Sunday, June 21, 2015

पितृ दिवस पर -

पिता को याद करते हुए 

एक अनजान शहर में
उदास बीबी और अबोध बच्चों के साथ
बिताते हुए वे एकाकी दिन
स्‍मृतियों में‍ अक्‍सर कुरेदता रहता था 
उनका वह भीतरी संताप:

पीढ़ी-दर-पीढ़ी
एक भरे-पूरे कुनबे का
एक-एक कर बिखरते जाना,
बरसों बाद
ब्याह-सगाई-जनम-मरण के अवसरों पर
मन-रीते मिलना -
     रीसने-रोने और परस्पर कोसने के
                 अनवरत अभ्यास में !

फिर उसी रीत में
बिखर जाना
दुलारों का बीज की मानिन्द
और असहाय पिता का
रात-रात भर सो नहीं पाना -

सीने में बजती बलगम
और आंतों में अटकी सांस को
सम्हाले रखने का
       जी-तोड़ जतन करना -

धड़कते हुए कलेजे में
संजोए रखना
अपनों से बिछुड़ जाने का 
एक अंतहीन अवसाद
और गुजारे की खोज में
परदेस गये बेटों का
बेचैन बैठे इन्तजार करना !

जब से सुना कि
किसी सुनहरे आगत की उम्‍मीद में 
लोग भेज दिया करते हैं
अपने जवान होते बेटों को
           सात समन्दर पार

जो कभी पलट कर लौट नहीं पाते
               अपनों के बीच -
फिर उसी संताप में
डूब जाते थे 
हम नाकाम सपूतों के

बूढ़े  नेक और नरमदिल पिता !

4 comments:

  1. सत्य को उकेरती

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  2. मर्मस्पर्शी रचना ...

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  3. संवेदन में पगी मार्मिक सौगात

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  4. दिल को छूती हुई रचना |

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