Monday, November 5, 2018


उजाले के उत्‍सव से बदलता रिश्‍ता 

·            नन्द भारद्वाज
       
भारतीय जनमानस का सबसे बड़ा लोक-उत्सव दीपावली सदियों से लोक जीवन में उजाले के उत्सव का ही पर्याय माना गया है। यद्यपि हमारे सभी उत्सव और त्यौहार सदियों पुरानी कृषक संस्कृति की ही उपज रहे हैं और उनसे जुड़े अनुष्ठान भी उसी की ओर संकेत करते हैं, लेकिन महानगरीय सभ्यता में इन उत्सवों का अपना अलग अंदाज भी बनता-बदलता रहा है। उत्सवधर्मिता हमारे स्वभाव का आवयक अंग रही है और उसी के चलते महानगरीय जीवन में इन पारम्परिक उत्सवों को मनाने का तरीका भी उत्तरोत्तर अधिक खर्चीला, प्रदर्शनप्रिय और आडम्बरपूर्ण होता गया है। यह उसी प्रवृत्ति और प्रक्रिया का परिणाम है कि आज दे के प्रायः सभी महानगरों का जनमानस उसी आदत का अभ्यस्त हो गया है। यह उसी प्रवृत्ति का परिणाम है कि दीपावली जैसे उजाले के प्रतीक पर्व के इर्द-गिर्द आडम्बर और अज्ञानता का काला आवरण और गहरा हो गया है, बावजूद इसके कि आज हर महानगर के  बड़े बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान्र, ऐतिहासिक इमारतें, सार्वजनिक स्थल, सड़कें और मुख्य बाजार रंग-बिरंगी रौनियों की चकाचैंध में दमकने लगते हैं और अपने को दूसरों से इक्कीस साबित करने की होड़ में अपने भीतर के अंधेरे को लगातार अनदेखा किये रहते हैं। इन्हीं बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों, व्यापारिक मेलों, सजे-धजे पर्यटन स्थलों, पांचसितारा होटलों और बहुमंजिले मॉल्स ने मिल कर एक ऐसी कार्निवाल कल्चर का निर्माण कर दिया है कि उसके चलते बड़े शहरों के एक वर्ग-विशेष की आक्रामक जीवन-शैली से अपनी संस्कृति और लोक-उत्सव की परम्परा को बचा कर रखना कतई आसान नहीं रह गया है।    
      यह ठीक है कि एक सांस्कृतिक परम्परा और रिवाज से जुड़ा समाज अपनी लोक-मान्यताओं  और परम्परा के अनुसार उसी अन्तःप्रेरणा और उमंग से उन्हें स्वयं मनाता और उनसे आनंदित होता आया है। उत्सव विशेष को मनाने की प्रेरणा, उससे जुड़ी लोक-मान्यता और अनुष्ठान की प्रक्रिया भी कमोबे एक-सी रहती आई है।  अपनी आर्थिक अवस्था और अभिरुचि के अनुरूप उसे मनाने के परिमाण और मात्रा में बेक अन्तर रहा हो, उससे प्राप्त होने वाले पारिवारिक सुख, पारस्परिक सद्भाव और आत्मिक आनन्द में शायद ही कोई अन्तर रहा हो।
     राजस्थान का गुलाबी नगर जयपुर सदा से ही उजाले के उत्सव दीपावली को अपने अलग अंदाज से मनाने के लिए महूर रहा है - यहां के प्रमुख चैराहों और रास्तों पर सजने वाले रौानी के दरवाजों, रंग-बिरंगी रौनियों से सजने वाले बाजारों, ऐतिहासिक इमारतों और जगमगाती चैड़ी सड़कों पर इस उत्सव का जो रूप निखर कर आता है वह अक्सर यह भ्रम पैदा करता है कि अब इस शहर के लोक-जीवन में अंधेरे के लिए कोई स्थान नहीं रह गया है, चहुंओर शान्ति और सुख-समृद्धि का ही बोलबाला है। जबकि पुतैनी शहर की गलियों, कच्ची बस्तियों और शहर की सीमा से शुरू होने वाले देहात की वास्तविकता कुछ और ही कहानी बयान करती है। वहां आज भी अशिक्षा, असमानता, अन्धविवास, बेरोजगारी, गरीबी, जीवन की बुनियादी सुविधाओं का अभाव, आर्थिक शोषण, स्त्रियों के साथ अमानवीय बरताव और इन सभी तरह के अभावों के साये में पनपता अंधेरा इतना गहरा और विकराल है कि इस अवस्था में जीने वाले लोगों ने इसी को अपनी नियति मान लिया है। यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि बड़े शहरों की कार्निवाल कल्चर की चकाचैंध और बाजारों की रंगीनियां तो हमें आकर्षित करती हैं, लेकिन उनके साये में पलते आर्थिक अपराध, बेईमानी, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, लूट-खसोट, गलाकाट स्पर्धा, भेदभाव आदि पर एक मिनट के लिए भी नजर नहीं टिकती। 
      जीवन की इन कड़वी सच्चाइयों के बावजूद नगरीय और देहाती लोक-जीवन में जितना मान और महत्व इस उत्सव को दिया जाता है, उतना शायद ही किसी अन्य को दिया जाता हो। देहात का तो यह सबसे बड़ा लोक-उत्सव माना जाता है, जिसकी पूरे वर्ष प्रतीक्षा रहती है। दरअसल इसकी तैयारियां दहरे के बाद से ही शुरू हो जाती हैं - घर की साफ-सफाई, रंग-रोगन, उत्सव के लिए आवयक चीजों का इन्तजाम, नये कपड़ों की खरीद, बच्चों के लिए आतिबाजी  आदि कितने ही काम हैं जिन्हें लोग पूरे मन और मनोयोग से करते हैं। देहात में जिनके घर कच्चे होते हैं, वे भी इस अवसर पर अपने घरों को विशेष रूप से सजाते हैं। वे घर की दीवारों को गोबर से लीप कर उन्हें नया रूप देते हैं, उन लीपी हुई दीवारों और आंगन पर सफेदी का आधार बना कर रंगों से नये मांडणे बनाये जाते हैं और घर को सजा कर इस तरह तैयार किया जाता है कि कम-से-कम वह दीपावली को तो नया और तरोताजा दीखे ही। त्यौहार के प्रमुख दिनों में शाम होते ही घर में मिट्टी के दीये जलाए जाते हैं, रात में देवी लक्ष्मी और भगवान गणे की पूजा की जाती है। इस अवसर पर घर में विशेष रूप से नये पकवान तैयार किये जाते हैं और परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर उनका सेवन करते हैं। ऐसी भी लोक-मान्यता है कि उस दिन घर का कोई सदस्य परिवार से दूर न रहे। जो लोग काम-काज के सिलसिले में घर से दूर किसी अन्य जगह पर रहते हैं, उनसे भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे दीपावली के अवसर पर अपने घर अवय पहुंच जाएं। इसी तरह की लोक-मान्यताएं कमोबे हर समाज में अपने त्यौहारों को लेकर प्रचलित रही हैं और ये सभी त्यौहार उसी परम्परा का निर्वाह करते हुए पूरे हर्षोल्लास से आज भी मनाये जाते हैं।
    समय बदलने के साथ इन त्यौहारों को मनाने के तौर-तरीकों में बहुत से बदलाव आ रहे हैं। इन बदलावों के पीछे बहुत से कारण हैं और कुछ तो अत्यन्त चिन्ता उपजाने वाले, जिन पर अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया जा सका तो इसके दूरगामी परिणाम शायद ही अच्छे हों। लेकिन सारे बदलाव नकारात्मक ही हों, ऐसा नहीं है। हम जानते हैं कि बदलाव की इस प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता और न रोका जाना चाहिए - तकनीकि विकास और जीवन-शैली में आने वाली तब्दीलियों के अनुरूप सामाजिक जीवन में परिवर्तन आना स्वाभाविक है, इससे विकास की प्रक्रिया को गति मिलती है, मनुष्य की जीवन-शैली में परिवर्तन आता है, लेकिन यही परिवर्तन यदि हमारे जीवन-मूल्यों, पारिवारिक रितों और सामाजिक सद्भाव पर विपरीत असर डालने लगे तो यह निचय ही चिन्ता की बात है और इस अर्थ में इस परिवर्तन की दिाा पर नजर रखना जरूरी हो जाता है।
      बढ़ती व्यावसायिकता के चलते एक खतरा इस बात का भी है कि यही परिवर्तन उन त्यौहारों को उनके मूल स्वरूप से इतना दूर ले जाएंगे कि इन्हें मनाने की बुनियादी भावना ही शायद नष्ट हो जाय और बाहरी व्यावसायिक आकर्षणों से जो रूप सामने आएगा उसका हमारी जातीय संस्कृति और लोक-जीवन से शायद कोई रिश्‍ता ही न रह जाय। दरअसल त्यौहार या उत्सव आज व्यावसायिक गतिविधियों के लिए सबसे बड़े आकर्षण का केन्द्र बनते जा रहे हैं - दीपावली, हरा, दुर्गापूजा, होली, ईद, क्रिसमस आज व्यावसायियों के लिए ऐसे लुभावने अवसर हो गये हैं कि हर कोई उसका तत्काल लाभ ले लेना चाहता है। हर शहर और बड़े कस्बे का बाजार इन उत्सवों को व्यावसायिक मेले की शक्ल में ढाल देने पर आमादा है। महानगरों में तो यह और भी बड़ा आकार ग्रहण करता जा रहा है। हर साल महानगर की नई कॉलोनियों में सजने वाले दहरे के मेले में रावण का आकार और कद कुछ और ऊंचा हो जाता है और उसमें आयोजित होने वाली गतिविधियों और आतिबाजी का उत्सव के मूल रूप से कोई लेना-देना नहीं रह जाता। मुंबई के फिल्मी तमाशे की तर्ज पर गुजरात का गरबा और डांडिया रास पाचात्य धुनों पर सवार होकर जयपुर-दिल्ली ही नहीं, इस कार्निवाल कल्चर की मांग पर कहीं भी डाका डाल सकता है। यह कोई नहीं पूछता कि इस अंचल या प्रदे के अपने भी कुछ लोकप्रिय कलारूप होंगे? देशों और प्रदेशों के बीच अपने कलारूपों का सांस्कृतिक विनिमय एक अच्छी और स्वस्थ परम्परा है, लेकिन वह अपनी संस्कृति और कलारूपों की उपेक्षा करके तो नहीं निभेगी।
     क्या यह चिन्ता की बात नहीं है कि आम तौर पर महानगरों में अब दीपावली जैसे पर्व को मनाने में आम नागरिक की भूमिका बहुत गौण होकर रह गई है। अब यह बाजार तय करता है कि आप अपने घर की सजावट किस तरह की रखेंगे, आप किस काट के कपड़े पहनेंगे, क्या खाएंगे और अपनी सहज जीवन-प्रक्रिया को छोड़कर किन आरोपित तौर-तरीकों को अपनाने के लिए बाध्य होंगे। व्यक्ति के विकास, उसके पारिवारिक सुख और पारस्परिक सद्भाव में वैसे भी बाजार की भला क्या दिलचस्पी हो सकती है? चिन्ता की बात यही है कि वैयक्तिक सुख और आत्मिक आनन्द से भी यदि उसे वंचित कर दिया जाए तो उत्सव का उसके निजी जीवन में क्या महत्व रह जाएगा? मुझे तो यह भी लगता है कि यदि इस पर समय रहते बाजार ने भी अपनी भूमिका पर न सोचा और अपने रुख को ठीक न किया तो स्वयं बाजार भी अपने को कितना बचा पाएगा, कहना कठिन है।
     निस्संदेह दीपावली रौनी का सबसे बड़ा लोक-उत्सव है और उस रौशनी के प्रति हर व्यक्ति के मन में आकर्षण भी स्वाभाविक है लेकिन कोई भी व्यक्ति स्वयं को उसके प्रति तत्पर, ऊर्जावान और सृजनशील तभी तक बनाए रख सकता है जब तक वह व्यापक लोकहित के साथ अपना रिश्‍ता ठीक तरह से बनाए रखे औैर रौनी के नाम पर परोसे जाने वाले आडम्बरों और छद्मों से निरन्तर सतर्क रहे। गलियों और बस्तियों में पसरे अंधेरे से भी तभी लड़ा जा सकता है जब नये ज्ञान-विज्ञान और रौनी के अपने साधन हमारे पास हों और उचित समय पर उनके सही उपयोग की समझ भी। परिवर्तन और सृजन की प्रक्रिया में नये विचारों, नयी तकनीक और नये नजरिये की अपनी अहमियत है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक परम्परा और लोक-संवेदना से कट कर हम कुछ भी करने का प्रयास करेंगे तो वह कितना ग्राह्य और गुणकारी साबित होगा, इसका फैसला तो एक लोकतांत्रिक समाज में जागरूक लोक ही तय करेगा।
***

Saturday, August 11, 2018




* नंद भारद्वाज //
सूर्यबाला के व्‍यंग्‍य-लेखन की धार
·        
हिन्‍दी की जानी-मानी रचनाकार डॉ सूर्यबाला की केन्‍द्रीय पहचान एक कथाकार के रूप में ही रही है। कथाकार के रूप में अब तक उनके आधा दर्जन उपन्‍यास, एक दर्जन से भी अधिक कहानी संग्रह और कितने ही चयन-संकलन पाठकों के हाथों में पहुंच चुके हैं। वे पत्र-पत्रिकाओं में भी बराबर लिखती रहती हैं। कथा-लेखन की इस सुदीर्घ प्रक्रिया में व्‍यंग्‍य और व्‍यंजना को अरसे तक उन्‍होंने एक शैली और बयान की तकनीक के रूप में तो अवश्‍य अपनाया, लेकिन उसे एक अलग विधा के रूप में अपनाने का उछाव बहुत बाद में उत्‍पन्‍न हुआ। उनके उपन्‍यासों और कहानियों में मानवीय प्रेम, पीड़ा, अंतर्द्वन्‍द्व, अवसाद, करुणा और मानवीय संबंधों की जटिलता शिद्दत के साथ व्‍यक्‍त होती रही है, मानवीय संवेदना की गहन अभिव्‍यक्ति उनके कथा-लेखन की अनूठी विशेषता मानी जाती है। अपनी कहानियों में व्‍यंग्‍य और व्‍यंजना के प्रति बढ़ते इस रुझान को लेकर वे स्‍वयं यह बात कहती भी हैं – “शुद्ध व्‍यंग्‍य लेखों से अलग मेरी कहानियों में भी जहां  सिचुएशन्‍स ने झोली फैलाई, मेरे व्‍यंग्‍य ने अलादीन के चिराग के जिन्‍न की तरह हुक्‍म बजाया।  ऐसी कहानियों में ‘बाऊजी और बंदर’, ‘एक स्‍त्री के कारनामे’, ‘होगी जय पुरुषोत्‍तम नवीन’, ‘सुनंदा छोकरी की डायरी’, ‘मातम’, ‘मानुषगंध’, ‘गजानन बनाम गणनायक’, ‘दादी और रिमोट’, ‘शहर की सबसे दर्दनाक खबर’ आदि प्रमुख हैं, जिनमें ‘सपोर्टिंग आर्टिस्‍ट’ होने के बावजूद कहानी की शक्ति और सौन्‍दर्य व्‍यंग्‍य के कंधों पर टिका है।" यही नहीं, वे यह भी मानती हैं कि व्‍यंग्‍य या व्‍यंजना कोई बाहरी या आयातित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि रचनाकार की अपनी सहज-स्‍वाभाविक प्रक्रिया है, जो उसके जीवन-अनुभव और विषयवस्‍तु की आंतरिक मांग से उपजती है। इस प्रक्रिया में व्‍यंग्‍य की उपज का हवाला देते हुए वे कहती हैं – “वहां मानवीय संबंधों, द्वंद्व-द्विधाओं और विसंगतियों से उपजे प्रतिरोध अवसाद की तलहटी में गहराते जाते हैं। एक भंवर की तरह मथते हैं और देर तक प्रतीक्षा करते हैं, काफी लंबी, एक तरह से यह उनकी प्रकृति होती है, लेकिन व्‍यंग्‍य का जुनून सीधे सतह पर हलकोरता चोट करता है और फौरन का फरमान जारी करता है। बेचैनी और तड़फड़ाहट प्राय: हर विधा की रचना में बराबर होती है, व्‍यंग्‍य की प्रतिक्रिया भी दोनों तरफ बराबर होती है, लेकिन प्रतिक्रिया और प्रतिरोध की प्रकृति में अंतर होता है। एक गहरे अवसाद और अंतर्द्वन्‍द्वों के बीच नीड़ का निर्माण करता है, दूसरा त्‍वरित एक्‍शन लेता है।"  
    इस त्‍वरित और तात्‍कालिक प्रतिक्रिया से उपजे व्‍यंग्‍य को सूर्यबाला बेशक ‘अचानक की उपज’ या ‘अनायास की उपलब्धि’ कहती हों, लेकिन जीवन की विसंगतियों और विद्रूप से अनवरत संघर्ष करती उस स्‍त्री-रचनाकार के लिए अपनी रचनाशीलता को महज संजीदगी और संवेदनशीलता तक सीमित रख पाना आसान नहीं होता, उसे व्‍यंग्‍य–विनोद के लिए रास्‍ता निकालना ही होता है, जो उसकी रचनात्‍मकता और संप्रेषण की नयी संभावनाएं खोजता है। सूर्यबाला अपनी इन व्‍यंग्‍य रचनाओं को बेशक इसी प्रक्रिया और जरूरत की उपज मानती हों, लेकिन व्‍यंग्‍य रचना की इस प्रक्रिया को साधना इतना आसान भी नहीं होता। धूमकेतु की तरह प्रकट होता आईडिया जिस गति और गहराई से रचना में पसराव लेता है और उसके कलेवर में समय-समाज की वे तमाम विसंगतियां खुलने लगती हैं, तो उस बयानगी में सहज परिहास-सी लगने वाली उक्तियां अपनी व्‍यंजना में और गहरी मार करने लगती हैं। उनसे गुजरता हुआ पाठक कई बार विस्मित और बेचैन-सा होकर रह जाता है। असल में व्‍यंग्‍य का काम ही है विसंगतियों और मानवीय दुर्बलताओं पर गहरी चोट करना। यह काम किसी वैचारिक लेख या व्‍याख्‍यान के माध्‍यम से उतना असरकारी नहीं होता, जितना एक कथा के ताने-बाने में ढलकर आकार लेता है और इस बात को कुबूल करते हुए सूर्यबाला कहती भी हैं कि ‘मेरे पूरे लेखन में ‘व्‍यंग्‍य’ ने बेहद अहम भूमिका निभायी है, विधा के रूप में भी और शैली के रूप में भी।‘    
    व्‍यंग्‍य विधा में अब तक सूर्यबाला की आधे दर्जन से अधिक कृतियां सामने आ चुकी हैं, जिनमें प्रमुख हैं ‘अजगर करे न चाकरी’, ‘धृतराष्‍ट्र टाइम्‍स’, ‘देश सेवा के अखाड़े में’, ‘भगवान ने कहा था’, ‘पत्‍नी और पुरस्‍कार’, ‘मेरी प्रिय व्‍यंग्‍य रचनाएं’, ‘प्रतिनिधि व्‍यंग्‍य रचनाएं’ और ‘यह व्‍यंग्‍य कौ पंथ’। विषय वैविध्‍य की दृष्टि से इन व्‍यंग्‍य रचनाओं का फलक बहुत बड़ा है। हास्‍य या व्‍यंग्‍य की सबसे बड़ी खूबी या कामयाबी इस बात में छुपी होती है कि रचनाकार स्‍वयं अपने व्‍यक्तित्‍व और कर्म को कैसे और कितना व्‍यंग्‍य के निशाने पर लेता है - अपनी आदतों, प्रवृत्तियों और दुर्बलताओं पर कितना परिहास कर पाता है और एक स्‍त्री रचनाकार के लिए तो यह कर पाना निश्‍चय ही आसान नहीं होता, जो पहले से ही इस पुरुष-प्रधान समाज में जगह-जगह बेढब हालात का सामना कर रही होती है, पग-पग पर जिसे उसकी मर्यादाएं और सीमाएं याद दिलाई जाती हैं। एक स्‍त्री या लेखक होने को लेकर कोई और क्‍या व्‍यंग्‍य या परिहास करेगा, जब स्‍वयं सूर्यबाला जैसी समर्थ लेखिका ऐसे औचक अवसरों, स्थितियों, महत्‍वाकांक्षाओं और दुर्बलताओं को बेपर्द करने पर तुली बैठी हों। वह चाहे पचास या साठ की आयु पार लेखक-लेखिकाओं के मान-सम्‍मान का मसला हो, किसी लेखिका (जो एक गृहिणी, पत्‍नी और अपने बच्‍चों की मां भी है) के पुरस्‍कृत होने की खबर से घर-पड़ौस में बना ऊहापोह का माहौल हो (कि ये क्‍या हो गया!) या साहित्‍य में स्‍त्री-विमर्श और महिला-दिवस जैसे सतही समारोहिक आयोजन, जहां अमूमन स्‍त्री को श्रेय-सम्‍मान देने की बजाय उसका दिखावा अधिक होता है।
    एक लेखिका के रूप में सूर्यबाला जी के वैचारिक सोच और स्‍वभाव की बड़ी खूबी यह है कि अपने पारंपरिक सनातन संस्‍कारों के बावजूद अपने लेखन और संवाद में वे लोकतंत्र और खुलेपन को पूरा स्‍पेस देती हैं। मिथकीय मान्‍यताओं, पारिवारिक रिश्‍तों और प्रचलित लोक-विश्‍वास के प्रति पूरा सम्‍मान का भाव रखते हुए वे व्‍यक्ति की गरिमा, वैज्ञानिक सोच और जीवन में नवाचार की पुरजोर हिमायत करती हैं। उनकी ऐसी व्‍यंग्‍य रचनाओं में ‘भगवान ने कहा था’ और ‘गजानन बनाम गणनायक’ विशेष रूप से उल्‍लेखनीय हैं। व्‍यंग्‍य जैसी शैली और विधा में इस प्रक्रिया को सीधे-सीधे साध लेना आसान नहीं होता, वहां न तर्क संभव है और न विवेचन। उन रूढ़ संस्‍कारों,  अन्‍तर्विरोधी मान्‍यताओं और जड़ धारणाओं को जीवन के व्‍यावहारिक अनुभवों, नाटकीय दृष्‍टान्‍तों और मानवीय विवेक पर भरोसा रखते हुए उनसे उपजने वाली जटिल और विडंबनापूर्ण स्थितियों को धैर्य से उजागर करना लेखक का प्रमुख लक्ष्‍य होता है। व्‍यंग्‍य निश्‍चय ही इस प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका अदा करता है। सूर्यबाला ने अपनी इन व्‍यंग्‍य कथाओं में मानवीय स्‍वभाव और सनातन संस्‍कारों वाले ऐसे अनेक मसलों को बखूबी उजागर किया है।
    सम-सामयिक जीवन-स्थितियां और राजनैतिक माहौल व्‍यंग्‍य-लेखन के लिए सबसे उर्वर जमीन मानी जाती है, सूर्यबाला ने इस उर्वर धरा का अपेक्षाकृत कम उपयोग किया है, पर जहां किया है, वहां जी खोलकर किया है और इससे उनके कथा-लेखन में अलग तरह की चमक और धार उत्‍पन्‍न हुई है। सन् 2015 के मध्‍य में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके नये व्‍यंग्‍य-संग्रह ‘यह व्‍यंग्‍य कौ पंथ’ की व्‍यंग्‍य रचनाएं निश्‍चय ही अपने सम-सामयिक सामाजिक-राजनीतिक परिवेश की विसंगतियों पर प्रभावशाली प्रहार करती हैं। इस उलझे हुए परिदृश्‍य के बारीक ब्‍यौरे में हम न भी जाएं, तब भी यह याद दिलाने की जरूरत शायद ही पड़े कि सन् 2015 तक आते-आते हमारे समय की राजनीति ने देश की लोकतांत्रिक संरचना, सामाजिक समरसता और देश की अर्थ-व्‍यवस्‍था को किस विकट मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस संग्रह में ‘सिफर हो गयी राजनीति और सूत उवाच’, ‘अथ अकर्मण्‍य–यज्ञ-उपदेशामृत’, ‘जन-आकांक्षा का टाइटिल सांग’, ‘दल-निर्माण की पूर्व संध्‍या पर’, ‘यह देश और सोनिया गांधी’ आदि व्‍यंग्‍य कथाएं देश की इसी दीन-दशा का आख्‍यान बयां करती हैं और इस बयानगी में वे किसी खास राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं खड़ी दिखतीं, एक लेखक के नाते उनके लिए लोकतंत्र और देशहित सर्वोपरि है। इसी देशहित का दावा करने वाले कर्णधारों के असली चरित्र और उनके आचरण की ओर इशारा करते हुए वे लिखती हैं – “कर्णधार क्‍या करें, उन्‍हें यही ठीक-ठीक समझ में नहीं आ रहा था। यूं करने को बहुत कुछ कर चुके थे। चुनाव जीत चुके थे। जीतने से पहले और बाद में पार्टी बदल चुके थे। सूखा, बाढ़़, दंगों और दुर्घटनाओं में मरे-खपे लोगों को मुआवजे बांट चुके थे। आतंकवादी गतिविधियों और सीमा पार चली गोलियों के लिए भी कई बार कह चुके थे कि ये बेहद कायराना हरकतें हैं। पार्टी के छंटे हुए अपराधी-सरगना के मरने पर उसे राष्‍ट्र की अपूरणीय क्षति बता चुके थे (वरना पार्टी वाले जीने नहीं देते)। देश के नाम संदेश भी प्रसारित कर चुके थे।" (यह व्‍यंग्‍य कौ पंथ, पृ 108)
    व्‍यावसायिक राजनीति के इन कलाबाज-कर्णधारों का अटल विश्‍वास है कि देश लगातार तरक्‍की कर रहा है, उन्‍होंने जीवन के हर क्षेत्र में विकास की गंगा बहा दी है, लेकिन लोग हैं कि वे अपनी रोजी-रोटी-कपड़ा-मकान जैसी घिसी-पिटी जरूरतों और आकांक्षाओं से उबर ही नहीं पा रहे। “कितने पिछड़े लोग, कितने दकियानूसी विचार! न उनकी आंखों में कोई सपना है, न मन में कोई उमंग। देश कहां का कहां चला गया कि देश में सब खुशहाल हैं, सारा देश मालामाल है, बर्गर, पिज्‍जा, थाई मंचूरियन से बाजार अंटा पड़ा है, शीतल पेयों की सनसनी ताजगी का समंदर ठाठें मार रहा है, लेकिन यह जन-आकांक्षाओं का चरम अमूल्‍यन नहीं तो और क्‍या है कि वह सूखी रोटी और चुल्‍लू भर पानी में ही छपकोरियां मारता रह जाए?” तो ये है देश के कर्णधारों की शुतुर्मुगी मानसिकता और सत्‍ता पर काबिज रहने की अदम्‍य लालसा, जिसे सूर्यबाला ने बेलिहाज उन्‍हीं की आत्‍म-बयानी में हूबहू दर्ज कर दिया है। कुछ इसी तरह की रंगत उनकी एक और प्रभावशाली व्‍यंग्‍य रचना ‘सिफर हो गई राजनीति और सूत-उवाच’ में भी देखी जा सकती है, जहां उन्‍होंने मिथकीय चरित्र सूतजी और उनके नैमिषारण्‍य स्थित शौनिक आदि ॠषियों की प्रैस वार्ता के माध्‍यम से मौजूदा राजनीति के चरित्र की वास्‍तविकता को उजागर किया है। इस रचना में उन्‍होंने सूतजी की जुबानी देश में तहस-नहस हो चुकी सामाजिक समरसता और आम जनता की भयावह दशा का खाका कुछ इन शब्‍दों में खींचा है – “यों कुल मिलाकर स्थिति सामान्‍य है और जबरदस्‍त अलग-अलग झंडों, अलग-अलग तंबुओं के नीचे, संगीनों के साये में दीन-हीन, निर्दोष और भोले-भाले बच्‍चे, औरत, मर्द भय से थर-थर कांपते हुए आत्‍मा की परमात्‍मा पर विजय के गीत गा रहे हैं। गीत के बोल अलग-अलग हैं, किन्‍तु भावार्थ एक ही है अर्थात् झंडा ऊंचा रहे हमारा, देश भाड़ में जाए सारा?…..” कहना न होगा कि सूर्यबाला जी के व्‍यंग्‍य-लेखन का यह मूल स्‍वर न होते हुए भी मौजूदा राजनीतिक हालात पर जिस तरह उन्‍होंने बेबाक और मारक व्‍यंग्‍योक्तियां की हैं, उसमें उनकी रचनाशीलता का एक प्रभावशाली पक्ष उभरकर सामने आता है। उल्‍लेखनीय बात यह कि हिन्‍दी के मौजूदा व्‍यंग्‍य लेखन और स्‍वयं उनकी अपनी कथा-रचनाओं में यह तेवर प्राय: कम ही देखने को मिलता है।          
    अंत में सूर्यबाला के व्‍यंग्‍य लेखन के बारे में जाने-माने व्‍यंग्‍यकार ज्ञान चतुर्वेदी की यह फ्‍लैप टिप्‍पणी मुझे बेहद सटीक लगती है कि “सूर्यबाला का व्‍यंग्‍य उनका अपना है और इस कदर अपना है कि उस पर महान् पूर्वजों की शैली या कहन की छाया भी नहीं है। वे अपना कद तथा अपनी छाया स्‍वयं बनाती हैं, जो उनके व्‍यंग्‍य को अपने पाठक से सीधे जोड़ देती है।"
***  
   
-    नंद भारद्वाज
Mob : 09829103455

Thursday, July 12, 2018


कहानी : 

  जीवन-सार  ·       
         
क्‍सर लोगों को यह कहते सुना है कि दुनिया में कोई दो इन्‍सान एक-सरीखे नहीं होते, न दीखत आकार और न उनका जीवन-सार - भले वो कोख-जाये सहोदर ही क्‍यों न हों ! बेशक वे एक-जैसे दिखते हों – उनके चेहरे-मोहरे, नाक-नक्‍श, रंग-रूप, या हंसने-बोलने का तौर-तरीका, उनका काम, बहुत-कुछ एक-सा हो सकता है, लेकिन एक इन्‍सान के रूप में उनकी अन्‍दरूनी बुनावट कम ही मेल खाती है ! कई-बार तो वे समय के साथ एक-दूसरे से इतने दूर जा छिटकते हैं कि आपस में मिलान करना ही मुश्किल। लेकिन आस-पास के लोगों को जाने क्‍यों अरसे तक यही भरम बना रहा कि शायद हम इसका अपवाद हैं ! कुछ अरसे तक तो खुद हमें भी ऐसा लगता रहा, पर गुजरते समय ने हमारे बहुत-से भरम मिटा दिये ! 
       
    बात दरअसल यों हुई कि मैं और भोजराज बचपन में एक-सरीखे ही दिखते थे। अपना  लड़कपन पार करते-करते अपने ही गांव के लोगों के लिए हम दोनों में अन्‍तर करना मुश्किल हो गया। दोनों की उम्र में यों सवा-डेढ़ साल का अंतर तो जरूर था, लेकिन भैया से मेरी बढ़त थोड़ी बेहतर थी, सो उम्र के अन्‍तर को तो हमने सात-आठ साल की उम्र पार करने तक यों ही पाट लिया। कई बार पहली दफा हम दोनों से एक-साथ मिलने वालों के मुंह से यह भी कहते सुना कि ‘अरे, ये तो जुड़वां हैं, शायद !’ यानी दोनों के नाक-नक्‍श और दीखत आकार इतने एक-सरीखे थे कि एक-दो बार मिले व्‍यक्ति के लिए तो दोनों के बीच फर्क करना ही मुश्किल हो जाता। पांच-सात महीने बाहर रहकर लौटा कोई परिचित अक्‍सर मुझे भोजराज समझकर ही बतियाने लगता। बातचीत के दौरान जब मुझे आभास होता है कि अगला मुझे ही भैया समझकर बात किये जा रहा है, तो मैं भी कुछ देर तो इस गलतफहमी का आनंद कभी ले लेता, लेकिन जल्‍दी ही उसकी गलतफहमी दूर करने के लिए मुझे कहना ही पड़ता कि ‘भैया, मैं भोजराज नहीं, भीमा हूं!’ और फिर दोनों हंस पड़ते।  
       असल में कुसूर लोगों का नहीं है। आती जवानी के उन दिनों में हम दोनों भाइयों को लेकर ऐसी गलतफहमियां इसलिए भी हो जातीं थीं कि हम डील-डौल में तब एक-सरीखे दिखते थे। बहुत बार कपड़े भी एक-सरीखे ही पहन लिया करते। नयी पोशाक के नाम पर पिताजी अक्‍सर हमारे लिए बाजार से एक ही तरह का कपड़ा ले आते, जिसमें आधी बांह की दो कमीजें आराम से बन जाएं। दोनों थे भी एक सरीखे ही, इसलिए कपड़े भी अक्‍सर एक-दूसरे के अदल-बदलकर पहन लेते। कुछ निश्चित था ही नहीं कि कौन-सा किसका है। बचपन से दोनों इतने साथ रहे कि एक के बगैर दूसरे को चैन नहीं पड़ता था। किसना काका हमारे बाल भी अक्‍सर साथ जाने पर ही काटा करते और वे काटते भी एक जैसा ही। कभी जब मैं कहीं अटक जाता और भैया अकेला ही उनके पास पहुंच जाता तो वे उसे यह कहकर उल्‍टे पैरों लौटा देते कि ‘जा उस दूसरे को भी पकड़ ला, वरना अकेला तो शायद ही आए।‘ बचपन में एक बार भैया के सिर में कुछ फुन्सियां-सी निकल आईं, तो उसे पूरे बाल कटवाने पड़े, इसी फेर में मेरा भी मुंडन हो गया, और किसना काका इस बात से खुश थे अब गई कई दिन की।
***
अपने मां-बाप के घर हम चार भाई और दो बहनों समेत छह भाई-बहन हुआ करते थे। बड़े भाई सुखराम के बाद दूसरी सन्‍तान के रूप में जन्‍मे मगनराज की बचपन में मृत्‍यु हो जाने के कारण हम पांच ही रह गये। बहनें गौरी और अणची भोजराज से बड़ी थीं। सुखराम और दोनों बहनों की शादियां डेढ़ साल के अंतर पर ही हो गई थी। बहनों की शादी के वक्‍त भोजराज की उम्र चौदह से कुछ कम थी और मेरी बारह से कुछ अधिक। घर में किसी की शादी होना, उन दिनों किसी त्‍यौहार से भी बड़ा उत्‍सव माना जाता था।
     सुखराम हमारे बचपन के दिनों में ही ताऊजी के साथ बीकानेर रियासत में हमारे पैत्रिक गांव चले गये थे और वहीं से हमारे ममेरे भाई के साथ कमाई के लिए कलकत्‍ता। वे साल में एकाध बार सप्‍ताह दस दिन के लिए गांव जरूर आते रहे, लेकिन गांव में उनका मन कम ही  लगता था। वे जल्‍दी ही ननिहाल और फिर कलकत्‍ता लौट जाते। कुछ बड़े हो जाने पर मामा ने ही उनका रिश्‍ता तय करवा दिया और वहीं पैत्रिक गांव में ताऊजी के आंगन से ही उनकी बारात चढ़ी। हम छोटे बहन-भाई तो उसमें शरीक ही नहीं हो पाए। मां-पिताजी को भी फकत् शादी के सप्‍ताह भर पहले खबर भिजवा कर बुलवा लिया था। गौरी तब सोलह साल की थी और घर में मां के काम में पूरा हाथ बंटाने लगी थी। वह रसोई और गायों की देखभाल का काम अकेले ही संभाल लेती थी। उससे छोटी अणची भी इस काम में उसकी खासी मददगार थी। इसलिए जब सुखराम की शादी के लिए मां-पिताजी को बुलावा आया तो हम चारों ने इस घर की देखभाल का जिम्‍मा आराम से संभाल लिया। यों मां किसना काका की अम्‍मा को हमारी और घर की देखरेख की फौरी भोळावण जरूर दे गई थीं, जिन्‍हें हम दादी कहकर बुलाया करते थे। वे सुबह-शाम गौरी-अणची के पास आ जातीं और थोड़ी देर पूछताछ कर वापस अपने घर लौट जातीं। वे दस दिन हमने ऐसे गुजारे जैसे हम ही घर के मालिक हों।
    पिताजी ने खोजबीन कर पास के गांव में एक ऐसे गुणी सज्‍ज्‍न का पता लगाया जो गांव के बच्‍चों को अक्षर-ज्ञान करवाते थे, नाम था उनका देवीशंकर दूबे और उनका घर दूबे की पोसाळ। पिताजी चाहते थे कि हम दोनों भाई इस पौसाळ में कुछ पढ़ना-लिखना सीख लें, इसीलिए वे हम दोनों का नाम वहां लिखवा आए। पिताजी के कहने पर भोजराज तो नियमित रूप से पोसाळ जाने लगे, लेकिन मेरा दो-चार में ही वहां से जी उचट गया। मुझे पूरे दिन किसी एक ही जगह पर नीची धुन किये कुछ करते रहना बहुत ऊबाऊ लगता था, फिर घर में गायों की देखभाल करने वाला दूसरा कोई नहीं था, सो मां ने ही मना करवा दिया कि हम दोनों से कोई एक ही पोसाळ जा सकेगा। और इस तरह मुझे सहज ही पढ़ाई से निजात मिल गई।
   चौमासे में खेती का ज्‍यादातर काम पिताजी और भोजराज ही देखते थे, जबकि घर में गायों की देखभाल, कुएं से पानी की पखाल लाना और घर में मेहनत मशक्‍कत के दूसरे छोटे-मोटे काम मेरे ही जिम्‍मे रहते थे। शादी के तुरंत बाद सुखराम हमारे पैत्रिक गांव में ही रस-बस गये, जहां पिताजी ने अपने भाइयों की मदद से एक बना-बनाया घर खरीदकर उन्‍हें वहीं बसा दिया था। सुखराम ने भी साल भर बाद कलकत्‍ता का काम छोड़कर उसी गांव में परिवार की कुछ पुश्‍तैनी जमीन पर खेती को अपनी जीविका का आधार बना लिया था। सुखराम को वहां बसाना इसलिए भी जरूरी हो गया था कि आगे साल भर बाद बहनों की शादियां होनी थीं, हमारे घर-परिवार और बिरादरी के ज्‍यादातर लोग उसी हलके में बसे हुए हैं। मालाणी के इस छोटे-से गांव में तो हमारे परदादा जजमानों के आग्रह पर आकर बस गये थे, जहां खेती और जजमानी के बूते पर गुजारा भर करने की गुंजाइश थी। घर-परिवार में शादी-ब्‍याह और औसर-मौसर जैसे सारे काम तो मूल गांव में भाइयों के बीच जाकर ही संपन्‍न करने होते थे।  
     भोजराज और मुझमें एक अंतर यह भी था कि वह थोड़े संजीदा स्‍वभाव के युवक थे और मैं एकदम मुंहफट। वे बोलते भी कम थे, जबकि गांव के लड़कों को मुझसे बतियाने में कुछ ज्‍यादा ही मजा आता। उसका एक कारण यह भी था कि मैं उनके बीच अधिक समय तक रहता था और हर कोई मुझसे चुहलबाजियां करता रहता। शाम को गांव भर के लड़के जब चौगान में इकट्ठा होकर दो धड़ो में बंटकर कोई खेल खेलते, तो हर धड़ा अपने भीड़ू के रूप में मुझे ही लेना पसंद करता, क्‍योंकि कद-काठी में औरों से मैं इक्‍कीस ही पड़ता था।
      भोजराज पूरे चौमासे में खेत की ढांणी में ही रहते थे, जो गांव से कोई दो-ढाई कोस की दूरी पर थी। चौमासे के बाद घर लौटने पर वे पिताजी के साथ पंडिताई और जजमानी का काम संभाल लेते। घर में गायों के  लिए चारा-पानी लाने और खेत-खलिहान से अनाज आदि ढोकर लाने के लिए जो सांढ (ऊंटनी) थी, वह मेरी देखरेख में रहने के कारण मुझसे खूब हिली-मिली रहती थी। भाई जब भी उसे अकेले अपने साथ खेत ले जाते, कुछ ज्‍यादा ही बोझ लादकर लौटते थे, इसलिए वह हमेशा उनसे डरी-सहमी-सी रहती थी। वे जब भी उसकी मोहरी पकड़कर नकेल खींचते, वह पहले ही बिलबिलाने लगती, जबकि मेरे साथ हमेशा शान्‍त और निश्चिन्‍त-सी रहती। उसे नकेल खींचे जाने का कोई भय नहीं होता।  
***
    बहनों की शादी के साल भर बाद पिताजी और भैया को फिर किसी काम से अपने पैत्रिक गांव जाना पड़ा था। और जब वे स्‍प्‍ताह भर तक वापस नहीं लौटे तो एक दिन सुबह-सवेरे मां ने मुझे यह कहकर पड़ौस में ताईजी के घर भेजा था कि मैं यात्रा पर गये पिताजी और भोजराज की वापसी के समाचार उनसे पूछ आऊं। ताईजी भी उनसे कुछ दिन पहले बेटे के साथ अपने  पीहर गई थीं, जो हमारे पैत्रिक गांव के पास ही पड़ता है। वे एक दिन पहले ही वहां से लौटकर आई थीं। जब उनके घर पहुंचा तो पता चला कि वे तो पड़ोस में कहीं गई हुई थीं, लेकिन घर में मौजूद बड़ी भाभी ने मेरी अगवानी करते हुए हंसी-मजाक में जब मुझ से मुंह मीठा कराने की बात कही तो लगा कि वे शायद मेरे चाचा बनने की खुशी में ऐसा कह रही हैं। वे कुछ ही अरसा पहले एक बेटी की मां बनी थीं, सो मैंने भी खुशी जाहिर करते हुए कह दिया – “हां भाभी, आपका मुंह मीठा तो कराना ही होगा, हमें चाचा बनने की इतनी बड़ी खुशी जो दी है आपने ! 
     “- अरे नहीं लाल जी, वो खुशी तो अपनी जगह है, मैं तो उससे भी बड़ी खुशी की बात कर रही हूं। वह तो ढोल-ताशे बजाकर ,खुशी और बधाई बांटने की सी बात है ! बधाई में पूरा वेश लूंगी मैं, चाचीजी से।"
    “- अच्‍छा ! फिर तो हमें भी बताएं, शायद हमें भी दो-चार लड्डू हासिल हो जाएं !
    “- आप ही की हासिल पर तो सारा दारोमदार है, देवर जी !” कहते हुए वे लगातार मुस्‍कुरा रही थीं और मैं असमंजस में।
    “ – वाह भाभी जी, जिसे कुछ हासिल होना है, उसे तो खबर ही नहीं और आपने तो अपनी बधाई भी तय कर ली ! हमें भी कुछ तो सुराग दें ताकि हम मांजी से आपकी बधाई के लिए  सिफारिश कर सकें !    
   “ – अजी वाह, फिर तो हमारी बधाई पक्‍की समझो !” कहते हुए भाभी ने आसरे में बैठी  अपनी बेटी विमला को आवाज दी – “विमला बेटी, तिलक वाली थाली लाइयो, जरा अपने होनेवाले छोटे जीजा का हम भी तिलक तो कर ही दें !” यह कहते हुए वे खिलखिला उठी। 
    भाभी की इस रहस्‍यमय घोषणा ने मुझे एकाएक अचंभे में डाल दिया। संकेत को आधा-अधूरा समझते हुए हल्‍की-सी झेंप के साथ मैंने फिर पूछ लिया – “भाभी, आप ये क्‍या पहेलियां बूझ रही हैं, ठीक से बताइये न, मुझे तो मां ने ताईजी से भैया और पिताजी का समाचार जानने के लिए भेजा है ! पर आप तो कुछ और ही बात कर रही हैं ?” 
    “- भीम जी, हमें जो जरूरी बात कहनी है, वही कह रही हैं ! सासूजी बता रही थीं कि वे अपने मायके में आपकी और आपके भैया भोजराज की उन्‍हीं के परिवार में सगाई तय करके आ रही हैं। आपके पिताश्री और भैया जी इसी काम के लिए तो गए थे, वे भी दो-चार दिन में आने ही वाले होंगे। मुझे तो खुशी इस बात की है कि आपकी होने वाली दुल्‍हन मेरी मौसेरी बहन है, तो इस नाते आप हमारे जीजा होने जा रहे हैं ! 
    भाभी से मिली इस जानकारी के बाद मैं तो उनके मुंह की तरफ देखता ही रह गया, समझ ही नहीं पा रहा था कि इसका क्‍या जवाब दूं? वे विमला की लाई थाली से टीका लगाने की तजवीज करतीं, उससे पहले ही मैं तो तुरंत वहां से भाग छूटा और सीधा घर आकर ही सांस ली। भाभी पीछे आवाज लगाती ही रह गई – “अरे सुनो तो …. !
     घर पहुंचने पर मां ने जब पिताजी और भाई के बारे में पूछा तो मैंने कह दिया कि  ‘ताईजी अभी घर पर नहीं हैं, तुम्‍हीं जाकर पूरे समाचार पूछ आना।' और यह बताकर थोड़ी देर रुकने के बाद मैं घर से बाहर निकल गया।
     दिन में किसी वक्‍त ताईजी ने घर आकर मां को पूरी जानकारी दे दी थी और वे खुश थीं। शाम को किसना काका की अम्‍मा से बात करते हुए वह जो बता रही थी, उसे मैं गढ़साळ की चौकी पर बैठे सुन रहा था। वे कह रही थीं कि “जिठानी जी की इस संबंध में भोज के पिताजी से पहले ही बात कर चुकी थीं और इसी काम के लिए उनके भाइयों ने उन्‍हें बुलाया था। जिठानी जी का पीहर हमारे पैत्रिक गांव से ढाई-तीन कोस की दूरी पर ही तो है। तयशुदा बात के मुताबिक भोज और उसके पिता जिठानी जी के मायके पहुंच गए, जहां वे और उनके दोनों भाई प्रतीक्षा में ही थे। रिश्‍तेदारी में जब पहले से सब एक दूसरे को जानते हों तो ज्‍यादा ब्‍यौरे में जाकर बात करने की गुंजाइश कम ही रहती है।"   
    “ – नहीं चाचीजी, अब बार-बार का आना-जाना किसके लिए संभव होगा और वह भी सौ कोस दूर बसे इन गांवों के बीच? जिठानी जी तौ बता रही थी कि भोजराज का टीका होने के बाद उसी पाटे पर छोटे भाई के टीके की रस्‍म भी उन्‍होंने भोजराज के हाथ में रुपया-नारियल और वेश देकर उसी वक्‍त संपन्‍न कर ली। हमारे यहां तो यही रस्‍म-रीत है। ब्‍याह के वक्‍त दोनों बेटे दूल्‍हा बनकर उनकी तोरण बांन लेंगे और चार फेरे लेकर दुल्‍हनें अपने घर पहुंच जाएंगी। बेटी का बाप और हम दोनों निश्चिन्‍त।" मां ने इस तरह हंसते हुए बात को सहेज लिया। 
     इस तरह मां के मुंह से सारी बातें जान लेने के उपरान्‍त मेरे मन में एक तसल्‍ली-सी हो गई। मुझे भी लगा कि इस रिश्‍ते में जब खुद ताईजी ने इतनी रुचि ली है तो किसी के मन में शंका की कोई गुंजाइश नहीं रह गई होगी, लेकिन उस समय मंगेतर रामी की मेरे बारे में क्‍या राय बनी होगी, यह बात तो मैं कभी जान ही नहीं पाया।
*** 


सगाई होने के बाद आनेवाली आखातीज के अबूझ सावे पर हम दोनों भाइयों का एकसाथ ब्‍याह सम्‍पन्‍न हो गया। शादी के लिए बारात चूंकि हमारे पैत्रिक गांव में सुखराम के घर से ही चढ़ी थी, इसलिए बहुएं पहली बार उसी घर में आई थीं और वहीं पहली बार मैंने रामी को भर-नजर देखा था। भोजराज को तो भाभी ने सगाई के वक्‍त ही देख लिया था, लेकिन रामी के लिए तो वही पहली मुलाकात थी। उसकी किसी सहेली ने मेरे बारे में शायद कुछ ऐसा बढ़ा-चढ़ाकर बता दिया था कि वह थोड़ी आशंकित-सी थी। लेकिन जब चंवरी में उसने पहली बार मुझे अपने करीब बैठे देखा तो वह आश्‍वस्‍त हो गई । उसे कुछ भी असामान्‍य जैसी बात नहीं दिखी मुझमें। यह  बात शादी के कई दिन बाद यों ही एक दिन हंसते हुए मुझे बताई थी। उसने यही कहा कि हम दोनों भाई एक-से दिखते जरूर हैं, पर हैं नहीं। यों कद-काठी में थोड़ा फर्क था ही, रंग-रूप में भी मैं भाई से थोड़ा-सा गोरा और गठीला था, जो उसे अच्‍छा लगा। भाई सुखराम के घर में पहली बार रामी को देखकर तो मैं ठगा-सा रह गया था, वह जितनी नाक-नक्‍श से सुंदर थी, देह की गठन और गमक उससे भी सवाई। सुखराम के घर में ज्‍यादातर ओरे पक्‍की ईंटों से बने थे, हमारे गांव की तरह वहां कच्‍चे आसरे कम ही बनाते थे। उस ओरे में दीये के उजास में जब मैंने उसका घूंघट उठाया तो आंखें उसके सलोने मुख पर टिकी रह गईं। नजरें एक-दूसरे से मिलीं और सम्‍मोहित से हम एक-दूसरे को देखते रह गए। जब मैंने उसकी ओढ़नी को हटाना चाहा, तो वह  बेतरह लजा गई और ओढ़नी को कसकर पकड़ लिया। उसने आंख से इशारा किया कि पहले दीये को बुझा दूं। मैंने उसकी बात का मान रखा और उठकर ताखे में रखे दोनों दीये बुझा दिये। दीये बुझ जाने के बाद भी खिड़की-दरवाजों की दरारों से बाहर आंगन मे जल रही गैस-बत्तियों की हल्‍की रोशनी छनकर भीतर आ रही थी, जिससे इतना उजाला जरूर था कि हम एक-दूसरे को देख सकें। दीये बुझाने के बाद ज्‍योंही उसके करीब आकर मैंने अपनी बाहें खोलीं, वह सेज से उतरकर सहज भाव से मेरी बाहों में समा गई।
      विवाह के बाद की जरूरी रस्‍में पूरी कर हमारा पूरा परिवार दस दिन बाद वापस अपने गांव आ गया। दोनों बहुएं हमारे साथ ही आईं थीं और घर में आकर उन्‍होंने अपनी जिम्‍मेदारियां संभाल ली। शादी के बाद दो-ढाई साल तो हर्ष-आनंद में ऐसे बीत गए कि किसी को और कुछ सोचने-करने की फुरसत ही नहीं मिली। जिस तरह घर का काम चलता आया था, सब उसी में उलझे रहे, लेकिन तीसरे बरस जब आषाढ़ उतरने तक बुवाई लायक बरसात के कोई आसार बनते नहीं दीखे तो घर में गाय-पशुओं के लिए घास-चारे की परेशानी गहरी चिन्‍ता का कारण बन गई थी। आस-पास के गांवों में न कहीं चारे-पानी का इंतजाम था और न किसी बाहरी सहायता की कोई उम्‍मीद। सावन सूखा गुजरने के साथ ही चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। लोगों ने उस बरस खेती की तो उम्‍मीद ही छोड़ दी। अधिकतर किसान अपने जीव-जानवरों को लेकर मेवाड़ और मालवा की ओर निकल गए और कई अपने दूर-दराज के उन रिश्‍तेदारों की ओर जिनके हलके में चारे-पानी के कुछ आसार बचे हुए थे। मालाणी हलके में विक्रम संवत् छियानवे का यह अकाल आने वाले कई सालों तक लोगों को भयभीत करता रहा। उस साल चौमासे के सूखे दिनों में मां-पिताजी और भाई-भाभी तो गांव में ही रहे, लेकिन रामी को सावन उतरते ही उसके भाई आकर मायके ले गए और मैं भी कुछ मेहनत-मजदूरी के लिए गांव के दूसरे युवकों के साथ सिंध की ओर निकल गया। छियानवे की होली के बाद जब गांव से मां के बीमार होने का समाचार आया तो मुझे खड़-खड़े ही गांव वापसी के लिए निकलना पड़ा। उन दिनों मीरपुर खास से हमारे गांव के करीबी स्‍टेशन तक एक सवारी गाड़ी आया-जाया करती थी, जो सवेरे मीरपुर से रवाना होती और शाम होने तक मेरे गांव के करीबी ठिकाने तक पहुंचा देती।
     शाम को उसी गाड़ी से जब मैं पहुंचा तो गांव और अपने घर की दशा देखकर गहरे सोच में पड़ गया। घर में प्रवेश करते ही आंगन के आगे की जो बाखर पहले गायों-बछड़ों से भरी रहती थी, वह सूनी पड़ी थी। सिर्फ एक दुधारू कजरी गाय और उसी की बड़ी बछड़ी एक ही ठांण में मुंह नीचा किए कुछ खा रही थी, लेकिन शायद भरपेट चारा न मिलने के कारण दोनों की हालत अच्‍छी नहीं थी। आंगन पार कर जब मां से मिलने के लिए उसके ओरे में दाखिल हुआ तो ताखे में जलते दीपक के हल्‍के उजास में वह आंखें बंद किये अपने पलंग पर लेटी थी। भाभी उसी के पास हाथ-पंखी से हवा करते हुए बैठी थी। भाभी ने मां के हाथ का स्‍पर्श करते हुए उसे एक धीमी-सी आवाज लगाई तो उसने अपनी आंखें खोल ली। मुझे सामने खड़ा देखकर उसके चेहरे पर हल्‍की-सी मुस्‍कान आ गई। मैं उसके पांव छूकर पास ही पलंग की ईस के सहारे बैठ गया और उसकी तबियत को लेकर कुछ पूछने लगा। वह अपनी काया की कमजोरी के बावजूद तबियत के बारे में धीरे-धीरे बता रही थी, लेकिन इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उसे बिना बोले आराम करने देना ही बेहतर लगा। फिर भी बोलना बंद करने से पहले उसने अपनी यह इच्‍छा जरूर बता दी कि मैं तुरंत ससुराल जाकर उसकी बहू को ले आऊं। मैंने उसे आश्‍वस्‍त किया, तब तक भोजराज भी मां के पास आ चुके थे। भाभी पहले ही उठकर रसोई में में चली गई थी, कुछ देर हम दोनों भाई चुपचाप मां के पास बैठे रहे।   


    मां का आखिरी वक्‍त नजदीक जानकर पिताजी और भाई ने अगले दिन सवेरे की गाड़ी से मुझे रामी का लाने भेज दिया। मैं शाम तक बीकानेर पहुंच गया। गाड़ी शाम को देर से बीकानेर पहुंची थी और उसके बाद ससुराल जाने के लिए उस वक्‍त और कोई साधन नहीं था, इसलिए वह रात वहीं एक धर्मशाला में गुजारी और अगली सुबह की गाड़ी से दोपहर तक अपने ससुराल पहुंच गया। वहां पहुंचने के उपरान्‍त मैंने ससुर जी को मां की बीमारी और उसकी अंतिम इच्‍छा के बारे में बताया तो उन्‍होंने अगले ही दिन रामी को सीख देकर मेरे साथ रवाना कर दिया। हम दोनों दूसरे दिन वहां से रवाना होकर अगले दिन सुबह तक अपने गांव पहुंच गए। परिवार के सभी लोग जैसे हमारा इंतजार ही कर रहे थे। घर में दाखिल होते ही रामी औ मैं सीधे मां के ओरे में प्रवेश कर गए। वह अब भी उसी तरह आंखें बंद किये लेटी थी और उसके पलंग के पास ही गांव की कई स्त्रियां पहले से मौजूद थीं। रामी ने मां के पांव छूकर उनके मुंह के पास जाकर हल्‍के से आवाज दी। मां जैसे उस आवाज की ही प्रतीक्षा में थी, उसने तुरंत अपनी आंखें खोल दी और बहू को सामने पाकर उसके चेहरे पर हल्‍की रौनक-सी लौट आई। उसने अपना कमजोर सा हाथ उठाकर रामी के सिर पर रखा और उसे अपने पास ही बिठा लिया। वह उसे अपने पलंग पर ही बिठा लेना चाहती थी, लेकिन रामी पलंग की ईस पकड़कर उनके पास ही आंगन पर बैठ गई। मैं पास ही खड़ा सास-बहू का यह मिलन देखता रहा। मैंने जब मां के पांव स्‍पर्श किए तो उसने हाथ उठाकर आशीष दिया और वापस बहू की ओर रुख कर लिया। सास-बहू के बीच धीमे स्‍वर में होती बातचीत के दौरान ही मैं वहां से निकल कर बाहर चौकी पर आ गया, जहां गांव के और लोग पहले से जमा थे। वह दिन तो मां ने किसी तरह निकाल लिया, लेकिन अगले सवेरे सूर्य उगने के कुछ ही देर बाद उसने हम सबसे अंतिम विदाई ले ली। लेकिन जाने से एक घड़ी पहले तक वह अपनी बहुओं से बात कर रही थी और फिर एकाएक चुप हो गई। मां की यह छवि बरसों तक मेरी चेतना में बनी रही।      
***
     भाभी उन दिनों गर्भवती थी। शायद पांचवां या छठा महीना रहा होगा। मां के मौसर पर  घर-परिवार और रिश्‍तेदारी के सभी लोग आए थे - हमारे पैत्रिक गांव से ताऊजी, भाई सुखराम का परिवार, हमारी दोनों बहनें, जीजा और हमारे ससुराल से दोनों ससुर, साले और उनके गांव के कुछ और लोग। मौसर के चार दिन बाद भाभी के बड़े भाई वापस लौटते समय उन्‍हें पहले प्रसव के लिए अपने साथ पीहर ले गये थे। तब से लेकर अगले पांच महीने तक रामी को अकेले ही घर की जिम्‍मेदारी संभालनी थी। उसने वह जिम्‍मेदारी तो सही, लेकिन उसी दौरान उसके मन में घर-संपत्ति के बंटवारे को लेकर कुछ अलग तरह की सोच भी बनने लगी थी, जिसे शायद मैं ठीक तरह से नहीं समझ पाया।  
     तीन महीने बाद हमारे ससुराल से यह खबर भी आ गई कि भैया एक बेटे के बाप बन गये हैं और उसके दो महीने बाद वे खुद ससुराल जाकर भाभी और बेटे को वापस घर ले आए।  पहली संतान की खुशी में दो-तीन दिन घर में खूब चहल-पहल रही और पूरे गांव में गुड़ बांटा गया। यह खुशी तब और दुगुनी हो गई, जब भाभी को यह बात पता लगी कि उसकी छोटी बहन भी मां बनने के रास्‍ते पर है। वह खूब उत्‍साह से उसे हिदायतें देतीं और घर में मेहनत-मशक्‍कत का कोई काम उसे न करने देती।
    बस ऐसे ही हंसी-खुशी में दिन गुजर रहे थे। कुछ महीने बाद रामी को उसके भाई आकर पीहर ले गए और इससे रामी की परिवार से अलग राह पर जाने की सोच को थोड़ा विराम भी लगा, लेकिन अपने पीहर में भाई-भाभी के साथ बातचीत में उस सोच ने शायद कुछ नया रूप लेना भी शुरू कर दिया था, जो उसे अपने मां बनने की खुशी से कहीं ज्‍यादा अहम लग रहा था। इसका अहसास मुझे कुछ अरसे बाद ही हो पाया। खैर वह जो भी रहा हो, लेकिन दो महीने बाद आखिर वह अच्‍छी खबर आ ही गई कि मैं एक बेटी का बाप बन गया हूं। मुझे लगा कि भाई की तरह अब मेरी भी जिम्‍मेदारियां बढ़ गई हैं। गांव में हमउम्र लड़के जब कभी ‘अरे बेटी के बाप’ कहकर मुझसे हंसी-मजाक करते तो अच्‍छा लगता और पलट कर कहने की इच्‍छा होती कि अब मैं तुम्‍हारी तरह बेलगाम घोड़ा नहीं हूं। लेकिन नहीं कहता। यह सोचकर न बोलना ही ठीक लगता कि कहीं वे मेरी बात को लेकर फिर चुहलबाजी पर न उतर आएं। उनकी तो जुबानें ऐसी चलती थीं जैसी किसना काका की कैंची। हां किसना काका के नाम से याद आया कि अब वे बाल काटने के लिए मुझे और भैया को साथ बुलाने की जिद नहीं करते थे और अब तो बाल काटने के तौर-तरीके में भी काफी फर्क आ गया था।  
    किसना की मां, हम दोनों से बेहद लगाव रखती थीं। हमारी पत्नियां भी उन्‍हें सगी सास जैसा आदर देती थीं। किसना के बापू का नाम मेरे नाम से मिलता-जुलता-सा था, इसलिए दादी मुझे भीमा की बजाय ‘पाण्‍डु’ कहकर पुकारती थी। संयोग से हम दोनों भाइयों के नाम का पहला अक्षर भी एक ही था। दादी मुझे मेरे भोलेपन को लेकर कई बार यह समझाने का प्रयत्‍न करती कि मैं भी भोजराज की तरह अपनी गृहस्‍थी की जिम्‍मेदारियों को ठीक से समझूं। कल को मेरे और बच्‍चे होंगे। मां-बाप का साया सदा के लिए नहीं होता, वक्‍त आने पर हरेक व्‍यक्ति को अपनी गृहस्‍थी खुद संभालनी होती है, इसलिए बाकी दोनों भाइयों की तरह मैं भी अपने घर-बार की चिन्‍ता स्‍वयं करूं। और यहीं आकर मेरा जी उचाट खा जाता…… मुझे जाने क्‍यों ऐसा लगने लगता कि दादी हम दोनों भाइयों में भेद करती है, शायद वो मुझे भैया से कमतर और कम जिम्‍मेदार समझती है।
    पिताजी तब काफी बूढ़े हो चुके थे। खेत और जजमानी का ज्‍यादातर काम भोजराज ही देखने लगे थे। किसी बच्‍चे का नामकरण करना हो, नये घर की नींव का अनुष्‍ठान हो, घर में हवन या पूजा-पाठ करवाना हो, विवाह में चंवरी करवाने का काम हो या किसी के गुजर जाने पर हवन करवाना हो, भाई बारहों महीने ऐसे ही कामों में व्‍यस्‍त रहने लगे थे। कभी-कभार जब दो जगहों पर एक साथ ऐसा कोई काम आ जाता, तो भोजराज के कहने पर किसी एक काम का जिम्‍मा मुझे सौंप दिया जाता, लेकिन मुझे उसमें भी एक तरह की हिचक ही रहती कि कहीं कोई त्रुटि न हो जाए और कुछ यह आशंका भी कि कोई मुझे भोला और कम जानकार समझ कर हंसी-मजाक न करने लगे। यह बात तो मैं भी बिना किसी संकोच के मानता हूं कि मेरा पंडिताई का ज्ञान बहुत गहरा नहीं था, मामूली साक्षर होने के नाते पंचांग जरूर बांच लेता और बता देता कि उस दिन का ग्रह-जोग कैसा है। यह अक्षरज्ञान भी भैया की ही मेहनत का सुफल था, ……जो कुछ सीखा, उन्‍हीं से सीखा था। उसी के बूते अटका हुआ काम निकाल आता। लिखने के नाम पर तो आज भी मेरी अंगुलियों में बांयटे आने लगते हैं।  
    पत्‍नी कभी-कभार अपनी बहन के रूखे बरताव और घर-परिवार की ऐसी शिकायतें लेकर बैठ जाती, जिनका मेरे पास कोई हल नहीं होता, उल्‍टे मैं उसी को अपना व्‍यवहार ठीक रखने की सलाह दे बैठता, जिस पर अक्‍सर वह दो-चार दिन रूठी-सी रहती। मेरी नजर में भाभी बहुत शान्‍त स्‍वभाव की औरत थी। इन आठ-दस सालों में मैंने कभी उसे किसी से आवाज ऊंची करके बात करते नहीं सुना और न कभी पीठ-पीछे किसी की बुराई करते। मुझसे जितना बन पड़ता, मैं रामी को समझाने की कोशिश करता, पर न वो मानने को तैयार होती और न मैं उससे सहमत हो पाता। थक-हार कर वह अपने भाग्‍य को कोसने बैठ जाती और मैं उठकर अपने और काम में लग जाता। 
***
घर में पहली बार जब बंटवारे की बात उठी तो हम दोनों भाइयों के लिए यह तय करना मुश्किल हो गया कि घर में रहने और बच्‍चों के पालन-पोषण में जो साधन-सुविधाएं बनी हैं, उन्‍हें कैसे अलग बांटा जा सकता है। हरेक के पहनने के कपड़े जूते बेशक अपने हों, लेकिन ओढ़ने-बिछाने, खाने-पीने और रहने की सुविधाएं तो सब के लिए साझे में ही रही हैं, उनमें बंटवारा करना क्‍या कोई आसान काम है? दोनों भाइयों के बढ़ते परिवार को देखते हुए इस बात का अहसास तो मुझे था कि देर-सबेर हमें एक-दूसरे से अलग तो होना हो शायद, लेकिन पिताजी के साथ रहते हमें इस पर विचार करने की जरूरत कम ही लगती थी। दो परिवारों के हिसाब से कुछ अतिरिक्‍त साधन जुटाने की सोच किसी की रही भी नहीं। जबकि अलग होने के लिए रामी का दबाव बराबर  बढ़ता जा रहा था। हालांकि दोनों बहनों के डेढ़-दो साल के अंतर से एक के बाद दूसरा बच्‍चा होने की प्रक्रिया से दोनो परिवारों के अलग होने की प्रक्रिया को थोड़ा विराम भी लगा, लेकिन जिस तरह रामी के व्‍यवहार में जिस तरह अधैर्य बढ़ता जा रहा था, उसका असर बच्‍चों पर भी पड़ने लगा था।
      घर में दोनों भाइयों के कुल सात बच्‍चे थे – भोजराज के तीन बेटे और एक बेटी, जबकि मेरी दो बेटियां और एक बेटा। भैया के दो बड़े लड़के बारह-तेरह की उम्र पार करते ही रोजगार के लिए ताऊ जी के लड़कों के साथ कलकत्‍ता चले गए थे, जबकि मेरे तीनों बच्‍चे परिवार के साथ ही थे। घर के बीच आंगन के चारों ओर गोबर की दीवारों से से लिपे-पुते तीन आसरे (झौंपड़े), एक तिकोनी छतवाला ओरा, एक बुखारी, एक अनाज की कोठी और आंगन में प्रवेश करने के अंदरूनी द्वार के दोनों ओर सीने की ऊंचाई जितनी दो भींत थी, जिन पर सफेदी से मांडणे बने हुए थे। यह दरवाजा लकड़ी की पट्टियों वाली एक किवाड़ी से बंद रहता, जिससे कोई गाय या जानवर सीधे आंगन में न घुस जाए। आसरों और ओरे की छत लकड़ियों और पुआल से छजी हुआ करती थी। बाद के बरसों में ओरे पर तो टीन की छत बन गई लेकिन आसरों पर वही छाजन वाली छत बनी रही। जिससे गर्मी में आसरे खूब ठंडे रहते थे। घर के पूर्वी भाग में एक छोटा पानी का कुंड और उसी के पास छप्‍पर डालकर पानी का परिंडा बनाया गया था, जिसमें आठ-दस घड़े और मटकियां भरी रहती थीं। मैं जब भी कुएं से पानी की पखाल लेकर आता, इसी कुंड में खाली कर दिया जाता, जिसे जरूरत के मुताबिक घड़ों और मटकियों में पानी निकालकर रख लिया जाता।
    दोनों परिवार रहते बेशक एक ही आंगन में हों, लेकिन मां ने दोनों बहनों को एक-एक आसरा शुरू में ही बांट दिया था। तिकोनी छत वाला ओरा खुद मां के पास था, जिसमें घर का जरूरी सामान, ओढ़ने-बिछाने के गद्दे-रजाइयां-कंबल, बड़े बर्तन, बाजोट, चटाइयां, तिरपाल और रोजमर्रा के उपयोग की बहुत-सी छोटी-मोटी चीजें रखी रहती थीं। मां के गुजरने के बाद इस साज-सामान को संभालने की जिम्‍मेदारी भाभी पर आ गई थी। मां के बाद यही ओरा भैया-भाभी का शयनकक्ष हो गया, जबकि मैं और रामी अपने आसरे में ही सोते थे। ओरा भाभी के पास आ जाने से उनका आसरा घर की तीनों लड़कियों के पास आ गया। वे उसी में हिलमिलकर रहती थीं। और इस तरह कुछ बंटवारा तो अनौपचारिक रूप से पहले ही हो चुका था। हालांकि सामान के उपयोग को लेकर किसी पर कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन किसी नयी चीज के लिए पूछकर काम में लेना रामी को कम ही रास आता था। बुखारी और अनाज की कोठी के बीच आंगन के दक्षिणी छोर पर बना जो बड़ा-सा आसरा था, वह घर की रसोई के रूप में काम आता था। उसी में एक तरफ आटा पीसने की चक्‍की थी, जिस पर दोनों बहुएं और लड़कियां घर की जरूरत का आटा पीस लेतीं। उसी में खाने-पीने का सामान रखने की ओबरी और एक ओर चूल्‍हा-चौका था। यह चूल्‍हा सवेरे से दोपहर तक और फिर शाम से रात तक जलता रहता, जिस पर दिन भर कुछ-न-कुछ बनता-पकता रहता। घर के मुख्‍य द्वार के पास ही बैठक का बड़ा आसरा था, जिसे हम गढसाळ कहते हैं। उसी के आगे एक हाथ ऊंची बड़ी-सी चौकी है, जो त्‍यौहारों और विशेष अवसरों पर गांव के लोगों की सामूहिक बैठक या रियाण के लिए काम आती है। सर्दी के दिनों में तीनों लड़कियां अक्‍सर रसोई के आसरे में ही सोना पसंद करती थीं, जो अपेक्षाकृत गरम रहता था। भाई का छोटा बेटा चंदू और मेरा छुटकू केशव दादा के लाड़ले पोते होने के कारण अमूमन उन्‍हीं के पास रहते थे। घर में अनायास और अनौपचारिक रूप से बनी यह व्‍यवस्‍था मुझे इतनी अच्‍छी और अनुकूल लगती थी कि इसके चलते अलग घर बनाने की बात कभी मेरे खयाल में ही आई ही नहीं।
    घर के उत्‍तरी भाग में मुख्‍य द्वार के एक खंदे से शुरू होकर घर के चारों ओर जो कांटेदार बाड़ है, वह पीढ़ियों की कमाई की तरह इस घर को एक इकाई में बांधे रही है। घर को चारों ओर से गोलाई में घेरे हुए यह बाड़ उत्‍तर दिशा में एक जगह पर दो मजबूत मोढ़ों पर आकर खत्‍म होती है, जहां हमारे बचपन में कांटेदार झाड़ियों को आड़ी बाती में गूंथ-बांधकर बनाया गया बड़ा-सा फलसा होता था, जो एक मोढ़े से स्‍थाई रूप से बंधा होता और दूसरी तरफ से खुलता था। बाद के वर्षों में इस फलसे को हटाकर लोहे की पत्तियों और एंगिल से बनी एक खिड़क लगवा ली थी, जो खोलने बंद करने के लिहाज से आरामदायक थी। तब के मोढ़ो की जगह अब ईंटों से बने दो खंदों ने ले ली है, जिनमें से एक खंदे में हुक वाले एंगिल चुनवाकर खिड़क के फ्रेम को उन पर टिका दिया गया है।
     हम दोनों भाइयों की शादी के बाद के इन वर्षों में दोनों बहनों के बीच छोटी-छोटी घरेलू बातों को लेकर मन-मुटाव और कहा-सुनी इस कदर बढ़ गई थी कि उनका साथ रहना और साझे में निर्वाह करना कठिन होता जा रहा था। मां के गुजर जाने के बाद तो कोई बड़ी-बूढ़ी रही भी नहीं, जो उनके बीच तालमेल बनाए रख पाती। जब दोनों बहनों के बीच का विवाद घर के बाहर गांव की औरतों के बीच चर्चा का विषय बनने लगा तो गांव की बड़ी-बूढ़ियों ने पिताजी को यही राय दी कि अब दोनों बेटों को अलग-अलग बसा देने में ही सार है।
    कठिनाई यह थी कि इस एकल घेरे में बंधे घर को दो हिस्‍सों में बांटना पड़े तो किसके हिस्‍से में क्‍या और कितना दिया जाए कि कोई विवाद न हो। आंगन के चारों ओर बने आसरे और बा‍की सुविधाएं बेशक बांट ली जाएं, लेकिन पिताजी अपनी बैठक समेत थे शेष जीवन इसी आंगन में पूरा करना चाहते थे। खेती के लिए जो जमीन थी, उसे दो साल पहले ही अनौपचारिक रूप से दोनों भाइयों ने आपस में आधी आधी बांट ली थी और वह पिताजी के ही नाम थी। घर में भी जो आसरे जिसके पास थे, वे यथावत बने रहे। बस चूल्‍हा-चौका अब तक शामिल था, जिसे अलग होना था और कुछ घरेलू सामान, ताकि दोनों के लिए बुनियादी सुविधाओं का इंतजाम हो सके। गांव के बड़-बुजुर्गों ने काफी नाप-जोख के बाद यही सुझाव दिया कि जब तक एक भाई के लिए दूसरा नया घर तैयार हो, तब तक दोनों इसी बाड़ के घेरे में बने घर को आधा-आधा बांटकर गुजारा कर सकते हैं। बस घर की शोभा को बचाए रखने के लिए आंगन के बीच कोई दीवार न खड़ी की जाए। घर में मौजूदा आसरे बांटकर दोनों परिवार एक ही आंगन पर रह सकें, तो इसी में घर की शान बची रहेगी। चार आसरों में से पूर्वोत्‍तर भाग वाला एक आसरा, ओरा और बुखारी भैया के परिवार के लिए तय की गई और दक्षिण-पश्चिम वाले दो आसरे और अनाज की कोठी मेरे हिस्‍से में। इसी तरह खेती की जमीन और चार दुधारू गायों में आधी-आधी बांटने के बाद घर की बैठक और बाखळ फिलहाल साझे में ही रखी गई। खेत जोतने और कुएं से पानी लाने के लिए एक ही सांढ थी, उसे बांटना संभव नहीं था, लेकिन खेत जोतने के लिए भूरी गाय का बछड़ा, जो अब पूरा बैल बन गया था और पिछले दो साल से हल जोतने में काम देने लगा था, उसे मैंने सहर्ष कुबूल कर लिया।
    ये सब बातें अनौपचारिक रूप से तय करने के बाद गांव के मुखिया मंगलाराम ने आंगन के बीच दो बराबर हिस्‍सों में बंटे घरेलू साज-सामान की ओर इशारा करते हुए बंटवारे में छोटे का हक पहले मानते हुए मुझसे ही पूछा था – “हां बेटा भीमराज, तुम घर के छोटे और लाड़ले बेटे हो, सो बंटे हुए सामान में से अपना हिस्‍सा चुनने का पहला हक तुम्‍हारा ही बनता है, तुम अच्‍छी तरह देख-समझकर अपना हिस्‍सा चुन लो।"  
    इस ऐलान के साथ ही आंगन में एकबारगी चुप्‍पी–सी छा गई। मुखिया जी की इस घोषणा के बावजूद मेरी नजर सामान के किसी हिस्‍से की तरफ नहीं गई, बल्कि जमीन में और गहरी गड़ गई। सभी लोग मेरे बोलने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन मेरे लिए बोलना तो दूर, सिर सीधा कर सांस लेना भी दूभर हो रहा था। कुछ देर तक मैं समझ ही नहीं सका कि कौन-क्‍या कह रहा है और मुझे क्‍या करना है ?
    “- हां बोलो भीमराज, इसमें संकोच कैसा?” आंगन में बैठे बाकी लोगों में से कोई बोला था –शायद हम दोनों भाइयों का हितैषी और हमदर्द काका किसनाराम। पहली बार गांव और परिवार के लोगों के बीच मुझे इस तरह की दुविधापूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। मेरी पत्‍नी रामी और भाभी गांव की औरतों के बीच कहीं खो सी गई थी। चाचा रघुनाथराम ने मेरा कंधा हिलाते हुए फिर मुझसे बोलने का आग्रह किया। आग्रह करते हुए जब उन्‍होंने मेरी ठुड्डी पकड़ कर सिर सीधा किया, तो वे अचंभे में मेरा चेहरा देखते ही रह गये। बड़ा होने के बाद पहली बार मैं अपना दुख छिपाकर नहीं रख सका था और वह आंखों से बाहर निकल ही आया। वे हक्‍के-बक्‍के से मेरा मुंह देखते रह गये।
    “- अरे बावले, इसमें जी छोटा करने की कौन-सी बात है? जब दो भाइयों का परिवार बढ़ता है, तो घर का बंटवारा तो हुआ ही करता है।" उन्‍होंने मेरी पीठ सहलाते हुए सांत्‍वना देने का प्रयत्‍न किया।  
     कंधे पर रखे अंगोछे से अपनी आंखें पौंछते हुए एकबारगी मेरी नजर सबके बीच बैठे भाई और पिताजी पर गई। वे सिर नीचा किये गुमसुम-से बैठे थे। उनकी यह दशा देखकर मैं अंदर-ही-अंदर सिहर गया और एकाएक अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ। आंगन में बैठे लोग कुछ समझ-बोल पाते, उससे पहले ही मैं आंगन को पार करता हुआ बाहर बैठक की तरफ निकल आया। किसना और दो-तीन जने मुझे आवाज लगाते हुए पीछे आ गए थे। वे बार-बार वापस आंगन में चलने के लिए आग्रह करते रहे, लेकिन मैं उसी मनोदशा में दुबारा सब के बीच जाने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाया। मैंने किसी तरह किसना को थोड़ी देर आराम करने के लिए अपने को अकेला छोड़ देने का आग्रह किया और उन्‍हें वापस भेज दिया। गांव के लोग आंगन में देर तक आर्द्र स्‍वर में हम दोनों भाइयों के आपसी लगाव की बातें करते रहे, लेकिन जब काफी समय गुजर जाने के बाद भी मैं आंगन में नहीं लौटा तो मुखिया और बड़े-बुजुर्गों ने भोजराज को ही इस बात के लिए राजी किया कि वही दो हिस्‍सों में से एक अपने लिए चुन ले। भोजराज लोगों का आग्रह टाल तो नहीं सके, लेकिन जब वे अपना हिस्‍सा चुनने के लिए उठे तो एक हिस्‍से में से कुछ बड़े बर्तन और रजाई-कंबलें निकालकर दूसरे हिस्‍से में रख दीं और अपने लिए वही छोटा हिस्‍सा चुन लिया था। गांव के लोग बार-बार कहते रहे कि दोनों हिस्‍सों को एक-समान रहने दे, वे किसी के साथ नाइंसाफी नहीं करना चाहते, लेकिन भाई ने वही किया जो उन्‍हें जरूरी लगा और सबके सामने हाथ जोड़कर बिना कुछ बोले अपनी जगह बैठ गए। और इस तरह मेरी नजर में जो नहीं होना था, वह हो गया।   
***
यह बात समझ पाना बहुत मुश्किल है कि उस दिन घर में जो कुछ बँटा, उसमें किसे क्‍या हासिल हुआ और किसने क्‍या गंवा दिया, इसका सही-सटीक लेखा-निवेड़ा भला कौन-क्‍या कर सकता है ?!  
     बँटवारे के बावजूद उस दिन के बाद रामी कभी उस घर में चैन से नहीं रह पाई। वह बात-बात में कभी भाभी से या कभी बच्‍चों से उलझ जाती। आये दिन के बढ़ते तनाव को देखते हुए भोजराज ने एक दिन घर के पूर्वी हिस्‍से वाले बाड़े से पशुओं का घास-चारा हटाकर उसे साफ करवा लिया और उसमें नया आसरा बनाने का काम शुरू करवा दिया। कुछ ही दिनों में उस बाड़े की जमीन पर एक आसरे, ओरे, बुखारी और उनके आगे खुले आंगन का खाका उभर आया। गोबर से बनती ओरे-आसरे की दीवारें कुछ ही दिनों ऊंची उठती हुई मेरे सिर की ऊंचाई तक पहुंच गई और दीवारों के सूखने के साथ ही गोबर की पतली परत से उन्‍हें लीपकर आगे का काम भोजराज के जिम्‍मे कर दिया गया। दीवारें तैयार होने तक भाभी और घर की लड़कियां जी-जान से इस काम में जुटी रहीं, लेकिन रामी इस काम के प्रति उदासीन ही बनी रही। नये घर के इस निर्माण में काम आने वाली चिकनी मिट्टी, दीवारों की सफेदी के लिए जिप्‍सम, छत के लिए बल्लियां, लकड़ी, रस्‍सी-डोरिये और पानी के इंतजाम में दोनों भाई और भाई का बड़ा बेटा और छोटा चंदू बराबर साथ लगे रहे। दीवारें तैयार होने के बाद पिताजी भी छाजन और लकड़ी का काम करनेवाले कारीगरों के साथ खड़े रहे। पिताजी की सलाह पर हमने घर के उत्‍तरी भाग में बाहरी दरवाजे के पास बैठक के लिए एक छांद भी तैयार करवा ली । यह काम उस बरस की होली के तुरंत बाद शुरू हुआ था और अगले चार-पांच महीनों में यह नया घर बनकर तैयार हो गया।
    घर तैयार होने के दौरान एक रात जब मैंने रामी से यह पूछा कि अगर इस नये घर को भाई की बजाय हम लोग अपना निवास बना लें तो क्‍या उसे यह अच्‍छा लगेगा? मेरी इस राय के पीछे खास वजह यही थी कि पिताजी भोजराज के साथ रहने के इच्‍छुक थे और इस उम्र में उन्‍हें अपनी बैठक से अलग करना उचित नहीं था। भाई का परिवार यों भी मेरे परिवार से बड़ा था और खास अवसरों पर होने वाली गांव की बैठकें भी हमारी चौकी पर ही होती थीं, ऐसे में भोजराज के परिवार का उसी घर में बने रहना अधिक सुविधाजनक और पूरे परिवार के हित में था। रामी शुरू में तो इस बात के लिए राजी नहीं हुई और मैंने भी उसके कान में बात डालकर उसे विचार करने के लिए एक-दो दिन का समय दे देना बेहतर समझा। अपनी बात कहने के साथ अंत में मैंने यह भी जोड़ दिया कि अगर हम ऐसा कर लेंगे तो भाई-पिताजी को तो अच्‍छा लगेगा ही, गांव में हमारी इज्‍जत भी बढ़ेगी। पति-पत्‍नी के रूप में साथ रहते हुए मैंने पहली बार इतना सोच-विचार कर रामी से यह सलाह मांगी थी और यह बात उसे अच्‍छा भी लगी। उसने सोच-विचार कर तीसरी रात मेरी राय के अनुरूप अपना फैसला सुना दिया। रामी के तैयार होते ही, सारी बातें सहजता से सुलझ गईं। मैंने जब भाई और पिताजी को हम दोनों की राय से अवगत कराया तो उन्‍हें बहुत अच्‍छा लगा। भाभी और बच्‍चे भी हमारी राय से सहमत थे।
    रामी जब इस बात से सहमत हो गई कि नये घर में उसी के परिवार को जाना है, उस दिन से ही उसने नये घर को अपने ढंग से बनाने और उसे अंतिम रूप देने का काम शुरू कर दिया था। घर का सारा काम पूरा होते होते उस मौसम की बरसात के दिन शुरू हो गए थे और तब घर से ज्‍यादा जरूरी खेत की बुवाई और चौमासे के दूसरे काम हो गए हो गये, इसलिए नये घर में प्रवेश का काम आसोज में नौरात्रा स्‍थापना तक टल गया था। इस दौरान रामी को भी उसमें अपनी जरूरत के हिसाब से कुछ बदलाव करने का समय मिल गया और आखिर नौरात्रा आरंभ होने के साथ ही मेरे परिवार ने नये घर में विधिवत प्रवेश कर लिया।
     हमारे नये घर में निवास के साल भर बाद ही पिताजी की बीमार हो गए और कई दिनों तक उपचार लेते रहने के बावजूद उनका स्‍वास्‍थ्‍य दिनों-दिन गिरता ही चला गया। आखिर एक दिन वे सदा के लिए हमें छोड़कर चले गये। पिताजी के देहान्‍त के बाद हम दोनों भाइयों ने अपनी अपनी गृहस्‍थी की जिम्‍मेदारियां अपने बूते पर संभाल ली थी, लेकिन दोनों की पारिवारिक स्थितियों और जीवन-शैली में समय के साथ यह अंतर बढ़ता जा रहा था, जिस पर मेरा कोई वश नहीं था। 
     इस नये घर में आने के बाद अगले पांच सालों में भाई भाभी के सहयोग से दोनों बेटियों के विवाह की जिम्‍मेदारी तो जरूर पूरी हो गई, लेकिन इसी बीच रामी को अंदर-ही-अंदर जाने क्‍या घुन खाये जा रहा था कि उसकी तबियत दिनो-दिन बिगड़ती ही गई। कमजोर भी बहुत हो गई थी। आखिरी बार जब उसे बुखार आया, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह उसी के साथ सदा के लिए विदा हो जाएगी। दोनों बड़ी लड़कियां उन दिनों ससुराल में ही थीं। इस नये घर में आने के बाद हमारी एक बेटी और हुई थी, जो उस वक्‍त महज तीन साल की थी और बेटा केशव तेरह का। केशव था भी इतने भोले मन का कि कोई उसे बहला-फुसलाकर चाहे जहां हांक ले जाए। ऐसे कठिन समय में रामी का साथ छोड़ जाना वाकई मेरे उस घर-संसार के लिए ऐसा आघात था, जिसका सर्वग्रासी असर इन्‍हीं आने वाले सालों में घटित होना था।
     रामी की गैर-मौजूदगी में इन छोटे और अपरिपक्‍व बच्‍चों की परवरिश वाकई मेरे लिए आसान नहीं थी। भाभी अपने बच्‍चों के साथ इन दोनों की रोटी-पानी का ध्‍यान तो रख लेतीं, लेकिन छोटी बच्‍ची की देखरेख सिर्फ रोटी-पानी तक सीमित नहीं थी। रामी के गुजरने के कुछ अरसे बाद एक दिन बच्‍चों के ननिहाल से उनके मामा-मामी मिलने आ गए और उन्‍होंने जब केशव और छोटी बेटी को अपने साथ ले जाने की बात कही तो पहली नजर में मुझे वह इन छोटे बच्‍चों के हित में ही लगी। इन छोटे बच्‍चों को अपने साथ ले जाने के पीछे उनकी क्‍या मनो-वांछा रही, यह मैं नहीं जान सका और न कभी उन पर संदेह ही किया। वे यही तो कहकर गए थे कि बीच-बीच में बच्‍चों को लेकर आते रहेंगे, लेकिन अगले तीन साल बीत जाने के बाद भी जब बच्‍चे वापस लौटकर नहीं आए, तो मुझे थोड़ी चिन्‍ता-शंका-सी होने लगी। कई समाचार भिजवाए, लेकिन उन्‍होंने उनकी कोई गिनार नहीं की। लोगों के कहे अनुसार मुझे भी कुछ ऐसा ही लगने लगा कि इसके पीछे बच्‍चों के मामा-मामी का अपना कोई स्‍वार्थ जरूर पनप रहा है। लेकिन मेरे पास कोई विकल्‍प नहीं था। मैंने दो-तीन बार भोजराज के सामने अपनी चिन्‍ता जाहिर भी की, लेकिन वे भी अफसोस जताकर रह गए। वे अमूमन ऐसे मसलों को आनेवाले समय पर छोड़ देते, जो कभी नहीं आता। बच्‍चों के मामा-मामी के साथ भाभी के रिश्‍ते इन सालों में और भी कड़वे हो गये थे, क्‍योंकि वे भोजराज की तरह बात को टालती नहीं थी, वह खुलकर बात करना चाहती थी, लेकिन मेरे साले, जो भाभी के चचेरे भाई थे, अपनी इस बहन से सीधे बात करने से कतराते थे। बच्‍चों के उनके पास चले जाने के बाद मेरे पास अलग घर जैसा कुछ बचा भी नहीं था। भाभी ने मुझे सीधे तो कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन वह घर में अपने बेटों से जरूर कहती थी कि ‘उन लोगों की नज़र इन बच्‍चों के हिस्‍से की पुश्‍तैनी जमीन पर टिकी है, न वे केशव को कभी लौटकर आने देंगे और न उसे इसका कोई उपयोग करने देंगे। जिस दिन मेरे इस भोले देवर की आंख बंद होगी, उसकी इस विरासत को वे बाहर की बाहर ही बेच खाएंगे !’ आज यही चिन्‍ता और आशंका मेरे सामने एक सवाल बनकर खड़ी है और मुझे इससे बचने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा। अपने बिछड़े बच्‍चों को लेकर मन में बस यही एक मलाल रह गया है कि मैंने उन्‍हें इस तरह क्‍यों किसी का बंधक क्‍यों बन जाने दिया, मैं समय पर चेता क्‍यों नहीं ? क्‍यों यह जीवन-सार खुद मेरे लिए ही अकारथ-सा हो गया है?  
***

-    नंद भारद्वाज
71/247, मध्‍यम मार्ग,
मानसरोवर, जयपुर – 302020