Sunday, June 13, 2021

 


स्‍मृतिशेष रमेश उपाध्‍याय :  

महामारी के निर्मम समय में एक जीवंत रचनाकार का जाना

·        नन्‍द भारद्वाज

हिन्‍दी के प्रतिष्ठित और सक्रिय कथाकार रमेश उपाध्‍याय अब हमारे बीच नहीं रहे। अपनी जीवन-यात्रा के 79 वें वर्ष में कोरोना जैसी लाइलाज महामारी से जूझते हुए आखिर 23-24  अप्रैल की मध्‍यरात्रि को दिल्‍ली के ओखला ईएसआई हास्पिटल में उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिये। निश्‍चय ही उनकी यह असामयिक मृत्‍यु सहज-सामान्‍य नहीं थी और न उनकी जीवनलीला को बचाने वाले प्रयत्‍न ही पर्याप्‍त। जीवन की इस अंतिम लड़ाई के समय उनके निकट संबंधी (साढ़ू) शम्‍सुल रहमान ने जिन शब्‍दों में दर्ज किया है, उसे पढ़-जानकर दिल दहल उठता है। यह बेहद दुखद और दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि इस संवेदनहीन व्‍यवस्‍था के कमजोर स्‍वास्‍थ्‍य-तंत्र की शिथिलता और असहयोगपूर्ण रवैये के कारण उनके जीवन को बचाया नहीं जा सका। कोराना जैसी भयावह महामारी के निर्मम दौर में हिन्‍दी के एक जीवंत रचनाकार का इस तरह सही इलाज के अभाव में जाना सदा के लिए मन में एक गहरी टीस छोड़ गया है।  

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एक आत्‍मीय लेखक मित्र और उससे भी कहीं अधिक बड़े भाई का दर्जा रखने वाले डॉ रमेश उपाध्‍याय से मेरी पहली मुलाकात सन् 1972 के आखिरी दिनों में जोधपुर में हुई थी। यों एक नये कथाकार के रूप में उनकी कहानियां और उपन्‍यास ‘दंडद्वीप’ मैं ‘सारिका’ और ‘धर्मयुग’ में पढ़ चुका था और अपने अभिन्‍न मित्र और राजस्‍थानी के वरिष्‍ठ कवि पारस अरोड़ा के माध्‍यम से यह पता लगा कि वे दोनों जोधपुर की प्रिंटिंग प्रैस में एक कंपोजीटर के रूप में साथ काम कर चुके हैं। उन्‍होंने यह भी बताया कि रमेश लंबे अरसे तक अजमेर के छापाखानों में काम करते रहे है। वे अप्रैल, 1960 में पहली बार कासगंज (उ प्र) से अजमेर आए थे और चार साल तक वहीं टिककर काम किया, वहीं से उनके कहानी लेखन की शुरूआत हुई और उनकी पहली कहानी ‘एक घर की डायरी’ वहीं की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘लहर’ में प्रकाशित हुई। यहीं काम करते हुए जब उनकी कहानियां राष्‍ट्रीय स्‍तर की पत्रिकाओं ‘सारिका’, ‘धर्मयुग’, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान’ आदि में लगातार छपने लगी तो एक लेखक के रूप में अपना भाग्‍य आजमाने वे दिल्‍ली पहुंच गये, जहां परिवार के कुछ परिचित लोग पहले से थे। वहां एक स्‍वतंत्र लेखक के साथ ही उन्‍होंने यहां की पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में काम करने के अवसर मिले, जो कि अधिक उत्‍साहवर्द्धक नहीं रहे। एक अच्‍छी उपलब्धि यह जरूर रही कि दिल्‍ली रहते हुए उन्‍होंने पत्राचार पाठ्यक्रम से बी ए की डिग्री जरूर हासिल कर ली। दिल्‍ली प्रैस और यहां की फ्रीलांसिंग में जिन्‍दगी के जो तल्‍ख अनुभव हुए वे लेखक रमेश उपाध्‍याय को एक संजीदा और जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण विकसित करने में निश्‍चय ही निर्णायक साबित हुए। फ्रीलांसिंग लेखक के रूप में कार्य करने की संभावनाएं दिल्‍ली की बजाय चूंकि बंबई में बेहतर मानी जाती थी, इसलिए कुछ मित्रों के बुलावे पर वे बंबई पहंच गये। बंबई में उन्‍होंने करीब दो वर्ष तक फ्रीलांसिंग की, इस बीच वे ‘नवनीत’ के संपादकीय विभाग से भी जुड़े, लेकिन वहां की जीवन-शैली रास न आने और अपनी बची हुई पढ़ाई (एम ए) पूरी करने के लिए वे वापस अजमेर आ गये और यहीं एक स्‍वतंत्र लेखक के रूप में काम करते हुए अजमेर के राजकीय महाविद्यालय से हिन्‍दी में एम ए के लिए दाखिला ले लिया। अपने इसी दूसरे अजमेर प्रवास के दौरान सन् 1969 में सुधा जी से उनका विवाह संपन्‍न हुआ और सन् 1970 में प्रथम श्रेणी में एम ए की डिग्री हासिल कर अपने जीविकोपार्जन के लिए दिल्‍ली पहुंच गये, जहां कुछ ही अरसे बाद दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के वोकेशनल स्‍टडीज कॉलेज में वे हिन्‍दी के प्राध्‍यापक नियुक्‍त होकर सदा के लिए दिल्‍लीवासी हो गये। रमेश जी के लेखन में मेरी अच्‍छी दिलचस्‍पी तो थी ही, पारस जी ने जब एक दिन आपसी बातचीत में उनके इस जीवन-संघर्ष के बारे में इतना-कुछ बताया तो उनमें मेरी दिलचस्‍पी और गहरी हो गई। मैंने पारस जी से आग्रह किया कि हमें किसी बहाने रमेश जी को एकबार जोधपर बुलाना चाहिए। हमने उनके लिए जोधपुर के साहित्यिक मित्रों के बीच एक गोष्‍ठी में रमेश जी को बुलाने का निश्‍चय किया और उन्‍हें निमंत्रण भेज दिया। उन दिनों स्‍वयं प्रकाश भी भीनमाल में थे, जो रमेश और पारस के अच्‍छे मित्र थे, हमने उन्‍हें भी जोधपुर आमंत्रित कर लिया और संयोग से दोनों ने आने की सहमति दे दी। जोधपुर में रमेश उपाध्‍याय और स्‍वयं प्रकाश से इस गोष्‍ठी के बहाने जो मुलाकात हुई और उनके लेखन पर जो चर्चाएं हुईं, उसने हमारे बीच अंतरंग मित्रता का एक ऐसा अटूट रिश्‍ता बना दिया कि वह अगले पचास साल बाद भी वैसा ही जीवंत, ताजा और अनौपचारिक बना रहा।

     रमेश उपाध्‍याय बेशक उम्र में मुझसे आठ साल बड़े थे और वे हिन्‍दी के एक प्रतिष्ठित लेखक थे, लेकिन वे इतने सहज, आत्‍मीय और हर लेखक को समानता के धरातल पर रखकर बात करने वाले व्‍यक्ति थे कि उनसे घंटों बात करने के बावजूद कभी छोटे-बड़े का लिहाज बीच में नहीं आया। रमेश जी के दिल्‍ली प्रवास के दौरान ही जुलाई, 1974 में यूपीएससी में अपने   इंटरव्‍यू के बहाने पहली बार मैं दिल्‍ली गया और उनके आग्रह पर उन्‍हीं के पास ठहरा, जहां सुधा भाभी का वत्‍सल स्‍नेह और नन्‍हीं बल्‍लू कॉमरेड (प्रज्ञा) की अठखेलियां देखने को मिलीं। बहुत शीघ्र ही हमारे बीच की यह दोस्‍ती दो परिवारों की दोस्‍ती में रूपान्‍तरित हो गई। दोनों के बच्‍चे अलग-अलग शहरों में रहते हुए भी सर्दी-गर्मी के अवकाशों और घरेलू आयोजनों में साथ हंसते-खेलते बड़े हुए है। रमेश हिन्‍दी के एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जो मेरे वृद्ध माता-पिता और परिवार से मिलने मेरे मूल गांव माडपुरा (बाड़मेर) तक गये और हम एक-दूसरे के हर पारिवारिक आयोजन में व्‍यक्तिश: उपस्थित रहे। हमारी आत्‍मीय मित्रता का यह रिश्‍ता हमारे बीच चार दशक तक चले अनवरत पत्राचार में आज भी सुरक्षित है और यह पत्राचार मुख्‍यत: हमारे समय, समाज और साहित्‍य से जुड़े मसलों पर ही केन्द्रित होने के कारण मुझे आज भी बहुत कुछ जानने समझने का अवसर देता है, कभी संयोग बना और संभव हुआ तो उस पत्राचार को एक स्‍वतंत्र पुस्‍तक के रूप में हिन्‍दी के पाठकों को सुपुर्द करूंगा, जो रमेश उपाध्‍याय के साहित्यिक अवदान को समझने की दृष्टि से निश्‍चय ही महत्‍वपूर्ण है। 

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   एक रचनाकार के रूप में डॉ रमेश उपाध्‍याय विगत छह दशकों में साहित्‍य की विभिन्‍न विधाओं क‍हानी, उपन्‍यास, नाटक, कविता, आलोचना, संवाद, अनुवाद, रिपोर्ताज आदि के माध्‍यम से अपने समय-समाज की केन्‍द्रीय चिन्‍ताओं, वास्‍तविकताओं और अन्‍तर्विरोधों पर लगातार अपनी बात कहते रहे हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन, साहित्‍य शिक्षण और लेखकों की सांगठनिक गतिविधियों से भी उनका सीधा जुड़ाव रहा है। अपनी इस  आठ दशक की जीवन-यात्रा में अब तक उनके डेढ़ दर्जन से अधिक कहानी संग्रह, चार उपन्‍यास, पांच नाटक, आठ नुक्‍कड़ नाटक, आठ आलोचनात्‍मक कृतियां, अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं की उनके द्वारा अनुदित दस महत्‍वपूर्ण अनुवाद पुस्‍तकें, उनके साक्षात्‍कारों की एक पुस्‍तक ‘बेहतर दुनिया की तलाश में’ तथा समसामयिक विषयों पर तीन दर्जन से अधिक संपादित पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

   साहित्‍य लेखन की इसी निरन्‍तरता में 2019 में उनकी एक और नयी संवाद कृति आई थी -  'अपनी बात : अपनों के साथ', जो लेखक की जीवन-यात्रा पर केन्द्रित बातचीत के रूप में होते हुए भी उनकी आत्मकथा नहीं है। इससे पूर्व सन् 2013 में आई उनके आत्‍मकथात्‍मक एवं साहित्यिक विमर्शों की पुस्‍तक ‘मेरा मुझमें कुछ नहीं’ की भूमिका में उन्‍होंने कहा भी था कि वे कोई आत्‍मकथा नहीं लिखना चाहते और इसके पीछे उन्‍होंने अपने समय के बड़े चिन्‍तक जिगमुंग बाउमान की इसी धारणा का समर्थन किया था ‘वर्तमान पॉपूलर कल्‍चर ने आत्‍मकथात्‍मक लेखन को एक बाजारू चीज बना दिया है’, जिसने ‘निजी तथा सार्वजनिक के बीच का भेद मिटा दिया है।' इसीलिए उन्‍होंने अपनी कृति को शीर्षक दिया था ‘मेरा मुझमें कुछ नहीं’। रमेश जी के इसी मनोभाव का सम्‍मान करते हुए  उनके अपनों दोनों बेटियों प्रज्ञा-संज्ञा और दामाद राकेशकुमार ने एक विस्‍तृत  संवाद के माध्यम से उनकी जीवन-यात्रा और रचनाकर्म को जानने-समझने के लिए दस बैठकों में एक विस्‍तृत बातचीत का उपक्रम किया था। यह बातचीत वहां से शुरू होती है, जहां से लेखक रमेश उपाध्‍याय का बचपन, उनकी प्रारंभिक शिक्षा, किशोरवय में जीवन निर्वाह के संघर्ष और उनके लेखन बनने की शुरूआत होती है।

      असल में किसी लेखक का अपना जीवन-संघर्ष, रचनाकर्म और समय-समाज में उसकी भूमिका को लेकर जो अनकहा और अनजाना रह जाता है, वह या तो लेखक के आत्‍मबयान के  रूप में सामने आता है या उन ‘अपनों’ के साथ ऐसे व्‍यापक संवाद के माध्‍यम से संभव हो पाता है, जो उस जीवन-यात्रा और जद्दोजहद में अनवरत साझीदार रहे हों। रमेश उपाध्‍याय की जीवन-यात्रा, रचनाकर्म और उनके वैचारिक दृष्टिकोण पर केन्द्रित इस सार्थक संवाद को संभव बनाने में उनकी दोनों विदुषी पुत्रियों प्रज्ञा, संज्ञा और दामाद राकेश कुमार की निश्‍चय ही निर्णायक भूमिका रही है, जो न केवल उनकी जीवन यात्रा के अंतर्साक्षी और सहभागी रहे हैं, बल्कि उनकी रचनाशीलता के मर्म और बयानगी की बारीकियों को बेहतर ढंग से जानते समझते रहे हैं। 

     किसी सक्रिय और सजग रचनाकार की रचनाओं पर बात करना और उनके रचना-कर्म पर कोई मूल्य-निर्णय देना एक जोखिम-भरा काम है, खासतौर से ऐसा रचनाकार जो कहानी जैसी लोकप्रिय और असरदार विधा से जुड़ा हो और यह जानता हो कि वह क्या लिखता है, क्यों लिखता है और किसके लिए लिखता है – हिन्‍दी के जाने-माने कथाकार रमे उपाध्याय ऐसे ही रचनाकारों में आते हैं। वे पांच दशक से भी अधिक समय से कहानियां लिख रहे हैं (उनकी पहली कहानी एक घर की डायरीसन् 1962 में लहरमें प्रकाशित हुई थी) और वे आधुनिक हिन्दी कहानी की सुदीर्घ परम्परा के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। इन छह दकों की कथा-यात्रा में उन्होंने कहानी के पाठकों को घोंसले’, ‘समतल’, शेष इतिहास’,  ‘कहीं जमीन नहीं’, ‘अर्थतंत्र’, ‘पानी की लकीर’, ‘माटीमिली’, ‘कामधेनु’, प्रौढ़ पाठशाला’, ‘राष्ट्रीय राजमार्ग’, ‘कल्पवृक्ष’, ‘देवीसिंह कौन’, ‘सफाईयां’, लाइलो’, ‘कहां हो प्यारेलाल’, ‘हंसो हिमा हंसो’, ‘एक झरने की मौत’, ‘डेल्टा’ ‘डॉक्यूड्रामा, ‘प्रेम के पाठ’, ‘त्रासदी माई फुट!‘, ‘काठ में कोंपल’  जैसी कितनी ही यादगार और महत्वपूर्ण कहानियां दी हैं,  वहीं ‘चक्रबद्ध’, ‘दण्‍डद्वीप’, ‘स्‍वप्‍नजीवी’ और ‘हरे फूल की खुशबू’ जैसे उपन्‍यासों के माध्‍यम से एक प्रगतिशील यथार्थवादी कथाकार के रूप में हिन्‍दी कथा-साहित्‍य में अपनी अलग पहचान बनाई है। 

            रमेश उपाध्‍याय की कहानियों और कथा-लेखन के नये प्रयोगों पर पिछले छह दशकों में बहुत से लोगों ने कई तरह की टिप्पणियां की हैं। वरिष्‍ठ कथाकार भीष्‍म साहनी ने सन् 1976 में प्रकाशित अपनी पुस्‍तक ‘आधुनिक हिन्‍दी उपन्‍यास’ में मुंशी प्रेमचंद के ‘गोदान’ से लेकर अद्यतन जिन बीस उपन्‍यासों की चर्चा करते हुए, उन पर समीक्षात्‍मक लेख और उपलब्‍ध कथाकारों से उनकी रचना-प्रक्रिया पर आलेख लिखवाए, उनमें रमेश उपाध्‍याय के ‘दण्‍डद्वीप’ को भी एक महत्‍वपूर्ण उपन्‍यास के रूप में शामिल किया गया था। इस उपन्‍यास की रचना-प्रक्रिया पर अपनी बात कहते हुए रमेश उपाध्‍याय ने इस पर आई उन आलोचनात्‍मक प्रतिक्रियाओं की विशेष चर्चा की, जिन्‍हें यह उपन्‍यास कुछ अधूरा-सा लगा था और लेखक से आग्रह किया गया था कि वे इस पर फिर से विचार करें और हो सके तो अगले संस्‍करण में कुछ आवश्‍यक सुधार करें। रमेश जी ने अपने इस लेख में उन प्रतिक्रियाओं के प्रति आभार प्रकट  करते हुए खुले मन से यह बात स्‍वीकार की और यह घोषणा भी की थी कि वे अगले संस्‍करण में कुछ आवश्‍यक सुधार अवश्‍य करेंगे। बरसों बाद सन् 2009 में जब शब्‍दसंधान प्रकाशन से इस उपन्‍यास के पुनर्प्रकाशन की योजना बनी तो रमेश जी ने अपने पूर्व निश्‍चय के अनुसार इसका पुनर्लेखन किया और अब वह संशोधित संस्‍करण प्रकाशित होकर हिन्‍दी पाठकों के हाथों में पहुंच गया है।

     इसी तरह अपने कथा-लेखन पर उठे विवादों पर स्वयं रमेश जी ने सन् 1987 में अपने कहानी संग्रह किसी दे के किसी शहर मेंकी विस्तृत भूमिका में उन तमाम सवालों और शंकाओं का बड़े धैर्य से तार्किक उत्तर दिया है। अपनी कहानियों पर आई सभी तरह की विवादी टिप्पणियों का हवाला देने और उनके प्रति खुले मन से आभार प्रकट करने के बाद कहानी के सम्बन्ध में अपना नजरिया सामने रखते हुए वे लिखते हैं - ‘‘मैं अपनी कहानी के माध्यम से अपने पाठक के साथ (और आलोचक के साथ भी, क्योंकि वह भी एक प्रबुद्ध पाठक ही होता है) जो रिश्‍ता बनाना चाहता हूं, वह समान जरूरतों पर आधारित बराबरी का जनवादी रिश्‍ता है। वह रिश्‍ता कुछ-कुछ इस प्रकार का है कि देखो भाई, मैं जिस समाज में रहता हूं, उसे मैंने इस रूप में देखा  है, और उसके बारे में मेरी समझ यह है। मेरी यह दृष्टि और समझ गलत भी हो सकती है, आगे चलकर बदल भी सकती है, लेकिन फिलहाल मेरी दृष्टि और समझ के मुताबिक सामाजिक यथार्थ यह है और मैं उसका प्रतिबिम्बन अपनी कहानी में इस ढंग से कर रहा हूं कि तुम उसे मेरी कहानी में देखने के बाद अपनी जि़न्दगी में देखो और उस पर गौर करो। गौर इसलिए करो कि मेरा और तुम्हारा सामाजिक यथार्थ एक है, उसको बदल कर बेहतर बनाने का काम मुझे और तुम्हें मिलकर करना है। लेकिन यह मत समझो कि मैं तुम्हारा नेता या पथप्रदर्शक हूं, तुम्हें कोई बना-बनाया रास्ता दिखा दूंगा या सोचने-समझने का काम तुम्हारे लिए मैं कर दूंगा।.......याद रखो कि तुम्हें बहकाने और भटकाने वाली शक्तियां भी समाज में सक्रिय हैं,  और वे इतनी प्रभावशाली भी हैं कि अगर तुम सचेत नहीं रहे तो वे तुम्हें अपने प्रभाव में लेकर बहा ले जा सकती हैं और कहीं-का-कहीं पहुंचा दे सकती हैं। यह काम कला, कविता और कहानी के माध्यम से भी किया जाता है,  इसलिए कहानी को कहानी ही समझो, अपनी जिन्दगी नहीं।’’ और कहानी के बारे में अपनी इसी सोच-समझ को लेकर चलते हुए वे हिन्दी पाठकों को अब तक तेरह कहानी संग्रहों के माध्यम से करीब दो सौ कहानियां सुपुर्द कर चुके हैं।

रमेश उपाध्‍याय के नौंवे कहानी संग्रह कहां हो प्यारेलालकी कहानियों पर अपनी बात कहते हुए मैंने लिखा था कि ‘‘आज उनका लेखन जिस उत्कर्ष पर है, वहां यह कहना तो कठिन है कि उनकी कहानियों की आगे की  क्या दिशा रहेगी, या कि उनके कथा-लेखन की केन्द्रीय चिन्ताओं का आगे क्या स्वरूप बनेगा, लेकिन यह बात निःसंकोच कही जा सकती है कि एक जागरूक रचनाकार के रूप में अपने समय और समाज की चिन्ताओं और समस्याओं पर उनकी पकड़ उत्तरोत्तर गहरी और मजबूत हुई है, रचना उनके लिए अपनी कलात्मक प्रतिभा साबित करने की महत्वाकांक्षा भर नहीं है, बल्कि वे सामाजिक रूपान्तरण के एक ठोस माध्यम के रूप में भी उसे अंगीकार करते रहे हैं। नये प्रयोगों के प्रति भी वे विशेष रूप से आग्रहशील रहे हैं और इन्हीं प्रयोगों के कारण कई बार उन्हें विरोधी आलोचना का भी सामना करना पड़ा है, लेकिन इस आलोचना से अन्ततः उन्हें नई ऊर्जा ही प्राप्त हुई है।’’ अपनी इस टिप्पणी के बावजूद मैं ही क्या, रमेश उपाध्याय की कहानियों के सचेत पाठकों को उनके लेखन की दिशा और उनकी केन्द्रीय चिन्ताओं के स्वरूप को लेकर शायद ही कोई दुविधा रही हो।

     रमेश उपाध्‍याय संयोगवश हिन्‍दी लेखन के ऐसे दौर में सर्वाधिक सक्रिय लेखक के रूप में उपस्थित रहे हैं, जिन्‍होंने अपने समय के साहित्यिक आन्‍दोलनों को जहां अपने रचनात्‍मक लेखन से पुष्‍ट किया, वहीं अपने प्रगतिशील वैचारिक दृष्टिकोण के अनुरूप साहित्यिक मंच बनाकर, पत्रिकाएं निकालकर तथा साहित्‍य संगठनों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए उन्‍हें सार्थक दिशा देने का प्रयत्‍न भी किया है। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और उसूलों पर कायम रहते हुए न केवल उन्‍होंने पुनरुत्‍थानवादी और पूंजीवादी विचारों का डटकर विरोध किया है, बल्कि अपने हमविचार लेखकों की महत्‍वाकांक्षाओं और वैचारिक असहमतियों का भी दृढ़ता से सामना किया है। सातवें दशक में जहां वे हिन्‍दी की लोकप्रिय व्‍यावसायिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले चर्चित लेखक रहे, वहीं आठवें दशक की शुरूआत में वैचारिक मतभेद के चलते उन पूंजीवादी संस्‍थानों की पत्रिकाओं से अलग भी हो गये और उस समय के लघु पत्रिका आन्‍दोलन में अपनी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई।

          एक युवा लेखक के रूप में उनके कहानी लेखन की शुरूआत बेशक नई कहानी आन्‍दोलन के दौर में हुई और कुछ अरसे तक वे उससे जुड़े भी रहे, लेकिन जल्‍दी ही उस आन्‍दोलन की सीमाओं को पहचानते हुए वे उससे अलग भी हो गये। सन् 1971 में नई कहानी आन्‍दोलन से अलग जिन युवा लेखकों ने यथार्थवाद के प्रति आग्रह रखते हुए जिस नये ‘समांतर कहानी’ आन्‍दोलन की शुरुआत की, उसमें जितेन्‍द्र भाटिया और इब्राहीम शरीफ के साथ रमेश उपाध्‍याय की प्रमुख भूमिका रही थी। बाद में जब उस आन्‍दोलन को नई कहानी के पैरोकार कमलेश्‍वर ने उसी व्‍यावसायिक घराने की पत्रिका ‘सारिका’ को मुखपत्र बनाकर अपनी महत्‍वाकांक्षा के लिए उसे हथिया लिया, तो उनसे भी वैचारिक असहमति के चलते वे समांतर से अलग हो गये। नई कहानी और समांतर कहानी आन्‍दोलन के साथ जुड़ने के बावजूद वाम विचार और प्रगतिशील साहित्‍य आन्‍दोलन के प्रति उनका रुझान बराबर बना रहा और अंतत: वे उस आन्‍दोलन से और गहरे स्‍तर पर आ जुड़े। उन्‍होंने यह भी बताया कि उसी वामपंथी रुझान के चलते उन्‍हें ‘साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान’ की नौकरी छोड़नी पड़ी। मुंबई से दिल्‍ली आकर पत्रकारिता से जुड़ने के साथ ही उन्‍होंने यहां अपने हमविचार साथियों आनंद प्रकाश, राजीव सक्‍सेना, कर्णसिंह चौहान आदि के साथ जिस जनवादी विचार मंच की शुरुआत की, उसकी आगे चलकर जनवादी लेखक संघ के निर्माण में अहम् भूमिका रही। इस जनवादी मंच की गतिविधियों का विस्‍तार करते हुए देश के अन्‍य भागों और प्रमुख नगरों में भी इस विचार से जुड़े लेखकों की गोष्ठियां, सेमीनार और लेखक शिविर आयोजित हुए, जिनमें रमेश जी और उनके साथियों की प्रमुख भूमिका रही। इन संगोष्ठियों में साहित्‍य में यथार्थवाद, साहित्‍य के सामाजिक सरोकारों और साहित्‍य के इतिहास लेखन पर गंभीर चर्चाएं हुईं।

           यह रमेश उपाध्‍याय ही थे, जिनकी सलाह और सक्रिय भागीदारी से हम राजस्‍थान के लेखकों ने भी जोधपुर में जनवादी लेखक मंच की शुरुआत की और एक राष्‍ट्रीय स्‍तर का सेमीनार आयोजित किया, जिसमें प्रदेश के अनेक महत्‍वपूर्ण लेखकों के साथ‍ स्‍वयं रमेश उपाध्‍याय एक प्रमुख प्रतिभागी और प्रेरक के रूप में उपस्थित रहे। इसी सेमीनार में स्‍वयं प्रकाश, हरीश भादानी, शिवराम आदि अनेक वरिष्‍ठ लेखकों ने भाग लिया। कालांतर में इसी जनवादी मंच के लेखक सन् 1982 में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर गठित जनवादी लेखक संघ से जुड़ गये। उसी दौर की गतिविधियों और कश्‍मकश पर रमेश जी ने आयोजनों और बहसों के अपने साहित्यिक संवादों में जो ब्‍यौरे दिये हैं, वे प्रगतिशील और जनवादी साहित्‍य आन्‍दोलन की उस ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि को समझने की दृष्टि से निश्‍चय ही महत्‍वपूर्ण हैं। यही वह दौर था जब वाम, पहल, कथा, भंगिमा, वातायन, कलम, उत्‍तरार्द्ध, क्‍यों, युग परिबोध, प्रतिमान जैसी पत्रिकाओं के माध्‍यम से वाम-जनवादी लेखन का उभार खुलकर सामने आया। यह बात कम महत्‍वपूर्ण नहीं है कि इन लघु पत्रिकाओं से प्रगतिशील सोच वाले तमाम नये पुराने लेखक जुड़कर इस आन्‍दोलन को गति प्रदान कर रहे थे। सन् 1971 के बांदा सम्‍मेलन के बाद से प्रगतिशील लेखक संघ में भी नयी सक्रियता बढ़ी। रमेश जी ने अपनी बातचीत में उस दौर में लेखक संगठनों के साथ इप्‍टा, जन नाट्य मंच जैसे अन्‍य सांस्‍कृतिक संगठनों की गतिविधियों में अपनी और प्र‍गतिशील लेखकों की भूमिका की काफी विस्‍तार से चर्चा की है। 

    रमेश उपाध्‍याय की जीवन यात्रा और साहित्‍य-कर्म के तीन महत्‍वपूर्ण पक्ष हैं – पहला उनका संघर्षपूर्ण बचपन तथा एक संवेदनशील लेखक के रूप में उनकी विकास यात्रा, दूसरा साहित्‍य और समाज के विचारधारात्‍मक संघर्ष में एक लेखक के रूप में उनकी अपनी भागीदारी और तीसरा उनके संपादन में निकली साहित्यिक पत्रिका ‘कथन’ के माध्‍यम से आज के सवालों और भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्‍ठभूमि को समझते-समझाते एक बेहतर दुनिया के सपने को सजीव बनाए रखने की अनवरत जिजीविषा। अपनों के साथ संपन्‍न हुई इन दस बैठकों में इन्‍हीं तीन महत्‍वपूर्ण पक्षों पर उनके विचार इस बातचीत के केन्‍द्र में रहे हैं। इस बातचीत में उन्‍होंने आधुनिकतावाद बनाम यथार्थवाद, अनुभववाद बनाम यथार्थवाद, आलोचनात्‍मक यथार्थवाद बनाम समाजवादी यथार्थवाद तथा भूमंडलीय यथार्थवाद जैसी अवधारणाओं पर खुलकर अपना दृष्टिकोण प्रस्‍तुत किया है। साहित्‍य में यथार्थ और कल्‍पना की सनातन बहस से जुड़े एक सवाल के प्रत्‍युत्‍तर में अतीत के स्‍वर्णिम युग की कल्‍पना के बरक्‍स भविष्‍य के समतामूलक समाज की अवधारणा पर बल देते हुए वे कहते हैं – “अतीत में किसी स्‍वर्णिम युग की कल्‍पना करके मानवजाति को उसकी ओर लौट चलने के लिए प्रेरित करने वालों को लगता है कि मानवता का भविष्‍य अंधकारमय और भयावह है, जबकि इतिहास इस मिथ्‍या धारणा का ख्ंडन करके हमें यह बताता है कि मनुष्‍य उत्‍तरोत्‍तर सामाजिक प्रगति करता हुआ एक समतामूलक न्‍यायपूर्ण समाज-व्‍यवस्‍था की ओर बढ़ रहा है। ये दोनों धारणाएं दरअसल दो भिन्‍न और परस्‍पर विरोधी विचारधाराओं पर आधारित हैं, जिनसे लेखकों की कल्‍पनाएं निर्देशित होती हैं। समाज के ऐतिहासिक विकास की गति और दिशा के अनुकूल विचारधारा और भविष्‍योन्‍मुखी कल्‍पना से प्रगतिशील चिन्‍तन और यथार्थवादी रचना का जन्‍म होता है, जबकि उसके प्रतिकूल विचारधारा और अतीतोन्‍मुखी कल्‍पना से प्रतिगामी चिन्‍तन और गैर-यथार्थवादी रचना का।" इसी बहस के संदर्भ में हिन्‍दी कथा साहित्‍य में आए पॉजिटिव हीरो को काल्‍पनिक कहकर उसका विरोध करने वालों की सोच के मूल में निहित उस मानव-द्रोही साजिश की ओर संकेत करते हुए वे कहते हैं – “यह शीतयुद्ध की राजनीति के अंतर्गत पतनशील बुर्जुआ लेखकों और आलोचकों द्वारा फैलाया गया एक भ्रामक विचार है, जिसके आधार पर साहित्‍य में ‘लघु मानव’ और ‘आम आदमी’ के नारे दिये गये और रचना-प्रक्रिया से कल्‍पना तत्‍व को एकदम खारिज करने की बेतुकी बातों के साथ यथार्थवाद के नाम पर साहित्‍य, चित्रकला और सिनेमा के क्षेत्रों में कई यथार्थवाद विरोधी आन्‍दोलन चलाये गये हैं। वास्‍तव में यथार्थ और कल्‍पना में विरोध पैदा करना उन सृजन-विरोधी और मानव-द्रोही लोगों की साजिश है, जो भविष्‍य के नये समाज से, नये मनुष्‍य से और समाजवाद के अंतर्गत उसके सुखी और सुन्‍दर जीवन की कल्‍पनाओं से मनुष्‍य को वंचित रखना चाहते हैं।" ‘कथन’ की दो पारियों और उनके बीच जनवादी लेखक संघ की दिल्‍ली स्थित राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी के कुछ महत्‍वाकांक्षी सदस्‍यों के रमेश उपाध्‍याय के प्रति अपनाए गये अफसोसजनक रवैये के कारण जलेस संगठन के साथ जुड़कर वह जो बेहतर काम कर सकते थे, उसकी संभावनाएं जरूर सीमित हो गईं, लेकिन रमेश उपाध्‍याय ने ‘कथन’ पत्रिका के माध्‍यम से यथार्थवादी साहित्‍य की अवधारणा और भूमंडलीय यथार्थवाद को लेकर जारी वैश्विक बहस को जिस तरह हिन्‍दी अध्‍येताओं के लिए सहज-सुलभ बनाया है, वह अपने आप में संजीदा साहित्‍य कर्म की एक मिसाल है।

     रमेश जी से विस्‍तृत संवाद की उनकी पुस्‍तक ‘अपनी बात अपनों के साथ’ की नौवीं बैठक में प्रश्‍नकर्ताओं ने जिस तरह उनकी संघर्षशील जीवन यात्रा को गीता में वर्णित ‘नित्‍यसन्‍यासी’ की अवधारणा से जोड़ते हुए सवालों की एक श्रृंखला उनके सामने प्रस्‍तुत की, उन प्रश्‍नों के उत्‍तर में रमेश जी के जीवन के वे तमाम अकथ प्रसंग और ब्‍यौरे खुलकर सामने आ गये, जिन हालात में इस रचनाकार ने अपनी रचनाशीलता को आकार दिया है। इसी संघर्ष यात्रा में रमेश जी ने अपने जीवन-अनुभव से अर्जित उस सत्‍य को भी जाना और उसे उजागर किया, जो उनकी आगे की जिन्‍दगी में एक दिशा-निर्देश की तरह कायम रहा। वे कहते हैं – “यथार्थ उतना ही नहीं है, जितना और जैसा आज दिखता है। यथार्थ उसमें निहित संभावना भी है, जिससे भविष्‍य में वह आज से बेहतर बन सकता है।" इसी जीवन-सूत्र को आधार बनाकर वे अपनी यथार्थवाद संबंधी वैज्ञानिक अवधारणा पर आज भी कायम हैं और उसी नजरिये से साहित्‍य और भूमंडलीय यथार्थ से जुड़े आज के सवालों की समग्र व्‍याख्‍या प्रस्‍तावित करते हैं।

अपनी नयी आलोचना कृति ‘मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्‍वप्‍नद्रष्‍टा’ के माध्‍यम से रमेश उपाध्‍याय ने भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा से जुड़े उन तमाम सवालों पर गहराई से विचार किया है, जो स्‍वयं उनके जीवन और साहित्‍य-कर्म के केन्‍द्रीय सरोकार बने रहे। अपने इसी दृष्टिकोण को आधार बनाकर उन्‍होंने मुक्तिबोध जैसे कालजयी कवि की कविताओं का ऐसा विशद कथा-पाठ तैयार किया, जो उनके मुक्तिकामी स्‍वप्‍नद्रष्‍टा के संघर्ष को गहरी संगति देता है। एक समर्थ कथाकार के रूप में उन्‍होंने इस अनूठे विवेचन के माध्‍यम से मुक्तिबोध की उन जटिल और संश्लिष्‍ट शिल्‍प वाली कविताओं के भीतर निहित उस काव्‍य-नायक के जीवन-संघर्ष और उस दौर के भूमंडलीय यथार्थ को इन कविताओं में विन्‍यस्‍त कथा-पाठ के माध्‍यम से व्‍याख्‍यायित किया है, उससे मुक्तिबोध की ये कविताएं आम पाठक के लिए सहज बोधगम्‍य हो पाती हैं। रमेश जी ने अपनी इस विवेचन पद्धति के माध्‍यम से मुक्तिबोध की कई लंबी कविताओं और विशेष रूप से ‘अंधेरे में’ कविता का जो कथा-पाठ प्रस्‍तुत किया है, वह वाकई इन कविताओं के केन्‍द्रीय चरित्र (मुक्तिकामी स्‍वप्‍नद्रष्‍टा) के संघर्ष को अपने पूरे आकार और डिटेल्‍स के साथ एक रोचक कहानी की तरह बयान कर देता है और वह भी स्‍वयं कवि के ही शब्‍द-संयोजन और शैली-शिल्‍प को सुरक्षित रखते हुए, ताकि पाठक उसे कवि के मूल पाठ के साथ मिलान करके देख सके। इस बातचीत में मुक्तिबोध की स्‍वप्‍न कथाओं, फैंटेसी शिल्‍प और यूटोपिया की अवधारणा से जुड़े सवालों के साथ ही स्‍वयं रमेश उपाध्‍याय के अपने रचनाकर्म में  सामाजिक परिवर्तन के प्रति जिस आशावादी दृष्टिकोण की अभिव्‍यक्ति हुई है, उसी पर जब  प्रज्ञा और राकेश ने उनके सामने यह शंका रखी कि इस आशावाद का आधार क्‍या है, याकि वह बेहतर व्‍यवस्‍था कब और कैसे कायम होगी, तो रमेश जी अपने उसी विश्‍वास पर कायम रहते हुए यही कहते हैं कि “इसके बारे में कोई भविष्‍यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन कैसे बनेगी, इसका कुछ अनुमान भूमंडलीय यथार्थ के आधार पर लगाया जा सकता है। मेरा अनुमान है कि वह बेहतर व्‍यवस्‍था किसी भूमंडलीय क्रान्ति से बनेगी। अब तक दुनिया में जो क्रान्तियां हुई हैं, उनका आधार राष्‍ट्रीय रहा है, जैस फ्रांस की क्रान्ति, रूस की क्रान्ति, चीन की क्रान्ति। मार्क्‍सवाद ने वैश्विक क्रान्ति का स्‍वप्‍न देखा और उसका आधार राष्‍ट्रीयता को नहीं, अन्‍तर्राष्‍ट्रीयता को बनाया। इसलिए समाजवाद का एक आधार अन्‍तर्राष्‍ट्रीयतावाद रहा। --- पूंजीवादी भूमंडलीकरण ने राष्‍ट्र की अवधारणा को हिला दिया है और अन्‍तर्राष्‍ट्रीयता की जगह भूमंडलीयता के आधार पर वैश्विक पूंजीवाद की जगह वैश्विक समाजवाद की व्‍यवस्‍था को आवश्‍यक और संभव बना दिया है। मेरा खयाल है कि अब जो क्रान्तियां होंगी, वे राष्‍ट्रीय स्‍तर से आगे बढ़कर वैश्विक या भूमंडलीय स्‍तर की होंगी।" ऐसे स्‍वप्‍नदर्शी, प्रगतिशी, जनवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों में अटूट आस्था रखने वाले  सजग-सक्रिय रचनाकार का इस कोरोना महाव्‍याधि की चपेट में आकर  अकस्‍मात अपनों के बीच से सदा के लिए उठ जाना, परिवार, मित्रों और साहित्‍य-समाज के लिए ऐसा आघात है, जिसे झेल पाना कतई सहज नहीं है।  

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मोबाइल – 9829103455

Email : nandbhardwaj@gmail.com

 

Tuesday, May 11, 2021

 


मुक्तिबोध का काव्य-नायक

·        नंद भारद्वाज

जानन माधव मुक्तिबोध के संपूर्ण काव्‍य-लेखन में एक अनवरत क्रियाशील व्यक्तित्व की उपस्थिति साफ दिखाई देती है - एक ऐसा व्यक्तित्व जो अपने दीखत आकार, प्रकृति और क्रियाशीलता में नितान्त सामान्य और सहज होते हुए भी अपने रचनात्मक प्रभाव में असाधारण और विशिष्‍ट है। वह किसी श्रम को छोटा और हेठा नहीं मानता। उसकी तुलना आप राह चलते किसी भी पढ़े-लिखे जागरूक व्यक्ति या उस श्रमिक से कर सकते हैं, जो अपनी निजी प्रकृति में परिश्रमी, सहज और ईमानदार है। अपने अस्तित्व और ईमान को बनाए रखने के लिए वह कोई भी कार्य करने को प्रस्तुत रहता है, जो अपने प्रति किसी और के अन्याय को सह बेशक लेता हो, अपने संज्ञान में खुद किसी के साथ अन्याय नहीं करता और न किसी अन्य के साथ होते अन्याय पर मूक दर्शक बना रहना पसंद करता है। यही वह नायक है जो मुक्तिबोध की सभी कविताओं के केन्द्र में सक्रिय और बेचैन दिखाई देता है और जो अपने समय और आत्म से संघर्ष करता हुआ इन कविताओं को नयी अर्थ-गरिमा प्रदान करता है।

 

     इस सामान्य परिचय के अतिरिक्त मुक्तिबोध के इस काव्य-नायक की कोई शास्त्रीय व्याख्या यहां अनावश्‍यक है - यहां नायक की वह बुनियादी अवधारणा ही उन शास्त्रीय अपेक्षाओं से रहित है, जो नायक को कविता या जीवन में कोई विशिष्टता प्रदान करती हो, और फिर इस काव्य-नायक के पास तो उसकी समाज-सापेक्ष जीवनचर्या में ऐसा कुछ भी विशिष्ट या विलक्षण नहीं है, जिसे शास्त्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण या उदात्त कहा जा सके। जो अपने को विशिष्ट और विलक्षण कहते हैं - अपनी ही दृष्टि में महत्वपूर्ण, उनसे मुक्तिबोध का यह नायक दो-टूक शब्दों में साफ कहता है - 

           मैं तुम लोगों से इतना दूर हूं

           तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न हैं

           कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।

                                        (चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 104) 

बल्कि जब ये विशिष्टउसे छोटा और हेठा समझकर उसकी उपेक्षा करते हैं तो वह अपने पूरे आत्म-सम्मान के साथ उन्हें यह बता देना भी ज़रूरी समझता है कि - 

           मैं अपनी सार्थकता में खिन्न हूं

           निज से अप्रसन्न हूं

           इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए

           पूरी दुनिया साफ करने के लिए मेहतर चाहिए

           वह मेहतर मैं हो नहीं पाता

           पर, रोज कोई भीतर चिल्लाता है

           कि कोई काम बुरा नहीं

           बशर्ते कि आदमी खरा हो

           फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता।

                                                                 ( वही, पृ. 104-105)      

और निश्‍चय मानिये, उसका यह आत्म-स्वीकार उन विशिष्टों के मन-मस्तिष्क में एक शर्म और दहशत भी पैदा करता है, जो जानते हैं कि वे उसी के श्रम पर जिन्दा हैं और उसकी इस दुर्दशा के लिए वही जिम्मेदार भी। 

    मुक्तिबोध का यह काव्य-नायक एक खास तरह की समाज-व्यवस्था में जीता हुआ - उसका समग्र विश्‍लेषण करते हुए इस नतीजे पर पहुंचता है कि यह शोषण की सभ्यताहै और वह उस व्यवस्था के विरुद्ध वृहत्तर वर्ग के हित में लड़े जाने वाले क्रान्तिकारी संघर्ष में अपनी कारगर भूमिका तय करता है। कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने इस व्यक्तित्व के बारे लिखा है - ‘‘कविता के केन्द्र में एक दृढ़ व्यक्तित्व है, लेकिन वह अपने आपको मानवीय सम्पर्क से बचाता, अपनी अद्वितीयता और परमता को सुरक्षित करने में आत्म-तुष्ट व्यक्तित्व नहीं है। वह ऐसा व्यक्तित्व है जो ललकार और उत्साह में तादात्म होता है, बल्कि वह अपनी परिभाषा के लिए मनुष्य के नितान्त अकेलेपन को नहीं, उसके साहचर्य और बिरादरीपन को आधार बनाता है।’’ मुक्तिबोध का यह व्यक्तित्व चूंकि ऐसे खुले, ईमानदार और आत्म-सजग कवि का काव्य-नायक है, जिसके बारे में कवि ने कोई भी बात, कोई खासियत या खामी छुपा-बचा कर नहीं रखी है। 

    अमूमन ऐसा देखा गया है कि सभी रचनाकारों का काव्य-नायक या कथा-नायक प्रकारान्तर से उस लेखक-विशेष के जीवन-व्यवहार, उसके विश्‍वासों, सिद्धान्तों और क्रिया- कलापों का ही प्रतिरूप हुआ करता है, लेकिन यह कतई जरूरी नहीं कि उसी लेखक का यह पात्र हर बार वही एक-सरीखा हो, बल्कि कई बार लेखक की एक ही रचना में उसके सिद्धान्तों, जीवन-व्यवहार और उसकी मूल-प्रकृति से मेल खाते ऐसे अनेक पात्र भी हो सकते हैं, जो उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हों। इस बात को कथा-शिल्पी शरतचन्द्र चटर्जी के पात्रों की परिकल्पना से बखूबी समझा जा सकता है। किन्हीं अर्थों में यह बात मुक्तिबोध पर भी उसी रूप में लागू होती है। उनकी सभी रचनाओं में उनका काव्य-नायक अपनी तमाम खूबियों या खामियों के साथ कम ही प्रकट हुआ है, बल्कि अलग-अलग रचनाओं में रूपायित उस व्यक्तित्व के अंशों को जोड़कर ही उनके इस नायक की ठीक-सी प्रतिमा खड़ी की जा सकती है। 

      मुक्तिबोध की कविता की मूल प्रकृति आत्मसंघर्षपरक है, इसलिए उन्होंने अपनी कविताओं में इसी काव्य-नायक के आत्म-संघर्ष को उभार कर सामने रखा है। साथ ही उनकी कविताओं में जहां व्यापक जन-संघर्ष और वह भी निर्णायक दौर का संघर्ष नाटकीय धरातल पर अभिव्यक्त हुआ है, वहां उन्हें फैंटेसी या स्वप्न-कथा का सहारा लेना पड़ा है और वहां यह काव्‍य-नायक एक मुक्तिकामी स्‍वप्‍नद्रष्‍टा के रूप में सामने आता है। कोई आश्‍चर्य नहीं कि समाजवादी यथार्थवाद के कुछ अतिरिक्त आग्रही आलोचक इसी बात को लेकर उन पर अयथार्थवादी शिल्प अपनाने का आरोप लगाएं। इस तरह के आरोपों का उत्तर डॉ. नामवर सिंह उन्हें मुक्तिबोध के ही शब्दों में बखूबी दे चुके हैं कि ‘‘यथार्थवादी शिल्प और यथार्थवादी दृष्टिकोण में बुनियादी अन्तर है। यह बहुत सम्भव है कि यथार्थवादी शिल्प के विपरीत जो भाववादी शिल्प है - उस शिल्‍प के अन्तर्गत जीवन को समझने की दृष्टि यथार्थवादी रही हो।’’ प्रकारान्तर से स्वयं मुक्तिबोध भी कला के शिल्प और उसकी आत्मा में अन्तर करने पर विशेष बल देते हैं। 

     बहरहाल, ‘चांद का मुंह टेढ़ा हैऔर अंधेरे मेंजैसी लंबी कविताओं में मुक्तिबोध ने जिस व्यापक नाटकीय धरातल पर निर्णायक दौर के जन-संघर्ष को अभिव्यक्ति दी है, वह उनके काव्य-नायक की गहरी सामाजिक आस्था और उसकी वृहत्तर आकांक्षाओं की चरम परिणति का पूर्वाभास देती है। लेकिन इस परिणति तक पहुंचते हुए काव्य-नायक को एक बहुत बड़े ऊजड़ भटकाव और उलझावभरी यात्रा तय करनी पड़ती है। कई बार संघर्ष के दौरान वह थककर पस्त होने की हालत तक जा पहुंचता है - वह यह तय नहीं कर पाता कि इस अनिश्चितता और इस अनिर्णय की स्थिति से कैसे उबरा जाय। उनकी कविताओं की बजाय संकल्प-विकल्प का यह रूप मुक्तिबोध की कहानियों में अधिक मुखर होकर सामने आया है। काव्य-नायक और कथा-नायक के जीवन-संघर्ष के समानान्तर ऐसे अनेक पात्र हैं, जो न केवल टूट-बिखर जाते हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो वे परिस्थितियों के सम्मुख हार खाते भी दीखते हैं, उनके यही पात्र समाज में विद्रूप बनकर रह जाते हैं - विद्रूपकहानी का सर्वटे और क्लॉड ईथरलीका प्रतीक पात्र ऐसे ही उदाहरण हैं, याकि कुछ भिन्न अर्थ में ब्रह्मराक्षसकविता का प्रतीक-पात्र ब्रह्मराक्षस भी! लेकिन ब्रह्मराक्षस और काव्य-नायक मैंके ऑर्गेनिक चरित्र में एक बुनियादी अन्तर है, और वह अन्तर है उनका भिन्न वर्ग-चरित्र। 

     प्रत्येक समाज-व्यवस्था में दो तरह के वर्ग होते हैं - एक बुनियादी वर्ग और दूसरा गैर-बुनियादी वर्ग। मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था में इन्हीं दो वर्गों की स्थिति को रेखांकित किया जा सकता है - इन बुनियादी वर्गों में पूंजीपति और सर्वहारा हैं, जबकि गैर-बुनियादी वर्गों में मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग, जिन्हें दूसरे शब्दों में दरम्यानी तबके भी कहा जाता है। इन दरम्यानी तबकों में पूंजीवादी विकास के साथ-साथ अन्दरूनी तौर पर कई और भिन्न स्तर उत्पन्न होते जाते हैं और उनके बीच तेजी से फैलती एक ऐसी संक्रामक स्पर्धा, जो अन्दर ही अन्दर उन्हें खोखला किये देती है। कालान्तर में वर्ग-संघर्ष की ऐतिहासिक प्रक्रिया के दौरान इस दरम्यानी तबके का अधिकांश इसी अन्दरूनी स्पर्धा में नष्ट हो जाता है और वही व्‍यापक स्‍तर पर सर्वहारा वर्ग में रूपान्‍तरित होता है। इसके विपरीत एक नगण्य-सी संख्या ही पूंजीपति वर्ग में प्रवेश कर पाती है। ब्रह्मराक्षसइसी मध्यम वर्ग का एक टिपिकल चरित्र है, जो अपने मुखर सामन्ती संस्कारों के कारण अपनी ही सीमाओं, अपने ही सीमित दायरों, आकांक्षाओं और अपने ही अन्तर्विरोधों की त्रासदी बनकर रह जाता है, जबकि अपनी निम्न-मध्यवर्गीय आकांक्षाओं, प्रवृत्तियों, लघु लालसाओं और अपने अन्तर्विरोधों से लड़ता हुआ मुक्तिकामी काव्य-नायक अपने को निरन्तर डी-क्लास करता हुआ, खुद को सर्वहारा के व्यापक संघर्ष के साथ मिलाने में कामयाब रहता है। इस काव्य-नायक और ब्रह्मराक्षस के बीच यही एक बुनियादी अन्तर्विरोध है, लेकिन यह वैमनस्यरहित अन्तर्विरोध है, जो भिन्न स्तर पर एक-दूसरे को जोड़े भी रखता है। यही वजह है कि मुक्तिबोध का यह काव्य-नायक इतिहास के प्रति सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ब्रह्मराक्षस के महत्व और उसके साथ अपनी आन्तरिकता को तो स्वीकार करता ही है, भविष्य में इस साहचर्य को और सार्थक बनाने की ओर भी संकल्‍पबद्ध होता दिखाई देता है - 

            आत्मचेतस् किन्तु इस

            व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन ....

            विश्वचेतस् बेबनाव !!

            महत्ता के चरण में था / विषादाकुल मन !

            मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि  

            तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर / बताता मैं

            उसे उसका स्वयं का मूल्य / उसकी महत्ता !

            वह उस महत्ता का / हम सरीखों के लिए उपयोग

            उस आन्तरिकता का बताता मैं महत्व !!

                             (ब्रह्मराक्षस: चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 16)

       मुक्तिबोध की अधिकांश कविताओं में काव्य-नायक के अतिरिक्त ब्रह्मराक्षस की आकृति सरीखे कुछ ऐसे प्रतीकात्मक आप्तवादी चरित्र और भी हैं, जो प्रकारान्तर से उसी के व्यक्तित्व का विस्तार दीखते हैं, यद्यपि अपनी प्रकृति और आचार-व्यवहार में वे उससे कुछ अलग भी हैं - ओरांगउटांग, काव्यात्मन् फणिधर, मसीहा, रक्तालोक स्नात्-पुरुष (कवि की परम अभिव्यक्ति) आदि इसी तरह के आप्तवादी चरित्र हैं। इनके अतिरिक्त गांधी, तिलक, तॉलस्तॉय आदि आधुनिक युग के ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का भी काव्य-नायक के आदर्श चरित्र की निर्मिति में सार्थक प्रयोग हुआ है। इन आदर्श चरित्रों और काव्य-नायक का आपसी संबंध अलग-अलग कविताओं में अलग तरह से व्यक्त हुआ है। कभी काव्य-नायक इन ऐतिहासिक चरित्रों को समझता-समझाता हुआ दिखाई देता है, तो कभी ये चरित्र काव्य-नायक का दरवाजा खटखटाते दिखाई देते हैं। कभी किसी अंधेरे कोने से काव्य-नायक जब यह फटकार सुनता है - 

             अंधेरे कोने में एकान्त

             न जाने किस मास्टर की डांट पड़ रही है -

                   जितना भी किया गया

             उससे ज्यादा कर सकते थे,

             ज्यादा मर सकते थे !

 तो वह उस डांट से कतराता नहीं, न ही कोई सफाई देता है, बल्कि उसे बेहिचक कुबूल करता है और कई बार तो अपनी आत्म-भर्त्सना पर उतर आता है। वह अपनी कमियों और खामियों के लिए खुद को माफ़ नहीं करता और न अपनी परिस्थितियों या सीमाओं की एवज में कोई सुविधा या रियायत मांगता है। अंधेरे मेंकविता में उस मुक्तिकामी कलाकार की हत्या को अपने सामने घटित होते देखकर उसका मन आत्म-ग्लानि से सिहर उठता है -

            सवाल है - मैं क्या करता था अब तक,

            भागता फिरता था सब ओर ! 

और यहीं से उसे सही दिशा का बोध भी होता है -

             फिजूल है इस वक्त कोसना खुद को,

            एकदम ज़रूरी दोस्तों को खोजूं

            पाऊं मैं नये नये सहचर

            सकर्मक सत्-चित्-वेदना-भास्वर !! 

     मुक्तिबोध के इस काव्य-नायक के लिए आलोचकों ने कुछ अतिरिक्त विशेषण भी जुटाए हैं। अंधेरे मेंकविता का विश्‍लेषण करते हुए डॉ. नामवरसिंह ने लिखा है - ‘‘नाटकीय कौशल के लिए कविता का मैंदो व्यक्ति चरित्रों में विभक्त कर दिया गया है: एक है काव्य-नायक मैंऔर दूसरा उसी का प्रतिरूप वह। यह विभाजन वस्तुतः एक नाटकीय कौशल मात्र नहीं, बल्कि इसका आधार आत्म-निर्वासन’ (सैल्फ एलिएनेशन) है। अंधेरे मेंकविता का काव्य-नायक एक आत्म-निर्वासित व्यक्ति है और जिसके आत्म- निर्वासन का प्रतीक है गुहावास।’’ (कविता के नये प्रतिमान) इस बात से कोई इनकार नहीं कि मुक्तिबोध ने अपनी अनेक कविताओं की भांति इस कविता में भी नाटकीय कौशल का सहारा लिया है, तथापि कविता का वहकाव्य-नायक मैंका ही प्रतिरूप है लेकिन यहां ऐतराज काव्य-नायक के लिए लगाए जाने वाले अतिरिक्त विशेषण आत्म-निर्वासनपर खड़ा होता है, क्योंकि यह आत्म-निर्वासन काव्य-नायक ने खुद आगे बढ़कर कुबूल नहीं किया है, बल्कि इसके लिए उसे विवश किया गया है - 

              प्रश्‍न थे गंभीर, शायद खतरनाक भी,

              इसीलिए बाहर के गुंजान

              जंगलों से आती हुई हवा ने

              फूंक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी -

              कि मुझको यों अंधेरे में पकड़कर

              मौत की सजा दी !

              किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही

              आंखों में बंध गयी,

              किसी खड़ी पाई की सूली पर टांग दिया गया,

              किसी शून्य बिन्दु के अंधियारे खड्डे में

              गिरा दिया गया मैं / अचेतन स्थिति में।

                           (अंधेरे में: चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 247) 

इस सूरत में यह कहना कम सही प्रतीत होता है कि उस ‘‘प्रतिरूप से काव्य-नायक डरता है, कतराता रहता है और इसीलिए उसे टालता भी है कि स्वयं उसे अपनी कमजोरियों से लगाव है’’, और फिर ‘‘दोस्तॉएव्सकी के अण्डर-ग्राउंड मैनके समान ही यह व्यक्ति भी बाह्य परिस्थितियों से भय खाकर एक लंबी तिलस्मी खोह में निवास करता है।’’ जबकि वास्तविकता यह है कि अंधेरे मेंका काव्य-नायक किसी बाह्य भय से गुहावास या तिलस्मी खोह की शरण नहीं लेता, बल्कि उसे बाह्य शक्ति ने पकड़कर मौत की सजा दीहै। यह निर्वासन उसका अपना वरण नहीं और इसीलिए यह उसके लिए मौत की यंत्रणा से कम नहीं है। 

      कविताओं की शुरुआत में मुक्तिबोध अमूमन वस्तु-जगत की पेचीदा स्थितियों का भयावह खाका खींचते हैं - गहन सन्देह और अनिश्‍चय के लंबे गहराते काले डैश, चिरथिर अंधेरा, काली जिह्वानुमा सड़कें, कुहरे में उभरती हुई पहाड़ों की आकृतियां और अक्सर इन्हीं के बीच क्रियाशील या प्रश्‍नाकुल काव्य-नायक की उपस्थिति का अहसास - मुझे याद आते हैंकविता में काव्य-नायक कुछ इसी तरह की मनःस्थिति से गुजरता है - 

           अपने मस्तिष्क के पीछे अकेले में

           गहरे अकेले में

           जिन्दगी के गन्दे न-कहे-जानेवाले

           अनुभवों के ढेर का

           भयंकर विशालाकार प्रतिरूप !!

           स्याह !

           देखकर चिहुंकते हैं प्राण

           डर जाते है ं:

                                    (चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 75) 

लेकिन यह डर तभी तक रहता है जब तक कि काव्य-नायक अपने ही परिवेश-दायरे में सीमित होता है, वह ज्यों ही घनी आबादी वाले भीतरी भागों - मजदूर बस्तियों या गांवों की गलियों की तरफ बढ़ता है, तो वहां जीवन के लिए संघर्ष में जुटे लोगों की कर्मठता और अपने वर्ग के प्रति गहरा लगाव देखकर एक नयी स्फूर्ति प्राप्त करता है - 

            कुछ पलों बाद -

            हिये में प्रकाश-सा होता है

            खुलती हैं दिशाएं, उजला आंचल पसारे हुए

            रास्ते पर रात होते हुए भी मन में प्रात

            नहा-सा मैं उठता किसी नव-स्फूर्ति से

            असह्य-सा स्वयं-बोध विश्‍व-चेतना-सा कुछ

                                           (चांद का मुंह टेढ़ा है, पृ. 80) 

        इस काव्य-संरचना से कोई यह अर्थ निकाल बैठे कि मुक्तिबोध खींच-तानकर अपनी कविताओं और काव्य-नायक को अंततः इस उबरी हुई स्थिति में ले आते हैं, तो यह उनके सोच की सीमा है। मुक्तिबोध की कविताओं में रचाव की सम्पूर्ण प्रक्रिया काम करती है और वही कविता अपने रचनात्मक अनुभव और चरम परिणति में आश्‍वस्त भी करती है। इसके विपरीत जिन रचनाकारों के काव्य-नायकों की परिणति शून्य या हताशा में होती है, वे कविताएं या तो अपनी भाव-भूमि पर अधूरी होती हैं, अथवा भाववादी दृष्टि का शिकार होकर किसी अमूर्तन या निहायत शाब्दिक विलास बनकर रह जाती हैं।

           

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