह अनुमान तो हो गया  कि तार आया मेरे गांव के पास वाले रेल्वे-स्टेशन से ही था, जहां उस पूरे इलाके का एक अकेला  डाकघर है और वहीं से तार भेजने या तलब करने की ऐसी सुविधा मौजूद है। इतनी-सी बात जेहन में ठहरते ही मेरा सारा ध्यान तार के तर्जुमे पर टिक गया - ‘‘भाभी का देहान्‍त, जल्द घर आएं..’’ लेकिन इन शब्दों से यह समझ पाना तो वाकई मुश्किल था कि आखिर कौन-सी भाभी के बारे में यह दुखदाई खबर दी गई है। भेजनेवाले का नाम न होने से दुविधा और बढ़ गई। अगर ये तार छोटे भाई गोपाल ने भिजवाया है तो उसके लिए तो मेरी पत्नी और बड़े भाई की पत्नी दोनों भाभी ही हुईं, यों आस-पास के चाचा-ताऊओं के घरों की बहुएं भी रिश्‍ते में उतनी ही नजदीक लगती हैं। ...रह-रहकर एक ही दुश्चिन्ता आकर घेरती रही कि कहीं गीता के बारे में तो नहीं...? ?
    मेरी  पत्नी गीता इन दिनों गर्भ के पूरे दिनों में थी। जब पिछली बार गांव जाकर आया था तब वह सात महीने पूरे कर चुकी थी और उसका यह पहला जापा होने के कारण हरवक्त मेरी सांस चढ़ी रहती थी कि कहीं कोई अनिष्ट न हो जाए...। जो भी हो, बात थी बेहद चिन्ताजनक और हृदय-विदारक...। मन में अजीब तरह आशंकाएं उठ रही थीं। दिलो-दिमाग में लगातार व्याकुलता बढ़ती जा रही थी और पांवों में अजीब-सी कंपकंपी। 
    मुंबई से रात-भर की रेल-यात्रा पूरी कर ठीक एक महीने बाद आज की अल-सुबह अपने शहर पहुंचा था। ऑटो से उस किराये के कमरे पहुंचकर ताला खोला और हाथ का सामान कमरे में रखकर सोचा कि पहले बाहर डाक का डिब्बा देख लूं, जो दरवाजे के पास ही दीवार में टंगा था। लकड़ी के उस डिब्‍बे में महीने भर की डाक जमा थी – कुछ चिट्ठियां और कुछ अखबार-पत्रिकाएं...। डिब्‍बे का ढक्‍कन खोलकर डाक हाथ में लिये जब वापस कमरे में आया तो पहली नजर उन चिट्ठियों के बीच एक तार पर ही पड़ी, जो ऊपर रखा था। यों भी बाकी डाक तो बाद में तसल्‍ली से देखी जा सकती है,  तार तो तुरन्त ही पढ़ लेना होता है। फोल्‍ड किये हुए तार को जब खोलकर मजमून पढ़ा तो दिल और दिमाग को एक धक्का-सा लगा।... वही शब्‍द बार-बार दिमाग में चक्कर काट रहे थे - भाभी का स्वर्गवास...-- पर कैसे? क्यों? मौत की कोई वजह भी तो होगी?  
     ऐसे किसी अनिष्ट की आशंका तो कहीं नजदीक-दूर भी नहीं दीख रही थी। अलबत्‍ता गीता के बारे में इतना जरूर जानता था कि उसके जी में आराम नहीं था,  कुछ कमजोर भी हो गई थी... ऊपर से गर्भ के पूरे दिनों थी वह...। इसके बावजूद मैं तो बल्कि किसी खुशखबरी के इंतजार में ही था -- पिछली बार जब गांव आया था, तब कितनी कमजोर नजर आ रही थी वह। उसके प्रति इस तरह चिन्ता करते देख भाभी ने ही हंसते हुए कहा था - ये भी कोई चिन्ता करने की बात है, लाल जी! आप तो पढ़े-लिखे हैं, लुगाई जब पहली बार पेट से होती है तो कुछ सोराई-दोराई तो होती ही है,  ...पर सब ठीक तरह से हो जाता है। आपको तो अच्छी-खासी बख्शीश देनी होगी मुझे...फिर परिहास करते हुए बोलीं, ‘लगता है, बच्चे के बाप बनने की उतावली कुछ ज्यादा ही है आपको.... थोड़ा धीरज रखिये, सब्र का फल मीठा ही होता है... कहते हुए वह कितनी खिलखिला उठी थीं और अपनी तरह से कितनी खूबसूरत तसल्ली दिला दी। फिर भी गांव से लौटने के बाद सप्ताह भर तक मेरा मन बराबर उद्विग्न रहा। सप्ताह भर बाद गीता के पत्र से ही कुछ तसल्ली मिल पाई कि वह बिल्कुल ठीक है। पत्र मिलने के अगले ही दिन महीने भर के लिए मेरा मुंबई जाने का काम निकल आया, अपने मालिक के साथ। उन्हें कंपनी के लिए कुछ नये इंतजामात करने थे। घर के हालात को देखते हुए कहीं दूर जाने मेरी इच्छा बिल्कुल नहीं थी और मैंने मालिक को बताया भी कि गांव में मेरी पत्नी गर्भ के पूरे दिनों में है, इसलिए वे मेरी जगह किसी और को ले जाएं, लेकिन उन्होंने तो मुझे ही ले जाना तय कर रखा था - तीन दिन पहले ही टिकट-रिजर्वेशन मेरे नाम से हो चुका था, इसलिए जाना तय था। हम उसी रात रवाना हो गये थे। मुंबई में कहां रहना है, इसका कुछ पता-ठिकाना नहीं था, सो घर को खबर भी क्या करता। सोचा, जल्दी ही लौटकर गांव हो आऊंगा। लेकिन पूरा एक महीना मुंबई में लग गया। इस दौरान घर के समाचारों को लेकर मुझे हरवक्त चिन्ता बनी रही, लेकिन समाचार जानने का और कोई जरिया ही नहीं था। आज जब दौरा पूरा कर वापस लौटा हूं तो यह बेहद चिन्ताजनक खबर मिली है...! 
    गीता का खयाल आते ही मुझे एक दूसरी तरह का अपराधबोध आ घेरता है। वैवाहिक जीवन के इन तीन सालों में अपनी पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद इतनी गुंजाइ कभी बनी ही नहीं कि मैं उसे शहर लाकर अपने साथ रख पाता। पहली बात तो यह कि प्राईवेट कंपनी की इस मामूली-सी नौकरी में यह संभव ही नहीं था कि एक ठीक-ठाक-सा मकान किराए पर ले लूं और उसमें परिवार को आराम से रख सकूं। उससे भी बड़ी चिन्ता इस बात की कि ये नौकरी भी आखिर कितने दिन की - जितने दिन मालिक राजी है, चल रही है, जिस दिन वह काम में कसर निकालने पर आ जाएगा, कोई दूसरा काम भी ढूंढ़ना पड़ सकता है। इन अनिश्चित हालात की सब से अधिक तकलीफ परिवार को ही उठानी पड़ती है। गांव में पीछे अपना बना-बनाया घर है, खेती-बाड़ी का काम है किसी पर कोई निर्भरता नहीं। कम-से-कम इतनी तसल्ली तो है कि वह घर में निरापद रहेगी - अपनी मेहनत के बूते दो-जून रोटी की कमी तो नहीं होगी। 
     खड़े-खड़े ही मैंने कमरे की हरेक चीज पर एक उड़ती-सी निगाह डाली - सारी चीजें अपनी जगह वैसे ही निर्जीव-सी पड़ी थी, जैसी महीने भर पहले छोड़ गया था। कमरे में ताजा हवा के लिए मैंने पलंग के साथ वाली दीवार पर बनी खिड़की के पल्ले खोल लिये - सवेरे के चढ़ते सूरज के उजास में कमरे के आंगन और आलमारी के खानों में बिछे कागजों और दीवार पर टंगे कलैंडर में जैसे हरकत-सी आ गई। लेकिन सामान पर चढ़ी धूल की परतें देखकर मन में थकान और गहरा गई। मैंने पलंग के सिरहाने रखे बिस्तर को फैलाकर चद्दर को साफ किया और कुछ क्षणों के लिए लेट गया। आंखें बंद जरूर कर लीं, पर नींद कहां? 
     अपने आप को इतना बेबस और असहाय शायद ही कभी महसूस किया हो। जीना इतना सारहीन लगने लगा था कि कुछ करने की इच्छा ही नहीं हो रही थी। सोए-सोए अनायास जब लगा कि आंखों की पुतलियां और कनपटी गीली हो गई है तो उठकर बैठ गया और दोनों हथेलियों से आंखों से झर आए आंसुओं को हौले-से पौंछ लिया। एक पुराना वाकया याद हो आया - घर में एक बार किसी छोटी-सी बात पर ऐसे ही जब मेरी आंखों में आंसू आ गए, तो भाभी ने हंसते हुए कहा था, ‘वाह लाल जी, आप तो बहुत पढ़े-लिखे मर्द हैं, कभी मर्द भी इस तरह रोया करते हैं?’ और मैंने तुरन्त आंखें पौंछ ली थी। आज फिर जब आंसू निकल आए, तो भाभी का वह प्यारा-सा उलाहना याद आ गया।
    खिड़की से बाहर की ओर देखा तो लगा कि धूप काफी तेज निकल आई थी। मैंने बाथरूम में जाकर मुंह-हाथ धोए और तौलिये से मुंह पौंछकर रसोई की सुध ली, जो महीने भर से बंद पड़ी थी। खाने-पीने का ताजा सामान तो लाना ही था, लेकिन खाना बनाने की बिल्कुल इच्छा  नहीं थी। सोचा, बाहर ही कुछ खा आऊं। मैंने कमरा बंद किया और पास ही के बाजार की ओर निकल आया। एक रेस्तरां में पहले एक प्याली चाय पी और कुछ हल्का नाश्‍ता लिया। फिर पास ही की दुकान से बाकी घरेलू सामान लेकर वापस लौट आया। गांव तो अब रात की गाड़ी से ही जाना संभव था और उससे पहले कंपनी के ऑफिस जाकर छुट्टी का बंदोबस्त भी करना था। मैं नहा-धोकर दस बजे ऑफिस पहुंच गया। जब मैनेजर और मालिक को घर के समाचार बताए और तार दिखाया तो उन्होंने भी अपनी ओर से हमदर्दी जताई। छुट्टी भी आराम से मिल गई, बल्कि कुछ जरूरी आर्थिक मदद भी जुटाई। ऑफिस में अपना जरूरी काम निपटाकर शाम को पांच बजे से कुछ पहले ही मैं वहां से निकल आया। सवेरे इतना समय मिला ही नहीं था कि महीने भर से सूने पड़े कमरे को ठीक-ठाक कर पाता, इसलिए लौटकर सबसे पहले कमरे की  सफाई में जुट गया और घंटा भर उसी में लगा रहा। 
    रात को रेल-यात्रा में यों भी ठीक से सो नहीं पाया था, फिर लौटते ही जिस तरह का दुखदाई  समाचार मिला उससे दिन भर तनाव बना रहा। मन तो उद्विग्न था ही, शरीर भी थकान अनुभव करने लगा था। कमरे की सफाई करते-करते धूल-मिट्टी के कारण वैसे ही आंखें भारी हो रही थीं। सोचा, थोड़ा सो लूं तो शरीर कुछ हल्का हो जाए। बिस्तर पर सीधा होते ही आंख लग गई और जब वापस खुली तब तक कमरे में अच्छा-खासा अंधेरा घिर आया था। उठकर बत्ती जलाने के लिए स्विच ऑन किया पर बत्ती नहीं जली, दो-तीन बार स्विच ऊपर-नीचे करके देख लिया, लेकिन नतीजा वही। शायद बल्ब फ्यूज था। याद आया कि आलमारी में मोमबत्ती रखी है, इसलिए आलमारी खोलकर उसे निकाल लाया। माचिस अमूमन स्टोव के पास ही रखने की आदत है, अंधेरे में थोड़ा-सा आंखों पर जोर देकर देखा तो वह स्टोव के पास ही मिल गई। तीली जलाकर मोमबत्ती जलाई और उसे आटे के पीपे पर ठहरा दिया। कमरे में मरियल-सा पीला उजास पसर गया। बाल्टी लेकर बाथरूम की ओर गया और वहां का स्विच ऑन किया तो संयोग से वहां का बल्ब जल गया। सोचा थोड़ा नहा लूं तो शरीर हल्का हो जाएगा।
     स्नान करने से वाकई जी में कुछ शान्ति-सी मिली। नहाने के बाद बाथरूम का बल्ब निकालकर कमरे में लगा लिया, जिससे कमरे में रोशनी का फौरी इंतजाम हो गया। हाथ की घड़ी में टाइम देखा - नौ बज रहे थे यानी गांव जाने वाली गाड़ी में अभी सवा-डेढ़ घंटा बाकी था। भूख वैसे भी कुछ खास थी नहीं। यही सोचकर कि अगर कुछ खाने की इच्छा होगी तो स्टेशन पर ही देख लूंगा, खाना बनाने का विचार छोड़ दिया। कुछ देर यों ही मेज पर रखी चिट्ठियां उलट-पलट कर देखता रहा, घर की और कोई चिट्ठी नहीं थी। 
   एक छोटे बैग में पहनने के दो जोड़ी कपड़े, तौलिया और दैनिक उपयोग का छोटा-मोटा सामान डालकर मैं तैयार हो गया। रवाना होने से पहले एकबार जेब का पर्स सम्हाला रेल किराये के अलावा हाथ-खर्च के लिए दो सौ रुपये और कुछ रेजगारी थी, जो यात्रा के लिए काफी थी। ऑफिस से आकस्मिक मदद के रूप में जो राशि मिली थी, उसे अलग से बैग की अंदरूनी जेब में सुरक्षित रख लिया था। एकबारगी कमरे का मुआयना करने के बाद बैग कंधे पर लटकाकर बत्ती बुझाई और दरवाजे के ताला लगाकर सड़क पर आ गया। मेरे रहने के ठिकाने से स्टेशन ज्यादा दूर नहीं था, दस-पन्द्रह मिनट में पैदल आराम से पहुंचा जा सकता था, सामान भी कुछ खास नहीं था, इसलिए पैदल निकल जाना ही बेहतर समझा।
     सड़क पर वाहनों और लोगों का आव-जाव जारी था। फुटपाथ पर सामने से एक युगल को आते हुए देखा तो मुझे भी गीता की याद आ गई। घर में एक वही तो है, जिसे अपने मन की बात कह सकता हूं - मेरे सुख-दुख की सच्ची साझीदार। पिछले कुछ वर्षों से ईश्‍वर में आस्था भले कम हो गई हो, लेकिन आज अनजाने ही मनो-मन ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगा था कि वह मेरी गीता को हर हाल में सही-सलामत रक्खे।
    ईश्‍वर को स्मरण करते हुए और लोगों के बीच से अपना रास्ता बनाते हुए कोई पन्द्रह मिनट की पैदल यात्रा के बाद मैं स्टेशन पहुंच गया था। मुसाफिर खाने में स्थित टिकट-खिड़की पर जाकर अपनी टिकट ली और प्लेट-फॉर्म पर खड़ी गाड़ी के एक खाली-से डिब्बे में जाकर बैठ गया। गाड़ी रवाना होने में अभी आधा घंटा बाकी था। डिब्बे के पास से गुजर रहे खोंमचेवाले से दो समोसे और चटनी लेकर रख लिये थे, सोचा जब भूख लगेगी तो खा लूंगा। मैं डिब्बे में खिड़की से अपनी सीट पर बैठै प्लेट-फॉर्म पर घूमते लोगों को बेमतलब देखता रहा। विचारों और आशंकाओं में कुछ इस तरह डूबा रहा कि कब गाड़ी रवाना हो गई, पता ही नहीं चला। उसी तार-संदेश से मन में उठती शंकाओं को लेकर विचार करता रहा - आखिर क्या हुआ होगा?... जब मैं घर पहुंचूंगा तो क्या हालत होगी?... मुंह-अंधेरे साढ़े चार बजे घरवालों को जगाना और फिर उनका इतने सवेरे सूरज उगने से पहले विलाप करना... मेरी क्या स्थिति होगी? ...क्या मैं यह सब सहन  कर पाऊंगा? यही कुछ सोचते-विचारते डिब्बे की खिड़की से बाहर देखा तो खयाल आया कि गाड़ी भगत की कोठी पार कर गई है और अब उसने पूरी रफ्तार पकड़ ली है। आधे घंटे बाद जब मैंने डिब्बे में अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो आस-पास के कुछ मुसाफिर नींद में डूबे सो रहे थे तो कुछ आपसी बातचीत में मशगूल। हल्की-सी खाने की तलब हो रही थी, सो पास रखे दोनों समोसे चटनी में मिलाकर खा लिये।   
     लूनी, समदड़ी, बालोतरा और बायतू होती हुई बाड़मेर जाने वाली डाक गाड़ी बस इन्हीं बड़े स्टेशनों पर रुकती हुई कोई चार सवा-चार बजे मेरे गंतव्य कवास पहुंचती है। चिन्ता-फिक्र के कारण मेरी नींद पहले ही उड़ चुकी थी। बीच में पन्द्रह-बीस मिनट के लिए एक-दो बार झपकी आई भी तो स्टेशन पर लोगों के चढ़ने-उतरने की चहल-पहल में नींद उचटती रही। ये सारे स्टेन एक-एक कर मेरी खुली आंखों के सामने से गुजर गये। कवास के करीब पहुंचते हुए गाड़ी की रफ्तार जब कुछ धीमी पड़ी तो मैंने बगल में रखा अपना बैग कंधे पर लटका लिया और अपनी सीट से उठ खड़ा हुआ। दरवाजे पर पहुंचकर कलाई घड़ी देखी तो उसमें चार बजकर दस मिनट हो चुके थे। प्लेटफॉर्म पर गाड़ी के रुकते ही डिब्बे की हत्थी छोड़कर मैं नीचे उतर गया।  उतरकर अभी दो-चार कदम चला ही था कि ठंडी हवा का एक झौंका मेरे भीतर से होकर गुजर गया। गर्म कपड़ा कुछ पहना ही नहीं था सो कंपकंपी-सी छूट गई। अभी सूरज उगने में ढाई-तीन घंटे की देरी थी। आसमान में अंधेरी एकादशी का पौना चांद पश्चिम की ओर काफी नीचे झुक आया था। 
     गांव की ओर कदम बढ़ाने शुरू किये ही थे कि भाभी और गीता के भीगे हुए चेहरे मेरी चेतना में तैर गये। इनमें से किसी भी चेहरे का विलुप्त होना मेरे भीतर इतना खालीपन पैदा कर देगा कि उसे शायद ही झेल पाऊं। स्टेशन और गांव के बीच दो किलोमीटर का वह सुनसान फासला था मुझे अक्‍सर अकेले पैदल ही पार करना होता है। हालात और हकीकत का सामना करने की हिम्मत डूबती जा रही थी और शायद इसीलिए बीस-पच्चीस मिनट का रास्ता पार करने में आज कुछ ज्यादा ही वक्त लग रहा था। ज्यों-ज्यों गांव नजदीक आ रहा था, कलेजे की धड़कन बढ़ती जा रही थी। जब गांव में घर पहुंचकर घर के अहाते में दाखिल हुआ तो एकबारगी भीतर की सांस भीतर और बाहर की बाहर ही रह गई। अहाते में प्रवेश करते ही बाएं हाथ की तरफ बनी खुली बैठक की ओर नजर डाली तो अंदर अंधेरे में दो-तीन लोगों की सोए होने की सांस बज रही थी - कौन हो सकते हैं अंदर, इतना जानने की फुरसत कहां थी? मैं बिना उस तरफ ध्यान दिये, सीधा घर के आंगन की ओर बढ़ गया।
    गांव में घर के चारों ओर कंटीली बाड़ से बने गोल घेरे के बीचो-बीच एक बड़े-से खुले आंगन और उसके चारों ओर तीन झोंपड़े, दो ओरे और एक बुखारी वाले इस घर में हमारा परिवार पिछली तीन पीढि़यों से रहता आया है। झोंपड़े और ओरे जहां घर का सामान रखने, अपना घरेलू काम करने और दिन-रात रहने-सोने के काम आते हैं, वहीं बुखारी अनाज और खाने-पीने का सामान रखने के काम आती है। गोबर की गोल दीवारों पर मजबूत लकडि़यों को परस्पर छतरीनुमा आकार में गूंथ-बांधकर उन पर पुआल की छत डालकर बनाए गये झोंपड़े सर्दी में जहां गरमास देते हैं, वहीं गर्मी के दिनों में ये उतने ही ठंडे रहते हैं। हालांकि भरपूर गर्मी के दिनों में कोई इन झोंपड़ों-ओरों के अंदर नहीं सोता। सब लोग खुले आंगन में ही सोते हैं। 
    अभी मौसम में थोड़ी ठंडी खुनक है, इसलिए घर की स्त्रियां और बच्चे इस वक्त इन्हीं झोंपड़ों में गहरी नींद में सो रहे थे, पर कौन किस झौंपड़े या ओरे में है, यह अनुमान कर पाना कठिन था। मैं कुछ क्षण अनमना-सा इन्हीं आसरों की ओर देखते हुए आंगन के बीच खड़ा विचार करता रहा कि क्या किया जाए - मां या बहन को आवाज दी जाए... भाभी और गीता के बारे में तो सोचने की ही हिम्मत नहीं पड़ रही थी। मां अमूमन अकेली रसोई में ही सोती है, मुझे इस वक्त वही ठीक लग रहा था कि पहले उसी को उठाया जाए... घर की बहुएं और बहन मीरां अपनी किशोरी बेटी और भाई की दो छोटी बच्चियों के साथ बाकी झोंपड़ों और ओरों में सो रही होंगी, उन्हें इस वक्त जगाना यों भी ठीक नहीं होगा। हालांकि मां को जगाने का नतीजा भी यही होगा कि वह उठते ही विलाप शुरू कर देगी और फिर बाकी लोग भी जाग जाएंगे। मैं शायद यह भी न जान पाऊं कि मौत आखिर हुई किसकी है, ...कहीं ऐसा न हो कि खुद ही रोने बैठ जाऊं। मैंने रसोई वाले आसरे के भीतर से आती सांसों की आवाज की ओर ध्यान दिया, मुझे एकाएक लगा कि उसमें सोयी दो स्त्रियों में से कोई एक जग गई है, उस स्त्री स्वर की हल्की खांसी और टसकने की आवाज से मैंने तुरन्त पहचान लिया कि यह आवाज गीता के अलावा और किसी की नहीं हो सकती।
    घर में जिस तरह की उदासी और गमगीनी का वातावरण था, उससे यह संकेत तो पहले ही मिल गये थे कि मौत इसी घर में हुई है, अब यह भी स्पष्ट हो गया कि मौत बड़े भाई की पत्नी यानी मेरी भाभी की ही हुई है! इस बेरहम सच को मैंने कुबूल तो कर लिया, लेकिन मन की उलझन और दोहरी हो गई। कई सवाल कुलबुलाने लगे - कैसे हो गई मौत? न बीमार सुना, न घर में ही कोई अनहोनी जैसी बात सुनी, भाई खुद कितना खयाल रखते थे भाभी का? हां अगर कोई अचानक दुर्घटना हो गई हो तो अलग बात है, लेकिन क्या?
    मैं एकबारगी उत्तर दिशा वाले ओरे की दीवार के सहारे खड़ी खाट को वहीं आंगन के एक कोने में सीधी कर उस पर बैठ गया और सोचने लगा। उसी सोचने की प्रक्रिया में अनायास मेरे गले से भी खांसी की आवाज निकल आई, जिसे शायद हाल ही में जागी गीता ने सुन लिया था, शायद लकड़ी के दरवाजे की पट्टियों के बीच से सवेरे के उजास में देख भी लिया हो, लेकिन उसने रसोई का दरवाजा खोलने की बजाय उसी के पास सोई मां को दो-तीन आवाजें दीं।
   रसोईघर का दरवाजा खोलने के साथ ही मां मुझे आंगन में खाट पर बैठा देखकर वहीं रसोई के भीतर ही दरवाजे के पास बैठकर विलाप करने लग गई। मैं चुपचाप खाट से उठकर उसके करीब जाकर बैठ गया। ...तय नहीं कर पा रहा था कि उसे क्या कहकर तसल्ली दूं।  
    मां भाभी का नाम ले-लेकर लगातार दबे सुर में रोए जा रही थी और गीता उसे शान्त रहने के लिए बराबर आग्रह कर रही थी। गीता की आवाज भी काफी आर्द्र थी - मां को शान्त रहने के लिए कहते हुए उसका अपना गला भी भर आया, इसके बावजूद वह अपने भावावेग पर नियंत्रण बनाए हुए थी। मैं गुमसुम रसोई के दरवाजे के बाहर छज्जे के नीचे दरवाजे की चैखट से पीठ टिकाए शोक में डूबा बैठा रहा।
   चांद कभी का डूब चुका था और सूर्योदय से पहले का हल्का उजास आकामें आर-पार पसर गया था। पर झोंपड़ों के भीतर और छज्जों के नीचे अब भी हल्का अंधेरा कायम था। उस धुंधले उजास में आंगन के कोनों और छज्जों के नीचे रखी चीजों पर अजीब सी मनहूसियत छाई थी। मैंने यों ही अपनी आंखों पर अंगुलियां फेरीं तो जानकर हैरानी हुई कि मेरी आंखें बिल्कुल सूखी थी। बस, भीतर कहीं गहरा दर्द था, जो शरीर के रोम-रोम में पसर गया था और आंखों की कोरों में जमे तनाव के कारण सिर में खासा भारीपन लग रहा था। 
    आखिर मां कुछ शान्त हुई। उसने रुआंसी आवाज में दो-तीन बार मुझे झोंपड़े के अंदर आ जाने को कहा, लेकिन मैं बिना कुछ बोले उसी तरह गुमसुम बैठा रहा। इस बीच मेरी बड़ी बहन मीरां जागकर मां के पास आ गई थी और बाहर बैठक में सोए लोगों के बीच से बड़ा भाई प्रभु भी जागकर आंगन में आ गया था। उसने एक नजर मुझे देखा, लेकिन बोला कुछ नहीं। हम दोनों के पास कहने को जैसे कुछ था भी नहीं। वह उदास था, कई दिनों की बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी के कारण चेहरे की रंगत अजीब-सी हो गई थी, चाल में भी एक अलग तरह की थकावट भर गई  थी। आंगन में आने के बावजूद वह हमारी ओर नहीं आया। परींढे से पानी का लोटा भरकर वह चुपचाप वापस लौट गया। 
     प्रभु के ओझल हो जाने के बाद भी मेरा ध्यान उसी पर अटका रहा। उसकी दशा और विवशता के बारे में सोचते हुए अचानक मेरी आंखों से आंसू निकल आए। मुझे इस बात की गहरी पीड़ा और ग्लानि-सी हो रही थी कि घर में इतनी बड़ी घटना हो गई और मैं इस सब से पूरी तरह अनजान बना रहा। सभी ने कितनी जरूरत महसूस की होगी  उस दौरान, पर मुझ तक संदेश पहुंचाने का कोई जरिया ही नही रहा होगा  इनके पास। भाई और घर के लिए मेरा दुनिया भर का ज्ञान और जानकारियां सब अकारथ हो गईं, जिनके बूते मैं इन आकस्मिक हादसों से सतर्क रहने या ईश्‍वर जैसी अदृश्‍य शक्ति के भरोसे निष्क्रिय बैठै रहने के प्रति घर के लोगों को सजग रहने की अक्‍सर सलाह देता रहा हूं।
    कुछ ही पलों में प्रभु बैठक में पानी का लोटा देकर वापस आंगन में लौट आया था। करीब आने पर मैंने उठकर भाई के चरण-स्पर्श किये और वापस अपनी जगह बैठ गया। वह भी सुखी  रहोका छोटा-सा आशीष देकर मेरे करीब बैठ गया। प्रभु के इस तरह पास आकर बैठने से मां और मीरां फिर से विलाप करने लगी थीं। बहन मीरां विधवा है, बस अपना कहने के नाम पर उसकी दस साल की एक बेटी है, पति की मृत्यु के बाद से मां और पिताजी ने उसे वापस उसकी ससुराल नहीं भेजा। परिवार में गमी के ऐसे मौकौ पर उसका दर्द और दोहरा हो जाता है। गीता धीमे रुआंसे स्वर में मां और मीरां को शान्त रहने का आग्रह करती रही, उसके कहने पर मां तो चुप हो गई, लेकिन मीरां का दर्दभरा विलाप अब भी जारी था। मैं गुमसुम-सा बैठा बहन की अव्यक्त पीड़ा को अंदर-ही-अंदर सोखता रहा।
    अपना चित्त शान्त होने के बाद मां ने गीता को चूल्हा सुलगाने के लिए कहा था। मीरां का विलाप अब कुछ कम हो गया था, पर वह हौले-हौले सिसक रही थी। गीता नै चूल्हा सुलगा लिया था, जिसकी वजह से रसोई के इस झोंपड़े में हल्का प्रका हो गया था। यों सूरज बेशक न उगा हो, लेकिन बाहर आंगन में अच्छा-खासा उजाला हो गया था। मां के आवाज देने पर मैं भी उठकर झोंपड़े के अंदर जाकर मां के पास ही आंगन में बिछी चटाई पर बैठ गया। भाई प्रभु अब भी बाहर बैठे रहे।  
     मां देर तक भाभी को याद करते हुए उसके एकाएक गुजर जाने पर अफसोस जाहिर करती रही और मैं चूल्हे में जलती लकडि़यों पर अपनी नजर गड़ाए चुपचाप सुनता रहा। बहन छोटी चरी लेकर बकरी का दूध निकालने चली गई और गीता चूल्हे पर चाय का पानी चढ़ाकर चाय-पत्ती और चीनी डालने की तैयारी में थी। इसी बीच मां के कहने पर प्रभु भी झोंपड़े के अंदर आ गया था। वह झोंपेड़े के बीच के खंभे का सहारा लेकर बैठ गया था। वह भी बिना कुछ बोले चूल्हे की जलती आग पर नजर टिकाए देख रहा। कुछ क्षण के लिए सभी की सांसें जैसे थम-सी गई थीं। मैंने बाहर आंगन की ओर देखा, जहां अब काफी उजाला था, लेकिन आज यह उजाला और दिनों से अलग और अनसुहाता-सा लग रहा था। मैंने तुरन्त उस ओर से नजर फेर ली। बहन मीरां इस बीच दूध लेकर वापस लौट आई थी। मेरा ध्यान फिर से प्रभु की ओर गया, जो अब भी गुमसुम-सा बैठा था।  
    मीरां ने चाय की प्याली मेरी ओर बढ़ाई, जिसे मैंने उसकी ओर देखते हुए थाम लिया। मां अब भी भाभी की बीमारी, उसे दिये जाने वाले उपचार और बीच-बीच में अपने ईश्‍वर को याद किये जा रही थी। मीरां ने एक लोटे में कुछ चाय और चार खाली प्याले भाई को पकड़ा दिये थे, जिन्हें लेकर वह फिर बैठक की ओर निकल गया था। मैंने चाय का एक घूंट लेते हुए मां से सवाल किया, ‘‘आखिर हुआ क्या था?’’
    मां ने जो कुछ बताया, उसका सार यही था कि भाभी को कुछ अरसा पहले बुखार आया था, जो सारे घरेलू उपचार के बाद भी टूट नहीं रहा था, वैद्यजी की दवाई और उपचार का भी कोई असर नहीं हुआ। प्रभु को पास के कस्‍बे उत्तरलाई भेजकर कंपनी अस्पताल के कंपाउंडर खैराज को भी दिखाया, उसने कुछ अंग्रेजी दवाइयां भी लाकर दी, लेकिन उसकी हालत तो बिगड़ती चली गई, कोई सुधार हुआ ही नहीं। और सारे ब्यौरे के बाद मां के ये आखिरी शब्द थे - ‘‘रामजी, उणरै भाग में इत्‍तौ ई दांणो-पांणी घाल्‍यौ, लालू ... ने उसके हिस्से में इतना ही दाना-पानी डाला था, लालू। नेकाळै री मांदगी सूं तौ ईस्‍वर ई बंचावै भलांई, दूजौ तौ किणरै स्‍सारै... इत्‍ता ई दिनां रौ जीवणौ लिख्‍योड़ौ हो उणरी किस्‍मत में...”(रामजी ने उसके भाग्‍य में इतना ही दाना-पानी डाला था, निकाले’ (टायफाइड) की बीमारी से तो भगवान ही बचाए तो भले बचे। शायद इतने ही दिनों का जीना लिखा था उसकी किस्मत में... ”) और इतना कहते हुए उसका गला भर आया था। 
    ईश्‍वर को इस तरह बार-बार बेवजह हवाले में लाना और सारी जिम्मेदारी उसी पर डालकर अलग जा खड़े होना, मुझे कभी रास नहीं आता, मैं जल्दी ही इससे उकता जाता हूं। जानता हूं कि ऐसे मौकौ पर ऐतराज करने से शायद ही कोई अंतर पड़े, पर परिवार के किसी सदस्य की ऐसी अकाल मृत्यु पर इस तरह के बहाने बार बार दोहराना कचोट पैदा करते हैं। भाभी की बीमारी के प्रसंग में मां का इस तरह ईश्‍वर की आड़ लेना मुझे कुछ नागवार-सा लग रहा था और मैं झुंझलाकर बोल पड़ा - ‘‘अरे ईश्‍वर की बात छोड़ो मां, ये बताओ न कि जब घर में भाभी की तबियत नहीं संभल रही थी, तो उसे उपचार के लिए कहीं ले क्यों नहीं गये? उसकी दवाई-पानी को लेकर कुछ किया क्‍यों नहीं...?’’ 
       ‘‘कियौ क्‍यूं कोनी, बेटा!... जे कोई रौ अंजळ-पांणी ई नीं ब्ंच्‍यौ हुवै, जीवण रा दिन ई पूरा व्‍हेग्‍या व्‍है तौ कोई कांई कर सकै भला...?” (किया क्‍यों नहीं बेटे, पर अगर किसी का अंजल-पानी ही न बचा हो, जीने के दिन ही पूरे हो गये हों, तो कोई क्या कर सकता है? ...और फिर अपनी सफाई देते हुए जोड़ा कि उन्‍से जो हो सका, सब कुछ तो किया ही - कंपाउंडर खैराज घर आकर बराबर देखते रहे, दवा भी देते रहे,  खुद उसने भगवान रामदेवजी पूरी मनौती की, उनके देवरे में हरवक्त घी के दिये की ज्योति जलाए रखी, स्वामी सोमगिरी जी से झाड़-फूंक दिलवाई, इस तरह की बीमारी के जानकार सयानों को घर बुलाकर दिखाया, तोलियासर भैरूंजी की जात भी बोल दी, लेकिन... और इसी तरह के जाने कितने ब्‍यौरे देती रही...  
         ‘‘पण किणी अस्‍पताळ में ले जाय नै डॉक्‍टर सूं इलाज नीं करवायौ... कांई खैराज आ सलाह कोनी दीवी कै मरीज नै बडै अस्‍पताळ ले जाय नै दिखाणौ चाहीजै?” (“लेकिन किसी अस्पताल में ले जाकर डॉक्टर से इलाज नहीं करवाया... क्या खैराज ने ये सलाह नहीं दी कि मरीज को शहर के बड़े अस्पताल ले जाकर दिखाना चाहिये?’’) मैंने झुंझलाते हुए मां से पूछा।    
        ‘‘अबै सलाह देवण में तौ किणरौ कांई लागै बेटा, वौ ई तौ डाक्‍टर री बतायोड़ी दवाई देवै हौ नीं। वैदराज जी री गोळ्यां ई चालै ही, खुद खैराज सूयां ई लगाई, अर सेवट जद नीं ताबै आई तौ लारै जावतौ कैवण लाग्‍यौ के बडै अस्‍पताळ ले जावौ...” (“अब सलाह देने में तो किसी का क्या जाता है, बेटा! वो भी तो डॉक्टर की बताई दवाई ही दे रहा था न! वैद्यराज जी की गोलियां भी चल ही रही थीं, खुद खैराज ने अपने हाथ से सुइयां दीं, आखिर जब तकलीफ नहीं पकड़ में आई तब जाते-जाते बोला कि इसे बाड़मेर लेजाकर बड़े अस्पताल में दिखाओ...।’’
         ‘‘ तो फिर ले क्यों नहीं गये अस्पताल....?’’
         ‘‘...अब तू ही बता, जिकां नै बड़े अस्पताल ले जावै,  वां मांय सूं कित्‍ता-क वापस सही-सलामत घरां आवै - किसने री लुगाई नै लेग्‍या हा, जिणी दो दिन पछै लाश ही पाछी आई, सेठ निहालचंद तो पईसांवाळौ आसामी है, उणरै जवान बेटै रै इलाज में कांई कमी रैवणी ही अर कित्‍ती-सी उमर ही लाई री, फेरूं ई वौ बंच्‍यौ तौ कोनी... चौखाराम री बैन नै बाड़मेर लेग्‍या हा, आ सागण ई तकलीफ ही, फेर वा क्‍यूं मरी...?” बोलते-बोलते मां का स्वर रोष से कांपने लगा था। कुछ क्षण चुप रहकर फिर निश्‍वास छोड़ते हुए बोली, ‘‘जिणरै जीवण में राम जी इत्‍ता ई  दिन घाल्‍या व्‍है,  उणनै जीवायां राखणौ किणी मिनख रै बस री बात नीं व्‍है...।"    
     मां से मिली इस जानकारी के बाद उससे और कुछ जानने को बाकी नहीं बचा था। मैं उसी तरह चिन्ता में डूबा चूल्हे में बुझती आग और अंगारों पर घिरती राख की परतों को देखता रहा। चूल्हे के पास चुपचाप बैठी गीता शायद इन दिनों अपने गर्भ के पूरे दिनों में थी, उससे नजर मिली तो वह एक हल्की-सी फीकी मुस्कान के साथ शान्त भाव से मेरे मुंह की ओर देखती रही।
     भाभी की अकाल मृत्यु और मां की अपनी सफाइयों-मजबूरियों पर मन-ही-मन विचार करता रहा, लेकिन इस बेतुकी सोच से जल्दी जी उचट गया कि सब रामजी के जिलाए जीते हैं। यह बात कहते हुए खुद मां के ही स्वर में एक तरह का अविश्‍वास और रूखापन साफ झलक रहा था। लग रहा था कि मां सच को छिपाने और खुद की झेंप मिटाने के लिए ईश्‍वर की आड़ ले रही है। अन्यथा यही वह मां है, जो कई बार राम के नाम पर की जाने वाली हमारी बहानेबाजी पर गुस्सा करते हुए कहा करती थी - काम तो हाथ सूं करियां व्‍है लाडेसर, जिग्‍यां  पकड़ नै बैठण वाळां नै तौ भगवान ई नीं जीमावै!
     इस दौरान प्रभु बैठक में चाय पिलाकर वापस लौट आये थे और इस बार वे रसोई के अंदर न आकर बाहर उसके छज्जे के नीचे थांभली का सहारा लेकर बैठ गये थे। वे मां के साथ मेरी जो बात हो रही थी, उसे सिर नीचा किये सुन रहे थे।
     मां की बात पूरी होते-होते अनायास मेरे मुंह से यह बात निकल ही गई - ‘‘तो इसका मतलब तो यही हुआ कि सब लोग बैठे इंतजार करते रहे कि भगवान आकर भाभी को ठीक कर देंगे? मुझे हैरानी है मां कि सारे घरवालों की अक्ल पर एक साथ पानी कैसे फिर गया? असल में...’’ मैं कुछ और कड़वी बात कहने वाला था, लेकिन बीच ही में मां  की सिसकियों और विलाप ने रोक लिया। प्रभु का चेहरा कुछ सख्त पड़ता-सा लगा। बहन मीरां को भी मेरी बात शायद अच्छी नहीं लगी, वह उदास-सी मेरी ओर देखने लगी थी। गीता ने हल्के-से गर्दन हिलाकर यही संकेत दिया कि मैं इस पर अब अधिक कुछ न कहूं। मुझे अपनी बात बीच में ही छोड़ देनी पड़ी, यों भी अब किसी को कुछ कहना या उलाहना देना अकारथ था। कुछ और आगे सोचता हूं तो आर्थिक रूप से टूटे घर की हालत अपनी लाचारगी खुद बयान करती दीखती है। इसके बावजूद जाने क्यों किसी बात को बेमतलब ओढ़े रहना या असलियत से बचने के लिए बहाने तलाश करना, मुझे हमेशा असंगत और असहनीय लगता रहा है। ऐसे अवसरों पर अमूमन मुझे एक झुंझलाहट आ घेरती है और मैं अपने पर काबू नहीं रख पाता। 
             सवेरे का ठंडा पहर होते हुए भी इसी अनसोचे आगत की अमूर्त चिन्ता में आज घर के वातावरण में एक अजीब-सा तनाव भर गया था और मां का विलाप उसे और बोझिल बनाए दे रहा था। प्रभु एक हल्की-सी खांसी छोड़ते हुए उठ खड़ा हुआ और बिना कुछ कहे आंगन से बाहर निकल गया। बहन मीरां चूल्हे के आगे की बेवनी में चिमटे से राख को उलटते-पलटते एक अंतहीन अंधेरा अपने भीतर छुपाए गुमसुम बैठी थी। मैं खुद भी कुछ न कर पानेकी अकथ बेचारगी में अपराध-बोध से घिरा, मन की पीड़ा को कलेजे में दबाए देर तक चुपचाप बैठा रहा।
     बाहर सूरज ने चौतरफ अपनी किरणें पसार ली थीं। चूल्हे में अधबुझे-से अंगारों का गरमास अब भी बरकरार था। गीता ने मुझसे नजर मिलाते हुए अपने गर्भ में पलते गुमेज पर एक दृष्टि डाली और चूल्हे को फिर से सचेत करने की तजवीज में अंगारों को पर दो सूखे कंडे रख दिये। चूल्हे पर दूध की हांडी चढ़ाते हुए उसने फूंकनी से अंगारों में फूंक दी तो रोशनी की एक तीखी चमक के साथ आग की लपटें हांडी के पैंदे को गरमाने लगी। मुझे रह-रह कर भाभी की जुझारू छवि याद आती रही, जो कभी गीता की ही तरह इसी चूल्हे को सचेत बनाए रखने में जुटी रहती  थी - उसका जिजीविषा से भरा मुस्कुराता चेहरा मेरी स्मृति में उभरता और अगले ही क्षण फिर धुंधला पड़ जाता। यह बात किसी फांस की तरह कलेजे में धंसी थी कि मुश्किल की उस घड़ी में भाभी अेकले अपनी जि़न्दगी के लिए जूझती रही और परिवार के लोग उसे अबार लेने का कोई कारगर जतन नहीं कर सके और  न मैं ही उस मौके पर मौजूद रह सका, इसका मलाल मुझे आज भी कम नहीं।     
(मूल राजस्‍थानी से स्‍वयं कथाकार द्वारा अनुदित)  
-    नंद भारद्वाज